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अप्रैल 30, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

राम की शक्ति पूजा

यूपी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य महाप्राण निराला द्वारा रचित "रामकी शक्ति पूजा" रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमर रह गया राम-रावण का अपराजेय समर आज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर, शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर, प्रतिपल – परिवर्तित – व्यूह – भेद कौशल समूह राक्षस – विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध – कपि विषम हूह, विच्छुरित वह्नि – राजीवनयन – हतलक्ष्य – बाण, लोहितलोचन – रावण मदमोचन – महीयान, राघव-लाघव – रावण – वारण – गत – युग्म – प्रहर, उद्धत – लंकापति मर्दित – कपि – दल-बल – विस्तर, अनिमेष – राम-विश्वजिद्दिव्य – शर – भंग – भाव, विद्धांग-बद्ध – कोदण्ड – मुष्टि – खर – रुधिर – स्राव, रावण – प्रहार – दुर्वार – विकल वानर – दल – बल, मुर्छित – सुग्रीवांगद – भीषण – गवाक्ष – गय – नल, वारित – सौमित्र – भल्लपति – अगणित – मल्ल – रोध, गर्ज्जित – प्रलयाब्धि – क्षुब्ध हनुमत् – केवल प्रबोध, उद्गीरित – वह्नि – भीम – पर्वत – कपि चतुःप्रहर, जानकी – भीरू – उर – आशा भर – रावण सम्वर। लौटे युग – दल – राक्षस – पदतल पृथ्वी टलमल, बिंध महोल्लास से बार – बार आकाश विकल। वानर वाहिनी खिन्न, ल...

जयशंकर प्रसाद जी की महत्वपूर्ण पंक्तियां

यूपी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य जयशंकर प्रसाद जी की प्रसिद्ध पंक्तियां- 1. ’’तुम भूल गए पुरूषत्व मोह में, कुछ सत्ता है नारी की।’’ 2. ’औरों को हँसते देख मनु, हँसो और सुख पाओ। अपने सुख को विस्तृत कर लो, सबको सुखी बनाओ।’’ 3. ’’नील परिधान बीच सुकुमार, खुल रहा मृदुल अधखुला अंग। खिला हो ज्यों बिजली का फूल, मेघवन बीच गुलाबी रंग।।’’ 4. ’’बीती विभाबरी जाग री, अंबर पनघट में डुबो रही तारा घट उषा नगरी।।’’ 5. ’’बाँधा था विधु को किसने, इन काली जंजीरों से। मणिवाले फणियों का मुख, क्यों भरा हुआ है हीरो से।’’ 6. ’’जो घनीभूत पीङा थी मस्तक में, स्मृति सी छाई। दुर्दिन में आँसु बनकर, वह आज बरसने आई।। 7. ’’दोनों पथिक चले है कब से ऊँचे-ऊँचे, चढ़ते-बढ़ते’’ श्रद्धा आगे मनु पीछे थे, साहस उत्साह से बढ़ते-बढ़ते’’ 8. ’’हिमगिरी के उंतुग शिखर पर, बैठ शिला की शीतल छांह। एक पुरुष भीगे नयनों से, देख रहा था प्रलय प्रवाह।’’ 9. ’’ज्ञान दूर कुछ क्रिया भिन्न है, इच्छा क्यों हो पूरी मन की। एक दूसरे से न मिल सके, यह विडम्बना है जीवन की।।’’ 10. ’’उधर गजरती सिंधु लहरियाँ, कुटिल काल के जालों सी। चली आ रही फेन उगलती, फन फैलाए व्...

