सुभाष चन्द्रिका (महाकाव्य)
सुभाष चंद्रिका प्रथम सर्ग शर्वरी थी अति भयानी, व्योग ज्यो॔ अंजन बरसता। छा गयी निस्तब्धता थी, लुप्त भूतल की सरसता” घोर सन्नाटा चतुर्दिक, सनसनाता तिमिर तक्षक। विष भयंकर वमन करता- बढ़ रहा ज्यों रात्रि-रक्षक “ तमस का साम्राज्य मानो, हर दिशा थी मुँह छुपाये। कर पसारे भी न सूझे, कौन किसको पथ दिखाये।। छिप रहे तारे व्यथित उर, तिमिर घन आतंक से डर। कौमुदी अपनी समेटे, छिप गया निर्मल निशाकर " कभी रह-रह स्यार उल्लू के भयंकर शब्द होते। सुन सजग मानव भयातुर, विवश साहस धैर्य खोते ॥ कभी झींगुर झिल्लियों के, परुष स्वर देते सुनायी। साथ ही रीवें इन्हीं के, ध्वान्त को देते बधाई ।। निशिचरों का बोल-बाला, मनुज-कुल आँसू बहाता । स्वप्र के संसार में भी, तिमिर सागर में नहाता ॥ सिद्धि-दात्री! सिद्धि दो माँ ! मैं अकिञ्चन शरण आया। परम पावन चरण-रज दो, और अपनी मृदुल छाया" चाहता मति मन्द मैं- सामर्थ्य से भी अधिक पाना। ज्यों उडुप से मूढ़ चाहे, सिन्धु के उस पार जाना ॥ किन्तु मातः ! वर तुम्हारा, डूबते का हो सहारा। पार कर सकता सहज ही, सिन्धु तो क्या गगन सारा " ध...