गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

'अन्तरात्मा की पुकार' एक विवेचन


'अन्तरात्मा की पुकार' एक विवेचन 

                                               आलोक मणि त्रिपाठी 
                                                       प्रवक्ता हिन्दी 
                                     पं यज्ञनारायण दूबे स्मारक पी.जी.
                                                 कॉलेज प्रयागराज


कवि और उसके काव्य का विवेचन और मूल्यांकन कई स्तरो पर किया जा सकता है और यह भी सच है कि विभिन्न समयों और युग-प्रवृत्तियो के प्रभाव से उक्त विवेचन और मूल्यांकन परिर्वतन भी होते रहते हैं। परन्तु इन अनिवार्य परिवर्तनों के रहते हुए भी कवि की मूल वस्तु के स्वरूप और उसके स्वरूप और उसके काव्योत्कर्ष के सम्बन्ध में कुछ स्थाई और अपरिवर्तनीय धारणाएं भी रहा करती है। इन धारणाओं की पुष्टि करना आवश्यक होता है अन्यथा किसी भी कवि के सम्बन्ध में राष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं का स्थिरीकरण नहीं हो पाता है।
पंडित श्री राम बरन त्रिपाठी का जन्म 7-जुलाई-1938 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के सुजानगंज ब्लॉक में दहेव ग्राम में हुआ था। पं त्रिपाठी जी की माता का नाम स्वर्गीय श्री मती इसराजी देवी और पिता का नाम स्वर्गीय श्री लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी था। जब त्रिपाठी जी की आयु दस वर्ष थी तभी इनके पिता की मृत्यु हो गई। पंडित श्री लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी अपने पीछे दो पुत्रियां और एक पुत्र को छोड़ कर इस लोक से विदा हुए। 
पं रामबरन त्रिपाठी की शिक्षा गांव के ही प्रथमिक विद्यालय से आरंभ हुई थी। उन्होंने तत्कालीन संस्कृत साहित्य और हिन्दी साहित्य का अध्ययन किया था। वे एक अच्छे चित्रकार और बांसुरी वादक भी भी थे । रामलीला , कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर इनकी बनाई हुई कलाकृतियां सब को अपनी ओर आकृष्ट किए बिना नहीं रहती थी। बालकाल से ही कविता करने लगे थे । इनकी कविताओं में कबीर , जयशंकर प्रसाद सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की सी मिठास देखने को मिलता है। वे आरम्भ से ही विद्रोही कवि के रूप में दिखाई पड़ते हैं। गतानुगतिकता के प्रति तीव्र विद्रोह उनकी कविताओं में आदि से अंत तक बना रहा है। व्यक्तित्व की जैसी निर्बाध अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं में हुआ है वैसा आज के आधुनिक कवियों कम दिखाई देता है। त्रिपाठी जी ने भावनाओं को कोमलता प्रदान करने का प्रयत्न नहीं किया है फिर भी इनकी रचनाओं में भाव कोमलता सर्वत्र व्याप्त है।
 सर्वत्र अभिव्यक्ति की अत्यंत निर्बाध रूप प्रदर्शित होता है। त्रिपाठी जी की प्रतिभा बहुमुखी है। उन्होंने कविताएं तो लिखी ही है, निबंध , आलोचना, उपन्यास , कहानी आदि भी लिखा है। व्यंग और कटाक्ष को वे नहीं भूलते लेकिन कथा काव्य के प्रति उनका झुकाव अधिक है। उनका महाकाव्य 'दिव्यालोक 'और 'क्रौंचवध ' कथानक उनके अंतरात्मा की उमड़ती हुई आवेगों को प्रदर्शित करती है। अनुभूति की तीव्रता के कारण उनके अंदर के आवेग बहुत वेगवान होकर प्रकट हुए हैं , कोमलकांत पदावली, छंदोबद्ध योजना,विशुद्ध गीतिकाव्यात्मकता और अलंकार योजना ने उनके काव्य को सहृदय विद्वानों के द्वारा सदैव ही सम्मान मिलता रहा है।
त्रिपाठी जी की कविताएं साधारण पाठकों को दुर्बोध मालूम नहीं होती है। इसका कारण यह है कि कवि अपने आवेगों को संयत रखकर लिखता है। कवि को एक बात कहते - कहते कभी - कभी दूसरी बात याद आ जाती है तब वहां कवि अपने आयोगों को अंकुश नहीं रख सका है। अंकुश वह रख सकता है जो भावो को सजाने का प्रयास करता है। कवि त्रिपाठी जी यह नहीं करते इसलिए उनके भावों की अविरल धारा में प्रायः सभी प्रसंग आ जाते हैं जो पाठक की दृष्टि में प्रासंगिक है। कवि की इसी प्रतिभा ने उसे अधिक लोकप्रिय बना दिया।
इस पुस्तक में कवि की पहली रचना -'वाणी वंदना' में मानवतावादी राष्ट्रप्रेम का भाव दिखाई देता है । कवि मां शारदे से आग्रह करता है -
कृषकों के कुदाल खुरपी पर 
अम्ब!फेर अपने सशक्त कर
श्रमिक वर्ग में नवल तेज भर
****************
   भारत के वीरों में जाकर ।
   मां शस्त्रास्त्रों में प्रलयंकर
   भर दे ओज अपूर्व प्रखरतर
जिससे कांपे अरि दल थर -थर।।
कवि का सम्पूर्ण जीवन ग्रामीण परिवेश में बीता है गांव के प्राकृतिक स्वरूप सहज सामान्य वातावरण ने कवि को अपने में डुबा लिया है। कोयल , पपीहा, मोर ,मैना, तोता पीपल ,बरगद,टेंसू के साथ - साथ उदित और अस्ताचल सूर्य का पूर्ण विम्ब ये सब मिलकर कवि को सौन्दर्य की नवीन अनुभूति तथा दीप्ति प्रदान करते हैं। कवि प्रकृति के समक्ष नतमस्तक होकर स्वयं को कृतार्थ अनुभव करता है। इसी यथार्थ बोध ने कवि में एक नवीन आस्था को जन्म दिया है इसी नवीन आस्था के वशीभूत होकर कवि उस थोपी हुई तथाकथित पर व्यंग करता है।

