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दिसंबर 31, 2017 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कौंचवध (तृतीय सर्ग से आगे)क्रमशः

चतुर्थ सर्ग      रात बीतने वाली थी निशिचर घबराये। तारे थे भयभीत खोजते राह न पाये। बहता शीतल मंद सुगन्ध पवन सुखराई। कण-कण में उल्लास,चेतना नयी समाई॥१॥ तमचुर ने दी प्रात-सू...