भाग - छः आशा का फैल रहा है यह सूना नीला अंचल फिर स्वर्ण-सृष्टि-सी नाचे उसमें करुणा हो चंचल मधु संसृत्ति की पुलकावलि जागो, अपने यौवन में फिर से मरन्द हो कोमल कुसुमों के वन में। फिर विश्व माँगता होवे ले नभ की खाली प्याली तुमसे कुछ मधु की बूँदे लौटा लेने को लाली। फिर तम प्रकाश झगड़े में नवज्योति विजयिनि होती हँसता यह विश्व हमारा बरसाता मंजुल मोती। प्राची के अरुण मुकुर में सुन्दर प्रतिबिम्ब तुम्हारा उस अलस ऊषा में देखूँ अपनी आँखों का तारा। कुछ रेखाएँ हो ऐसी जिनमें आकृति हो उलझी तब एक झलक! वह कितनी मधुमय रचना हो सुलझी। जिसमें इतराई फिरती नारी निसर्ग सुन्दरता छलकी पड़ती हो जिसमें शिशु की उर्मिल निर्मलता आँखों का निधि वह मुख हो अवगुंठन नील गगन-सा यह शिथिल हृदय ही मेरा खुल जावे स्वयं मगन-सा। मेरी मानसपूजा का पावन प्रतीक अविचल हो झरता अनन्त यौवन मधु अम्लान स्वर्ण शतदल हो। कल्पना अखिल जीवन की किरनों से दृग तारा की अभिषेक करे प्रतिनिधि बन आलोकमयी धारा की। वेदना मधुर हो जावे मेरी निर्दय तन्मयता मिल जाये आज हृदय को पाऊँ मैं ...
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