"बालारूण निरख-निरख कर , वह कल कपोल की लाली ।
अपमानित हो छिप जाता, खो अपनी छंटा निराली।।
टेसू -प्रसून खिल-खिलकर, लालिमा गर्व से ऐंठें।
अधरोष्ठ राग रंजित लख, लज्जित मुख नत से बैठा।।"
****। ******। *******
"कोकिल की सरस काली,
चातक का मधुर -मधुर स्वर।
मधुकर का मधुमय गुंजन,
न्योछावर तब वाणी पर।।"
प्रेम जीवन की उर्जा शक्ति का श्रोत है प्रेम ही जीवन में कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देता है। प्रेम सम्पूर्ण सृष्टि का मूल रहस्य है। इसी के कारण सृष्टि की रचना हुई है। अन्तर्मन में प्रेम उत्पन्न होते ही सब कुछ रूपान्तरित हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो अंधकार को चीरता हुआ कोई प्रकाश किरण उदित हुई है। यही प्रेम निराशा और निष्क्रियता के अंधकार को समाप्त करके जीवन में नवीन प्रकाश धारण करता है।
"जीवन के प्रथम पहर में,
तुम अरूणोदय से आए ।
धीरे धीरे रग - रग में ,
आलोक मधुर बिखराए।।"
कवि का प्रारम्भिक जीवन कष्टों और संघर्षों में व्यतीत हुआ था। 'मेरा बचपन ' कविता के माध्यम से कवि समसामयिक परिवेश के प्रति ईमानदारी उनके आत्मपरिचय से आरंभ होता है, कवि त्रिपाठी जी अपने विषय में बिना कुछ छिपाए हुए कहते हैं -
"अनुबंधित था अंधियारों से बचपन मेरा।
एक किरण के लिए तरसता रहा सबेरा।।"
****। *****। ******
"जिधर देखता विपदाओं ने डाला डेरा ।"
****। ******। ******
"जाऊं कहां और किस पथ से समझ न पाता।
किस करनी का दंड मिल रहा हाय विधाता।।"
भारत के समाज का वास्तविक चित्र गांवों में ही देखा जा सकता है आज भी गांवों में शोषण ,अशिक्षा , बेकारी , अंधविश्वास, भूखमरी विद्यमान है। कवि मूलतः गांव का निवासी है। प्रगतिशील और सर्वहारा का समर्थक होने के कारण गांवों की दशा का बहुत बारीकी से अवलोकन किया है । 
' निर्धन बाला ' कविता में कवि ने बाल मनोविज्ञान और ममतामयी मां के कोमल हृदय का जो चित्रण प्रस्तुत किया है , वह पाठक मन को करूणाकलित कर देता है। सहृदय पाठक ' निर्धन बाला ' कविता पढ़कर अश्रुविलगित हुए बिना नहीं रह पाता -
"किसी तरह पा सकी एक रोटी का टुकड़ा,
बड़े प्रेम से, जर्जर वसना, प्रसन्न वदना, 
बैठी घर के द्वार।
और ज्यों ही चाहा खाना उसने।
झपट कहीं से श्वान ले गया।।"
******। ********
"गीली मिट्टी लाकर के , लगी बनाने मधुर रोटियां।
कहती जाती अन्य साथियों से ..........
अभी मिलेगी रोटी 
किन्तु याद रखना मारूंगी 
यदि कुक्कुर छीनेगा रोटी।‌"
*****************
"अपने हिस्से की रोटी को , दिया सुता को ।
खा ले इसको कहते ही नेत्रों से मोती,
अकिंचना के , टपक पड़े भू-तल पर बिखरे।।"

आज सम्पूर्ण भारत में पाश्चात महानगरीय सभ्यता का बोलबाला है। गांव कस्बें बन रहें हैं, कस्बें शहर बन रहें हैं । गांव से लेकर शहर तक का मानव दिखावे के अंधानुकरण में फंसाता जा रहा है, जिसके कारण वह बह बहुत परेशान और दुखी हैं। जिसके कारण चोरी डकैती लूट मार अपहरण बलात्कार जैसी घटनाओं से समाचार पत्र भरें पड़े हैं। समाज के इस अवनति का कारण कवि पाश्चात्य और महानगरीय सभ्यता को ही मानता है। जिसके कारण कवि को हर व्यक्ति में अब उसको रावण दिखाई देता है । राम की संख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है -
"जितने रावण आज धरा पर, उतने राम कहां से आए?
त्रेता में कुबेर लूटते थे,
आज लूट रही निर्धन टोली,
सीता आग मांगते हारी, 
आज रूप की जलती होली।।"

कवि अत्यंत संवेदनशील प्राणी होता है। युगीन चेतना की जितनी गहरी और व्यापक अनुभूति उसे होती है शायद ही और किसी जीव में देखने को मिलें। उसका व्यक्तित्व जितना गरिमामय होंगा उसकी अनुभूति भी उतनी ही ज्यादा गौरवपूर्ण होगी। अनुभूतियों का मूल स्त्रोत यथार्थ में निहित है और किसी अन्य की अपेक्षा कवि यथार्थ के अधिक निकट सम्पर्क में रहता है। त्रिपाठी जी ने 'मुक्त छंद वाटिका' में समाज और संस्कृति का जो आइना चित्रण किया है, वह पूर्ण यथार्थ है । त्रिपाठी जी ने समाज को सिर्फ देखा ही नहीं है बल्कि क्रियात्मक रूप से अनुभव भी किया है। एक उदाहरण देखिए -
" भारत वासी कुछ अधर्म सापेक्ष हो गये,
 बचे खुचे कुछ लोग , धर्म निरपेक्ष हो गये।
 कौन निभाये धर्म-कर्म की रीति निराली,
  जिसके कारण देश रहा ये गौरवशाली।।"

"वैज्ञानिक बना रहे हंस -हंस कर विष के वाण,
जिससे जा सकतें हैं भू के सारे जीवों के प्राण।।"
 
