सुभाष चन्द्रिका
द्वितीय सर्ग एक दिवस अध्ययन काल में, धधक उठी अन्तस की ज्वाला। जब अंग्रेजी प्राध्यापक ने, प्रस्तुत किया-वाक् विष प्याला ।। सुन अपशब्द विदेशी-मुख से, भारत माता के प्रति बोला। हिन्द केसरी मौन त्याग कर, उत्तेजित हो निज मुँह खोला ।। "रे निर्लज्ज ! जलाशय में रह, क्यों विद्रोह मगर से करता? भूल गया वे दिन जब आया, भीख मांगने पैरों पड़ता ।। "चुप नादान गुलाम देश के, बड़ी बात छोटे मुँह करते।। हो कर के भी दास मूर्ख तुम, क्यों उतनी शेखी बघारते ।। “यदि जाने अनजाने कुत्ते, घुस जाते है घर के भीतर। तो दुर-दुर कर हम निकालते, उनको बाहर पीट-पीट कर ।। चोरी कर सीना जोरी भी, रे ओटम! तू क्यों है करता। नाक रगड़ चिल्लू भर पानी- में पर-धन से जीवन भरता ।। समय-समय पर यदि हमको, आता नागों को दूध पिलाना। तो कुचाल अवलोक जानते, वदन कुचल परलोक पठाना ।। एक शब्द भी इसके आगे, यदि कोई भी अब जो निकला। जीभ खींच बाहर कर दूंगा, फल इसका मैं दूंगा दिखला ।। तुम्हें पता क्या नहीं? दास हो, क्या कर्तव्य दास का होता? धृष्ट गुलाम हाथ स्वामी के, हाथ स्व प्राणों से है धोता ।। ओटन साहब! क्षमा कीजिए, भूल हो गयी मुझसे भारी। मैने पह...