कामायनी महाकाव्य का परिचय

यूपी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य कामायनी महाकाव्य का परिचय कामायनी महाकाव्य का परिचय में बता दें कि इसको आधुनिक हिन्दी साहित्य का गौरवग्रन्थ माना गया है। यह रहस्यवाद का प्रथम महाकाव्य है। सृष्टि के रहस्य पर विवाद करने वाली दो मुख्य विचारधाराएँ हैं; एक भारतीय, दूसरी पाश्चात्य। पाश्चात्य विचार धारा जो डारविन के सिद्धान्त पर आधारित है। भारतीय विचार मनस्तत्व प्रधान है। प्रकाशन वर्ष – 1935 कुल सर्ग – 15 सर्ग का क्रम – चिंता आशा श्रद्धा काम वासना लज्जा कर्म ईर्ष्या इडा स्वप्न संघर्ष निर्वेद दर्शन रहस्य आनंद अंगीरस – शांत (निर्वेद) मुख्य पात्र – मनु, श्रद्धा, इडा कुमार मुख्य छंद – ताटक दर्शन – शैव प्रतीक – मनु – मन, श्रद्धा – हृदय, इडा – बुद्धि,कुमार – मानव सर्गों में विशेष छंद आल्हा छंद – चिंता सर्ग आशा सर्ग स्वप्न सर्ग निर्वेद सर्ग लावनी छंद – रहस्य सर्ग इडा सर्ग श्रद्धा सर्ग काम सर्ग लज्जा सर्ग रोला छंद – संघर्ष सर्ग सखी छंद – आनन्द सर्ग रूपमाला छंद – वासना सर्ग पुरस्कार – मंगलाप्रसाद पारितोषिक

'श्रद्धा' सर्ग काव्य खंड

   ' श्रद्धा ' सर्ग काव्य खंड  कौन तुम! संसृति-जलनिधि तीर  तरंगों से फेंकी मणि एक,  कर रहे निर्जन का चुपचाप  प्रभा की धारा से अभिषेक!  मधुर विश्रांत और एकांत—  जगत का सुलझा हुआ रहस्य,  एक करुणामय सुंदर मौन  और चंचल मन का आलस्य!”  सुना यह मनु ने मधु-गुंजार  मधुकरी का-सा जब सानंद,  किए मुख नीचा कमल समान  प्रथम कवि का ज्यों सुंदर छंद;  एक झिटका-सा लगा सहर्ष,  निरखने लगे लुटे-से, कौन—  गा रहा यह सुंदर संगीत?  कुतूहल रह न सका फिर मौन!  और देखा वह सुंदर दृश्य  नयन का इंद्रजाल अभिराम;  कुसुम-वैभव में लता समान  चंद्रिका से लिपटा घन श्याम।  हृदय की अनुकृति बाह्य उदार  एक लंबी काया, उन्मुक्त;  मधु पवन क्रीड़ित ज्यों शिशु साल  सुशोभित हो सौरभ संयुक्त।  मसृण गांधार देश के, नील  रोम वाले मेघों के चर्म,  ढँक रहे थे उसका वपु कांत  बन रहा था वह कोम वर्म।  नील परिधान बीच सुकुमार  खुल रहा मृदुल अधखुला अंग;  खिला हो ज्यों बिजली का फूल  मे...

"कामायनी" 'श्रद्धा' सर्ग की व्याख्या

श्रद्धा सर्ग की व्याख्या  एक दिन जब मनु विभिन्न विचारों में लीन थे तब अचानक उन्हें ऐसा जान पड़ा कि कोई उनसे यह कह रहा है—“जिस प्रकार समुद्र की लहरें समुद्र में भीषण उथल-पुथल मचाकर सतह से मणियों को निकालकर फेंक देती हैं उसी प्रकार इस संसार रूपी समुद्र की लहरों अर्थात् सांसारिक आघातों से ठुकराए हुए मणि के समान तुम कौन हो? साथ ही जिस प्रकार समुंदर तट पर पड़ी हुई वह मणि अपनी आभा से समीपवर्ती प्रदेश को पूर्णत: जगमगा देती है और उस शून्य स्थान में उसका प्रकाश फैल जाता है उसी प्रकार इस सागर के समीप चुपचाप बैठे, अपने अपूर्व व्यक्तित्व की आभा प्रकट करने वाले तुम कौन हो।” कवि का कहना है कि उस आगंतुक ने मनु से यह पूछा कि “तुम इस एकांत स्थान में क्यों बहुत थके हुए और आलस्य से भरे हुए बैठे हो तथा तुम्हारी शांतिपूर्ण मनोहर आकृति पर जो एक अपूर्व माधुर्य-सा दीख पड़ता हे उससे ऐसा प्रतीत होता है कि मानो तुमने इस जगत का रहस्य भली भाँति जान लिया है। साथ ही तुम्हारी मौनता न केवल तुम्हारे बाह्य सौंदर्य का बोध कराती है बल्कि उससे यह भी स्पष्ट हो जाता है तुम्हारा हृदय करुणाशील है, अर्थात् कोमल भावनाओं से ...