काव्य पाठक मर्म को छूता है, वह उसके आवेग को जगाता है, उसकी संवेदना को दर्द देता है और उसकी बुद्धि को झकझोरता है। बौद्धिकता नई कविता की देन है, किन्तु आवेग और संवेदना तो काव्य के सर्वकालिक गुण हैं। संवेदनशील कवि स्वयं उस पीड़ा का भोक्ता होता है, जिसका वह वर्णन करता है। ' अन्तरात्मा की पुकार ' में जो भी कविता और छंद है वह कवि का भोगा हुआ अतीत है, वर्तमान है और भविष्य भी है। अतीत का एक उदाहरण -
"तन पुलकित मन हर्षित था, सम्पर्क हुआ जब तेरा।
 अब बीत रही क्या मुझ पर , यह हृदय जानता मेरा।।
      ये विरह -व्यथा की बातें, छंदों में नहीं समातीं।
     स्वच्छंद हुई सी आकर, नित अश्रुधार बरसातीं।।"
कवि के आशय की अभीसिप्त व्यंजना काव्य भाषा का प्रयोजन है आशय की अनुरूपता के साथ भाषा का स्वरूप-विधान कविता की भाषा -योजना का प्रमुख नियामक तत्व हैं। दूसरे शब्दों में भाव और भाषा का बहुत गहरा सम्बन्ध है। कालिदास ने 'वागर्थाविव सम्पृक्ति वागर्थ प्रतिपत्तये ' कहकर काव्य की भाषा और उसके आशय के सम्पृक्त होने का उल्लेख किया है। 'गिरा अरथ जल बीचि समय कहियत भिन्न न भिन्न ' के द्वारा तुलसीदास ने वाणी और अर्थ की अभिन्नता द्योतित की है। अर्थात काव्य -भाषा का आदर्श स्वरूप वहीं है जो कवि के वक्तव्य को उत्कृष्ट रूप में अभिव्यक्त कर सके। त्रिपाठी जी की भाषा में भाव , वाणी और वक्तव्य को सरल तरीके से प्रस्तुत किया गया है, सरल व्यवहारिक भाषा,व्यंग्यात्मकता, यथार्थ के कारण कविता की भाषा में तीखापन है, साथ ही आध्यात्मिक और विनयपरक कविताओं में भाषा का वही मधुर और प्रौढ़ रूप मिलता है। समष्टि रूप से यह कहा जा सकता है कि त्रिपाठी जी की भाषा में कोमलता और माधुर्य के साथ ओज का प्रान्त रहा है।
अन्त में यह कहना चाहता हूं कि त्रिपाठी जी की रचना 'अन्तरात्मा की पुकार ' अत्यंत सशक्त रूप में पाठकों को प्रभावित करती है। यही त्रिपाठी जी के काव्य की महानता है किन्तु इतने पर भी हमें यह ध्यान रखना होगा । किसी भी काव्य का अभिशंसात्मक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता, क्योंकि काव्य सभी 'गरिमामावाची '
अयथार्थ तत्वों से परे है। हम कह सकते हैं कि -
अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापतिः |
यथा वै रोचते विश्वं तत्थेदं परिवर्तते ||
'यह अपार काव्य संसार में कवि सृष्टा ब्रह्म के
समान आचरण करता है |'
यूपी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य

प्रसिद्ध पंक्तियां

कवियों एवं लेखको की प्रसिद्ध पंक्तियां 


०1. ’तोडने ही होंगे मठ और गढ सब’ किसकी पंक्ति है?
उत्तर——– मुक्तिबोध
०2. ’द्रुत झरो जगत के जीर्णपत्र’ पंक्ति के रचनाकार
कौन हैं?
उत्तर——– सुमित्रानन्दन पन्त
०3. ’उत्तर प्रियदर्शी’किसकी गीति-नाट्य
रचना है?
उत्तर——– अज्ञेय
०4. ’केसव कहि न जाइका कहिए! देखत तब
रचना बिचित्र अति,समुझि मनहि मन रहिए!’
किसकी पंक्ति है?
उत्तर——– तुलसीदास
०5. ’रावरे रूपको रीति अनूप,
नयो नयो लागतज्यों ज्यों निहारिये’ -किसकी पंक्ति है?
उत्तर——– घनानन्द

०6. प्रसिद्ध हिन्दी पत्रिका ’कल्पना’ कहॉं से प्रकाशित
होती थी?
उत्तर——– हैदराबाद
०7. ’कोमल गांधार’ नाटक के रचनाकार कौन हैं?
उत्तर——– शंकर शेष
०8. ’मुक्ति का रहस्य’नाटक किसकी कृति है?
उत्तर——– लक्ष्मीनारायण मिश्र
०10. ’हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास’
किसकी कृति है?
उत्तर——– गणपतिचन्द्र गुप्त

०11. ’हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक
इतिहास’ के रचनाकार कौन हैं?
उत्तर——– डॉ0 रामकुमार वर्मा
०12. ’हिन्दी साहित्य की संवेदना का विकास’
किसकी रचना है?
उत्तर——-
रामस्वरूप चतुर्वेदी
०13. ’कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल पुथल मच
जाए’ किसकी पंक्ति है?
उत्तर——– बालकृष्ण शर्मा नवीन
०14. मध्यवाचार्य किस सम्प्रदाय के संस्थापक हैं?
उत्तर——– द्वैतवाद
०15. किन रचनाकारों की भाषा को
संधा भाषा कहा गया?
उत्तर——– बौद्ध-सिद्ध

०16. ’धिक् जीवन जो पाता ही आया विरोध
’ किसकी पंक्ति है?
उत्तर——– निराला
०17. ’दुःखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनी’
किसकी कहानी है?
उत्तर——– चतुरसेन शास्त्री
०18. ’मधुप गुनगुना कर कह जाता’ किसकी पंक्ति है?
उत्तर——– जयशंकर प्रसाद
०19. ’मर्द साठे पर पाठे होते हैं।’ किसकी उक्ति है?
उत्तर——– प्रेमचंद
०20. ’ये उपमान मैले हो गये हैं’ किसकी पंक्ति है?
उत्तर——– अज्ञेय
यूपी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य
०21. ’हम राज्य लिये मरते हैं’ किसकी काव्य-पंक्ति है?
उत्तर——– मैथिलशरण गुप्त
०22. ’हिन्दी व्याकरण’ किसकी रचना है?
उत्तर——– कामताप्रसाद गुरु
०23.’हिन्दी शब्दानुशासन’ किसने लिखा है?
उत्तर——– किशोरीदास वाजपेई
०24.’हिन्दी भाषा का उद्भव और विकास’ किसकी रचना है?
उत्तर——– उदय नारायण तिवारी
०25. ’देवीदीन’ मुंशी प्रेमचन्द के किस
उपन्यास का पात्र है?
उत्तर——– गबन

०26. ’प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्म’ किसका ग्रन्थ है?
उत्तर——– रिचर्ड्स
०27. ’सेक्रेड वुड’ किसकी रचना है?
उत्तर——– टी.एस. इलियट
०28. ’लिरिकल बैलेडस’ किसने लिखा है?
उत्तर——– विलियम वर्ड्सवर्थ
०29. ’पोयटिक्स’ किसकी कृति है?
उत्तर——– अरस्तू
०30. ’जात पांत पूछै नहिं कोई’ किसकी पंक्ति है?
उत्तर——– रामानन्द
०31. ’प्रेम प्रेम ते होय प्रेम ते पारहिं पइए’ पंक्ति के
रचनाकार कौन हैं?
उत्तर——– सूरदास
०32. ’आधुनिक काल में गद्य का आविर्भाव सबसे प्रधान
घटना है’ किसका कथन है?
उत्तर——– आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
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हिन्दी व्याकरण से महत्वपूर्ण प्रश्न

