नाना पुराणनिगमागमादि का सार-संकलन है गोस्वामी तुलसीदास जी का ‘रामचरित्र मानस’।यह एक ऐसा ग्रंथ है, जिसमें विराट विश्व-जीवन अपनी सम्पूर्णता के साथ अनुभूति का विषय बनकर सहज समाहित है। इसकी सांस्कृतिक सम्पदा देश काल की सीमा से परे सार्वदेशिक और सार्वकालिक है। रसात्मक भाषा में व्यक्त किए गए इसके करणीय और वर्जनीय आचारपरक उपदेश किसी भी युग के मानव-समाज के जीवन और विकास के लिए अमृत के समान हैं।जीवन और जगत से सम्बन्धित कोई भी ऐसा क्षेत्र नहीं है, जिसे इसकी सांस्कृतिक प्रवाह-धारा ने मांज कर चमकाया न हो। इसकी संस्कृति में जीवित रहने का अभ्यास कर लेने वाला किसी भी युग का कोई भी मानव-समाज युग-युगान्त तक के लिए अमर हो सकता है।कहां जाता है कि-“ यन्न मानसे तन्नमानसे”। अर्थात जो तुलसी कृत रामचरितमानस में नहीं है, वह किसी के मानस में नहीं है। इस प्रकार रामचरितमानस की सांस्कृतिक सम्पदा विश्वमात्र के लिए कितनी उपयोगी है, इसकी परख करने के लिए सम्पूर्ण विषय वस्तु को निम्न अध्यायों में विभाजित करके अध्ययन-विश्लेषणीय बनाया गया है। 1- भूमिका 2- अध्याय : प्रथम रामकथा में तुलसी-मानस का स्थान। क- वैदिक साहि...
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