हिन्दी व्याकरण से महत्वपूर्ण प्रश्न 


प्रश्‍न 1- जिन शब्दों के अन्त में ‘अ’ आता है, उन्हें क्या कहते है।
उत्‍तर – अकारांत कहते है।

प्रश्‍न 2- हिन्दी वर्ण माला में अयोगवाह वर्ण कौन से है।
उत्‍तर – अं , अ: वर्ण अयोगवाह वर्ण है ।

प्रश्‍न 3- हंस मे लगा ( ं ) चिन्ह कहलाता है।
उत्‍तर – अनुस्वार

प्रश्‍न 4- चॉद शब्द‍ में लगा ( ँ ) चिन्ह कहलाता है।
उत्‍तर – अनुनासिक ।

प्रश्‍न 5- भाषा की सबसे छोटी इकाई क्या है।
उत्‍तर – वर्ण ।

प्रश्‍न 6- जिन शब्दों में किसी प्रकार का विकार या परिवर्तन नही होता, उसे क्या कहते है।
उत्‍तर – तत्सम ।

प्रश्‍न 7- कार्य के होने का बोध कराने वाले शब्द को क्या् कहते है।
उत्‍तर – क्रिया कहते है।

प्रश्‍न 8- भाषा के शुद्ध रूप का ज्ञान किससे होता है।
उत्‍तर – व्याकरण से होता है।

प्रश्‍न 9- विशेषण जिस शब्द की विशेषता बताते है, उसे क्या कहते है।
उत्‍तर – विशेष्ये ।

प्रश्‍न 10- हिन्दी में लिंग का निर्धारण किस से होता है।
उत्‍तर – संज्ञा से ।

प्रश्‍न 11- क्रिया का मूल रूप क्या् कहलाता है।
उत्‍तर – धातु ।

प्रश्‍न 12- सर्वनाम के साथ प्रयुक्त होने वाली विभक्तियॉं होती है।
उत्‍तर – संश्लिष्ट ।

प्रश्‍न 13- हिन्दी में कारक चिन्ह कितने होते है।
उत्‍तर – 8 होते है।
जबकि संस्कृत भाषा में कारक चिन्ह 7 होते है।

प्रश्‍न 14- संज्ञा कितने प्रकार की होती है।
उत्‍तर – संज्ञा 5 प्रकार की होती है।
1. व्यवक्ति वाचक संज्ञा
2. जाति वाचक संज्ञा
3. भाव वाचक संज्ञा
4. समूह वाचक संज्ञा
5. द्वव्या वाचक संज्ञा

प्रश्‍न 15- वे शब्द‍ जो विशेषण की भी विशेषता बतलाते है। उन्हे क्या कहते है।
उत्‍तर – प्रविशेषण ।

प्रश्‍न 16- सर्वनाम किसे कहते है।
उत्‍तर – सर्वनाम वे शब्द कहलाते है। जो संज्ञा के स्थान पर प्रयोग मे लाये जाते है।
जैसे – यह , वह , वे , उनका , इनका , इन्हे आदि

प्रश्‍न 17- सर्वनाम के कितने भेद होते है।
उत्‍तर – सर्वनाम के 6 भेद होते है।
1. पुरूषवाचक सर्वनाम
2. निश्चवयवाचक सर्वनाम
3. अनिश्चायवाचक सर्वनाम
4. प्रश्नावाचक सर्वनाम
5. संबंधवाचक सर्वनाम
6. निजवाचक सर्वनाम

प्रश्‍न 18- क्रिया किसे कहते है।
उत्‍तर – जिस शब्द – से किसी काम के करने या होने का बोध हो उसे क्रिया कहते है।
जैसे – खाना , हँसना , रोना , बैठना आदि

प्रश्‍न 19- क्रिया मुख्य रूप से कितने प्रकार की होती है।
उत्‍तर – मुख्य रूप से क्रिया 2 प्रकार की होती है।
1. अकर्मक क्रिया
2. सकर्मक क्रिया

प्रश्‍न 20- काल कितने प्रकार के होते है।
उत्‍तर – काल 3 प्रकार के होते है।
1. वर्तमान काल
2. भूतकाल
3. भविष्य काल

प्रश्‍न 21- ‘श’ व्‍यंजन का उच्‍चारण स्‍थान कौन सा है।
उत्‍तर – तालु ।

प्रश्‍न 22- ‘व’ वर्ण का उच्‍चारण स्‍थान कौन सा है ।
उत्‍तर – दन्‍त + ओष्‍ठ ।

प्रश्‍न 23- ‘ड.’ का उच्‍चारण स्‍थान क्‍या है।
उत्‍तर – कण्‍ठ ।

प्रश्‍न 24- ‘क’ वर्ण उच्‍चारण की दृष्टि से क्‍या है।
उत्‍तर – कंठ्य ।

प्रश्‍न 25- वर्ग के द्वितीय व चतुर्थ व्‍यंजन क्‍या कहलाते है।
उत्‍तर – महाप्राण ।

प्रश्‍न 26- ‘ए’ और ‘ऐ’ का उच्‍चारण स्‍थान है।
उत्‍तर – कंठतालु ।

प्रश्‍न 27- ‘घ’ का उच्‍चारण स्‍थान क्‍या है
उत्‍तर – कंठ ।

प्रश्‍न 28- वर्ण के प्रथम, तृतीय व पंचम वर्ण क्‍या कहलाते है।
उत्‍तर – अल्‍पप्राण ।

प्रश्‍न 29- मात्रा के आधार पर हिन्‍दी स्‍वरों के दो भेद कौन से है।
उत्‍तर – हस्‍व और दीर्घ ।

प्रश्‍न 30- सर्वनाम के साथ प्रयुक्‍त्‍ा होने वाली विभक्तियॉ होती है ।
उत्‍तर – संश्लिष्‍ट ।

प्रश्‍न 31- ‘शिक्षक विद्यार्थी को हिन्‍दी पढ़ाते है। वाक्‍य में क्रिया के किस रूप का प्रयोग हुआ है।
उत्‍तर – द्विकर्मक क्रिया ।

प्रश्‍न 32- ‘मुझे’ किस प्रकार का सर्वनाम है।
उत्‍तर – उत्‍तम पुरूष ।

प्रश्‍न 33- मानव शब्‍द का विशेषण बनेगा ।
उत्‍तर – मानवीय ।

प्रश्‍न 34- चिडि़या आकाश में उड़ रही है। उस वाक्‍य में उड़ रही क्रिया किस प्रकार की है।
उत्‍तर – अकर्मक ।

प्रश्‍न 35- पशु शब्‍द का विशेषण है।
उत्‍तर – पाशविक ।

प्रश्‍न 36- नेत्री शब्‍द का पुल्लिंग रूप है।
उत्‍तर – नेता ।

प्रश्‍न 37- उत्‍कर्ष का विशेषण क्‍या होगा ।
उत्‍तर – उत्‍कृष्‍ट ।

प्रश्‍न 38- काम का तत्‍सम रूप है।
उत्‍तर – कर्म ।

प्रश्‍न 39- दूध का तत्‍सम रूप क्‍या है।
उत्‍तर – दुग्‍ध ।

प्रश्‍न 40- प वर्ग का उच्‍चारण मुँह के किस भाग से होता है।
उत्‍तर – ओष्‍ठ ।

हिन्दी साहित्य विषय काव्य

 हिन्दी साहित्य विषय - काव्य 
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1 काव्य के तत्व माने गए है - 
दो
2 महाकाव्य के उदाहरण है - 
रामचरित मानस, रामायण, साकेत, महाभारत, पदमावत, कामायनी, उर्वशी, लोकायतन, एकलव्य आदि
3 मुक्तक काव्य के उदाहरण है- 
मीरा के पद, रमैनियां, सप्तशति
4 काव्य कहते है - 
दोष रहित, सगुण एवं रमणियार्थ प्रतिपादक युगल रचना को
5 काव्य के तत्व है - 
भाषा तत्व, बुध्दि या विचार तत्व, कल्पना तत्व और शैली तत्व

6 काव्य के भेद है - 
प्रबंध (महाकाव्य और खण्ड काव्य), मुक्तक काव्य
7 वामन ने काव्य प्रयोजन माना -
दृष्ट प्रयोजन (प्रीति आनंद की प्राप्ति) अदृष्ट प्राप्ति (कीर्ति प्राप्ति)
8 भामह की काव्य परिभाषा है - 
शब्दार्थो सहित काव्यम
9 प्रबंध काव्य का शाब्दिक अर्थ है - 
प्रकृष्ठ या विशिष्ट रूप से बंधा हुआ।
10 रसात्मक वाक्यम काव्यम परिभाषा है - 
पंडित जगन्नाथ का

11 काव्य के कला पक्ष में निहित होती है - 
भाषा
12 काव्य में आत्मा की तरह माना गया है- 
रस
13 तद्दोषों शब्दार्थो सगुणावनलंकृति पुन: क्वापि, परिभाषा है -
मम्मट की
14 काव्य के तत्व विभक्त किए गए है- 
चार वर्गो में प्रमुखतया रस, शब्द
15 कवि दण्डी ने काव्य के भेद माने है- 
तीन

16 रमणियार्थ प्रतिपादक शब्द काव्यम की परिभाषा दी है - 
आचार्य जगन्नाथ ने
17 काव्य रूपों में दृश्य काव्य है - 
नाटक
18 काव्य प्रयोजन की दृष्टि से मत सर्वमान्य है - 
मम्मटाचार्य का
19 काव्य प्रयोजनों में प्रमुख माना जाता है।
आनंदानुभूति का
20 काव्य रचना का प्रमुख कारण (हेतु) है - 
प्रतिभा का

21 महाकाव्य और खण्ड काव्य में समान लक्षण है - 
कथानक उपास्थापन एक जैसा होता है।
22 काव्य रचना के सहायक तत्व है - 
वर्ण्य विषय(भाव), अभिव्यक्ति पक्ष (कला), आत्म पक्ष
23 मम्मट के काव्य प्रयोजन है - 
यश, अर्थ, व्यवहार ज्ञान, शिवेतरक्षति, संघ पर निवृति, कांता सम्मलित
24 मम्मट के शिवेतर का अभिप्राय है –
अनिष्ट
25 सगुणालंकरण सहित दोष सहित जो होई... परिभाषा है - 
चिंतामणि की

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मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

जगद्गुरु रामभद्राचार्य के ‘अरूंधती’ महाकाव्य में स्त्री विमर्श

जगद्गुरु रामभद्राचार्य के  ‘अरूंधती’ महाकाव्य में स्त्री विमर्श
 
“ बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
अमिय मूरिमय चूरन चारु। समन सकल भव रुज परिवारू।।"
जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी के चरण-कमलों की धूल की बंदना करता हूं।जो सुगंध स्वाद से भरपूर है, और जन्म - मृत्यु के सभी रोगों को नाश करने वाली संजीवनी बूटी के समान है। जगद्गुरु जी का 77 वें जन्मदिन  दिवस पर उनके श्री चरणों में कोटि-कोटि नमन।

प्रथम अध्याय -
प्रस्तावना 
क-  जगतगुरु रामभद्राचार्य आचार्य जी का 
साहित्यिक परिचय 
ख-  एक प्रज्ञाचक्षु रचनाकार के रूप में उनकी विलक्षणता 
ग-  महाकाव्य की परंपरा और अरुंधती संस्कृति और हिंदी महाकाव्य की 
      पृष्ठभूमि 
घ-   अरुंधती का स्थान
ङ-    शोध की प्रासंगिकता 
च-  आधुनिक युग में इस महाकाव्य के अध्ययन की आवश्यकता

द्वितीय अध्याय-
क-  अरुंधती का कथानक और पात्र परिकल्पना 
ख-कथानक के आधार पौराणिक संदर्भ और जगतगुरु द्वारा किया गया मौलिक नवाचार 
ग- पात्र  परिचय
अरुंधति और वशिष्ठ के चरित्र का मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण 
घ- सहयोगी पात्र 
क-  समाज और ऋषि परंपरा के अन्य पात्र का महत्व

तृतीय अध्याय -
क-  जगतगुरु की दृष्टि में ना विमर्श अधिकार और मेधा
ख- अरुंधति के माध्यम से स्त्री की बौद्धिक स्वतंत्रता का चित्रण
ग-  पारिवारिक एवं सामाजिक भूमिका
घ-   एक पत्नी माता और आचार्य के रूप में अरुंधति का गौरव
च-  रूढ़ियों का खंडन स्त्री के प्रति संकीर्ण मान्यताओं पर गुरु जी का साहित्यिक प्रहार 

चतुर्थ अध्याय -
क-  दार्शनिक एवं आध्यात्मिक पक्ष
ख- दांपत्य योग गृहस्थ जीवन को तपोवन बनाना 
ग- प्रकृति एवं संस्कृत काव्य में वर्णित प्रकृति एवं उसका आध्यात्मिक अर्थ 
घ- भारतीय नारी को स्थापित करना 

पंचम अध्याय -
क-    भाषा शिल्प एवं रस योजना 
ख-  भाषा सौष्ठव- संस्कृतनिष्ठ  हिंदी और छंदों का प्रभावी प्रयोग 
ग-   रस - विवेचन शांत करूं और श्रृंगार का समावेश 
घ-   अलंकार विधान - काव्य सौंदर्य बढ़ाने वाले प्रमुख अलंकारों का प्रयोग 

षष्ठ अध्याय-

उपसंहार एवं निष्कर्ष –

शोध का निष्कर्ष
क-   महाकाव्य के माध्यम से प्राप्त होने वाला सार्वभौमिक संदेश 
ख-  आधुनिक समाज के लिए प्रासंगिकता 
ग-    नारी सशक्तिकरण के क्षेत्र में अरुंधती की भूमिका
संदर्भ सूची ग्रंथ
१- अरूंधती महाकाव्य- जगद्गुरु रामभद्राचार्य (तुलसी पीठ प्रकाशन चित्रकूट)
२- अष्टावक्र महाकाव्य – जगद्गुरु रामभद्राचार्य 
३-  राघवकृपाभाष्यम् – जगद्गुरु रामभद्राचार्य 
४- अहिल्योद्धार – जगद्गुरु रामभद्राचार्य 
५-  सीताराम विवाह दर्शन – जगद्गुरु रामभद्राचार्य 

संक्षिप्त जीवन परिचय

जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, जैसे अनेकानेक भाषाओं के ज्ञाता, प्रख्यात साहित्यकार , व्याकरणाचार्य , प्राचीन एवं अर्वाचीन और करण संवत कथाकार, सनातन संस्कृति के प्रखर सूर्य, 58वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित(2023), पद्मविभूषण (2015) से विभूषित, (2005) में साहित्य 
अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एवं महामहोपाध्याय के मानद उपाधि से गौरवान्वित जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी एक ऐसी विलक्षण विभूति है। जिनके लिए शब्द कम पड़ जाते हैं, उनकी विद्वता तपस्या और साहित्य साधना को शब्दों में व्यक्त करना हिमालय को दर्पण दिखाने जैसा है।
जन्म स्थान - ऐसे महाकवि का जन्म १४ जनवरी १९५० मकर संक्रांति के एकादशी के माध्य रात्रि को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के सुजानगंज क्षेत्र के साड़ी खुर्द ( जो आज इनकी  मां शची देवी के नाम पर शचीपुरम् नाम से  जाना जाता है) में माता श्रीमती शची देवी  से हुआ था । इनके पिता श्री रामदेव मिश्र थे।  इनके बचपन का नाम गिरिधर मिश्रा था। ११नवम्बर १९८३ की कार्तिक पूर्णिमा के परम पावन दिवस पर श्री रामानंद सम्प्रदाय में विरक्त दीक्षा लेकर श्री रामभद्र दास नाम से समलंकृत हुए। 
बालक गिरिधर का जीवन सामान्य रूप से शुरू हुआ था, लेकिन महज दो महीने की आयु में एक त्रासदी घटित हुई। उनकी आँखों में 'रोहे' (Trachoma) नामक संक्रमण हो गया था। गाँव में उचित चिकित्सा सुविधा न होने के कारण, एक वृद्ध महिला ने उनकी आँखों में एक देशी दवा (जड़ी-बूटी का लेप) लगा दी, जिससे उनकी आँखों से रक्तस्राव शुरू हो गया और उन्होंने अपनी दोनों आँखों की रोशनी हमेशा के लिए खो दी।
इलाज के लिए उन्हें लखनऊ के किंग जॉर्ज अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी दृष्टि वापस नहीं आ सकी।
शिक्षा- प्रारम्भिक शिक्षा सर्वप्रथम पूज्य पितामह श्री सूर्यबली मिश्र के द्वारा गीता और मानस का आद्यन्त कंठस्थीकरण आठ वर्ष की अल्पायु में ही कराया गया था। तदुपरान्त स्थानीय आदर्श श्री गौरीशंकर संस्कृत विश्वविद्यालय पांच वर्ष पर्यन्त पाणिनीय व्याकरण की आरम्भिक शिक्षा सम्पन्न करके विशेष अध्ययन हेतु वाराणसी स्थित सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रवेश। परीक्षा के हर स्तर पर सर्वातिशायी अंकों की प्राप्ति तथा विभिन्न प्रकार की स्थानीय एवं राष्ट्रीय प्रतियोगिता में प्रथम स्थान अनेकानेक स्वर्ण पदकों से सम्मानित तथा आचार्योंपाधि प्राप्त्योपरान्त यू.जी.सी. के द्वारा "आध्यात्मरामायणे अपाणनीय प्रयोगाणाम विमर्श:" विषय पर १९८१ में शोध सम्पन्न कर विद्यावारिधि(Ph.D)की उपाधि प्राप्त किया।

साहित्य साधना - 
प्रकाशित कृतियों का विवरण -
१-मुकुन्द स्मरणम भाग १एवं २ २- भारत महिमा ३- मानस में तापस प्रसंग ४- परम बडभागी जटायू ५- काका विदुर(हिन्दी खंड काव्य) ६- मां सबरी (हिन्दी खंड काव्य) ७- जानकी कृपा कटाक्ष (संस्कृत स्त्रोत काव्य) ८- सुग्रीव की 
कुचाल एवं विभीषण की करतूत, ९- श्री गीता तात्पर्य (दर्शन ग्रंथ) १०- तुलसी साहित्य में कृष्ण कथा(समीक्षात्मक ग्रंथ), ११- सनातन धर्म की विग्रह स्वरूपा गौ माता, १२- मानस में सुमित्रा, १३- श्री रामानंद सिद्धांत चन्द्रिका( संस्कृत में दर्शन ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित), १४- भक्ति गीत शुधा (गीत काव्य) १५- श्री नारद भक्ति सूत्रेषु राघव कृपा भाष्यम् ( हिन्दी अनुवाद सहित),
जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी एक अत्यंत विपुल रचनाकार हैं। उन्होंने संस्कृत, हिंदी, अवधी, मैथिली और अन्य कई भाषाओं में 100 से अधिक पुस्तकों की रचना की है। यहाँ उनकी कुछ  अन्य प्रमुख प्रकाशित रचनाओं की सूची प्रस्तुत है, जिन्हें विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
महाकाव्य
१- श्रीभार्गवराघवीयम् (संस्कृत): 2002 में 
प्रकाशित, इस महाकाव्य में 40 सर्ग हैं। इसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला है।
२- अष्टावक्र (हिंदी): 2010 में प्रकाशित, यह महाकाव्य ऋषि अष्टावक्र के जीवन पर आधारित है।
३- अरुंधती (हिंदी): 1994 में प्रकाशित, यह ऋषि वशिष्ठ और उनकी पत्नी अरुंधती के जीवन पर आधारित है।
खंडकाव्य-
१- आजादचन्द्रशेखरचरितम् (संस्कृत): स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद पर आधारित।
२- सरयुलहरी (संस्कृत): सरयू नदी की स्तुति में शतक।
३- भृंगदूतम् (संस्कृत): कालिदास के मेघदूतम् की शैली में एक दूतकाव्य।
४- काकविडांबना (संस्कृत): कौवों के माध्यम से शोषक वर्ग पर व्यंग्य।
नाटक -
१- श्रीराघवाभ्युदयम् (संस्कृत): भगवान राम के अभ्युदय पर आधारित एक नाटक।
२- उत्साह (हिंदी): एक एकांकी नाटक संग्रह।
टीका और भाष्य (Commentaries)
उन्होंने 'प्रस्थानत्रयी' (ब्रह्मसूत्र, उपनिषद और भगवद गीता) पर विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार भाष्य लिखे हैं:
३- श्रीराघवकृपाभाष्यम्: ब्रह्मसूत्र, भगवद गीता और ईशावास्यादि ग्यारह उपनिषदों पर संस्कृत भाष्य।
४- श्रीरामचरितमानस: रामचरितमानस पर उनकी विस्तृत टीका काफी प्रसिद्ध है।
गीत और स्तोत्र५- राघवगीतगुंजन (हिंदी): गीतों का संग्रह।६- श्रीसीतारामसुप्रभातम (संस्कृत): भगवान राम और सीता की प्रातःकालीन स्तुति।
इनके अलावा, उन्होंने अष्टाध्यायी (पाणिनी 
व्याकरण) पर भी कार्य किया है और अनेक प्रवचन संग्रह भी प्रकाशित हैं।
अरूंधति महाकाव्य का संक्षिप्त परिचय -
प्रस्तुत "अरूंधती" महाकाव्य के प्रणेता वाचस्पति, शास्त्र मर्मज्ञ, आध्यात्म सिंधु, युगद्रष्टा,शब्द ऋषि, सारस्वत प्रतिभा सम्पन्न पौराणिक कथाओं के मर्मज्ञ वैदिक वाङ्मय के महाप्राज्ञा सर्वाम्नाय तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज है। संस्कृत भाषा निष्णात कवि पुंगव पूज्यपाद श्री आचार्य जी ने इस महाकाव्य की सर्जनात्मक परिधि में वेद सम्मत आस्तिक दर्शन के शास्वत सिद्धांत का अनुशीलन भारतीय सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में प्रतिबिम्बित करते हुए मानव जीवन की सम्पूर्ण कलावधि की विकासोन्मुख भावदशाओं का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विम्बनिरूपण- सृष्टि, प्रणय, प्रीति, परितोष, प्रतिक्षा, अनुनय, प्रतिशोध, क्षमा, शक्ति, उपराम, प्रबोध, भक्ति, उपलब्धि, 
उत्कंठा और प्रमोद सरिस पंचदश‌सर्गान्तर्गत शीर्षकों में एवं द्विदशशतसप्तनवति पदों में व्यक्त किया है। जो निम्नलिखित हैं -
अरुन्धती का जन्म और विवाह:
कथा का आरम्भ अरुन्धती के परिचय से होता है। वह ऋषि कर्दम और माता देवहूति की आठवीं पुत्री हैं। उनका विवाह ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि वशिष्ठ के साथ होता है। यह जोड़ी वैदिक संस्कृति में आदर्श दांपत्य जीवन का प्रतीक मानी जाती है। विवाह के समय ब्रह्मा जी उन्हें आशीर्वाद देते हैं कि भविष्य में उन्हें भगवान राम के दर्शन प्राप्त होंगे।

​विश्वामित्र से संघर्ष और पुत्र वियोग:
कथा में एक प्रमुख मोड़ तब आता है जब राजा विश्वरथ (जो बाद में विश्वामित्र बने) वशिष्ठ की कामधेनु गाय को बलपूर्वक छीनने का प्रयास करते हैं। वशिष्ठ के ब्रह्मदंड के सामने विश्वरथ की शक्ति क्षीण हो जाती है। प्रतिशोध की ज्वाला में 
जलते हुए विश्वामित्र, वशिष्ठ और अरुन्धती के 100 पुत्रों को मृत्यु का श्राप दे देते हैं। यह अरुन्धती के लिए अत्यंत कष्टकारी समय होता है, फिर भी वह अपने धैर्य और तपोबल से विचलित नहीं होतीं।
​पुनर्निर्माण और शक्ति का जन्म:
इतने बड़े दु:ख के बाद भी अरुन्धती और वशिष्ठ क्षमाशीलता का परिचय देते हैं। कालान्तर में उन्हें 'शक्ति' और 'सुयज्ञ' नामक पुत्रों की प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यवश, विश्वामित्र के उकसावे पर एक राक्षस द्वारा शक्ति का भी वध कर दिया जाता है। इसके बाद अरुन्धती अपने पौत्र (शक्ति के पुत्र) 'पराशर' का पालन-पोषण करती हैं और उसे शिक्षा देती हैं।
​राम की प्रतीक्षा और वनवास:
ब्रह्मा के वरदान के अनुसार, यह ऋषि दम्पति भगवान राम की प्रतीक्षा में अपना जीवन वानप्रस्थ आश्रम में व्यतीत करने लगते हैं। वे 
अयोध्या के पास एक आश्रम में रहने लगते हैं। जब राम का जन्म होता है, तो वशिष्ठ और अरुन्धती अत्यंत हर्षित होते हैं। राम और अरुन्धती के पुत्र सुयज्ञ, दोनों वशिष्ठ के आश्रम में एक साथ शिक्षा ग्रहण करते हैं।
​सीता से भेंट और राम वनवास:
मिथिला में राम-सीता विवाह के बाद, जब नवविवाहित जोड़ी अयोध्या आती है, तब अरुन्धती पहली बार सीता जी से मिलती हैं। अरुन्धती सीता को पुत्रीवत स्नेह देती हैं। इसके पश्चात राम को 14 वर्ष का वनवास होता है, जो अरुन्धती के लिए पुनः एक प्रतीक्षा का काल बन जाता है।
​3. महाकाव्य का समापन
​कथा का समापन राम के वनवास से लौटने के बाद होता है। 14 वर्षों के बाद जब राम और सीता अयोध्या लौटते हैं, तो वे अरुन्धती और 
वशिष्ठ के आश्रम में जाते हैं। यहाँ एक अत्यंत भावुक प्रसंग आता है जहाँ अरुन्धती स्वयं अपने हाथों से भोजन बनाकर राम और सीता को खिलाती हैं। इसी मिलन और भोजन के प्रसंग के साथ महाकाव्य का सुखद अंत होता है।
 
 
आपने अरूंधती के माध्यम से संसार को यह बोध कराया है कि भारतीय सांस्कृतिक में स्त्री केवल अनुगामिनी नहीं, अपितु ऋषियों की भी मार्गदर्शक एवं तपो भूमि है।इस महाकाव्य में नारी विमर्श का उदात्त रूप आपने प्रस्तुत किया है वह आधुनिक जगत के लिए अनुकरणीय है। 
प्रस्तुत महाकाव्य में करूण,वीर एवं शांत रस की त्रिवेणी प्रवाहित होती है आपकी लेखनी ने संस्कृत और शास्त्रीयता और हिंदी की तरलता को जिस प्रकार से एकाकर किया है, वह आपकी उभय भाषाचक्रवर्ती उपाधि को सार्थक 
करता है । अरुंधति महाकाव्य आध्यात्मिक तर्पण है,  जिसमें गृहस्थ जीवन पवित्रता और बैराग्य की पराकाष्ठा एक साथ दिखाई पड़ती है आपने वशिष्ठ और अरुंधती के संबंधों के माध्यम से दांपत्य जीवन की जो व्याख्या की है वह हिंदी साहित्य में अद्वितीय है।
आपकी भाषा कालिदास के लालित्यपूर्ण शैली और तुलसीदास की भक्ति प्रवणता का अनूठा संगम है। अलंकारों का सहज प्रयोग और छंदों की गतिशीलता पाठक को उस युग में ले जाती है, जहां ऋषि और देव संवाद करते थे।
 'अरुंधति'  शब्द-  शब्द मंत्र की भांति पवित्र और प्रभावशाली है। जहां प्रज्ञा और करुणा का मिलन होता है वही अरुंधती जैसा चरित्र जन्म लेता है।
अरुंधति महाकाव्य आधुनिक काल  में आर्ष काव्य परंपरा का पुनरूद्धार है, इसमें केवल शब्दों का चमत्कार नहीं अपितु  अनुभूतियों का 
साक्षात्कार है। इस महाकाव्य में आपने यह सिद्ध किया है कि ज्ञान एवं भक्ति परस्पर विरोधी नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं।

महाकाव्य पर शोध की आवश्यकता
इस महाकाव्य पर शोध की आवश्यकता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
१.   नारी गरिमा और सशक्तिकरण का पुनरुद्धार
प्राचीन भारतीय साहित्य में ऋषियों की चर्चा अधिक होती है, जबकि ऋषिकाओं (विदुषी महिलाओं) का जीवन अक्सर पृष्ठभूमि में रह जाता है।
नायिका-प्रधान महाकाव्य: यह महाकाव्य वशिष्ठ 
की पत्नी अरुंधती को केंद्र में रखकर लिखा गया है। शोध के माध्यम से यह सामने लाया जा सकता है कि कैसे कवि ने एक पौराणिक नारी पात्र को आधुनिक संदर्भ में ‘सशक्त नारी’ के रूप में प्रस्तुत किया है।
शिक्षा और अधिकार: इसमें नारी शिक्षा और समाज में उनके समान अधिकारों की वकालत की गई है, जो वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक है।
२.   भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की स्थापना
वर्तमान दौर में जब सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है, ‘अरुंधती’ महाकाव्य भारतीय गृहस्थ जीवन के आदर्शों को प्रस्तुत करता है।
दांपत्य जीवन का आदर्श: वशिष्ठ और अरुंधती का जीवन दांपत्य प्रेम, त्याग और सहधर्मचारिणी के रूप में आदर्श प्रस्तुत करता है। शोध द्वारा यह स्थापित किया जा सकता है 
कि सफल गृहस्थ जीवन के लिए आपसी सामंजस्य कितना आवश्यक है।
समन्वयवादी दृष्टिकोण: ग्रंथ में विभिन्न दार्शनिक मतों और सामाजिक वर्गों के बीच समन्वय का प्रयास है, जिसे शोध द्वारा और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।
३.   साहित्यिक और भाषाई महत्व
हिंदी साहित्य में महाकाव्य परंपरा क्षीण होती जा रही थी, जिसे इस ग्रंथ ने पुनर्जीवित किया है।
रस और अलंकार योजना: इस महाकाव्य में ‘करुण’ और ‘शृंगार’ रस का अद्भुत परिपाक है। शोधकर्ता इसके छंद, बिम्ब और अलंकारों के प्रयोग का विश्लेषण कर हिंदी साहित्य की समृद्धि को उजागर कर सकते हैं।
संस्कृतनिष्ठ हिंदी: इसकी भाषा शैली पर शोध करने से यह समझा जा सकता है कि कैसे तत्सम शब्दावली का प्रयोग करते हुए भी भावों को सहजता से व्यक्त किया जा सकता है।
४.   उपेक्षित पात्रों को न्याय
रामायण और अन्य पौराणिक कथाओं में अरुंधती का उल्लेख मिलता है, लेकिन उनका विस्तृत जीवन परिचय दुर्लभ है। इस महाकाव्य पर शोध करने से एक उपेक्षित पौराणिक चरित्र के व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम (जैसे उनकी तपस्या, विद्वता और मातृत्व) समाज के सामने आ सकेंगे।
५.   आधुनिक समस्याओं का समाधानकवि ने पौराणिक कथा के माध्यम से आज की समस्याओं (जैसे जातिवाद, नारी शोषण, शिक्षा का अभाव) पर भी प्रकाश ला है। शोध का एक उद्देश्य यह खोजना हो सकता है कि यह महाकाव्य आधुनिक सामाजिक चुनौतियों के क्या समाधान प्रस्तुत करता है।
अन्त में महाकवि के लिए दो शब्द-
नयनों न अस्ति मस्त ज्ञानचक्षु विराजते,
साहित्य सिंधु हंसाय,रामभद्राय ते नमः।।
 अर्थात जिनके भौतिक नेत्र नहीं है, पर ज्ञान के चक्षु विराजमान है, साहित्य रूपी सागर के उस राजहंस जगतगुरु रामभद्राचार्य को कोटि-कोटि नमन।