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अप्रैल 2, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"आंसू" ,- जयशंकर प्रसाद

भाग - छः  आशा का फैल रहा है यह सूना नीला अंचल फिर स्वर्ण-सृष्टि-सी नाचे उसमें करुणा हो चंचल   मधु संसृत्ति की पुलकावलि जागो, अपने यौवन में फिर से मरन्द हो कोमल कुसुमों के वन में।   फिर विश्व माँगता होवे ले नभ की खाली प्याली तुमसे कुछ मधु की बूँदे लौटा लेने को लाली।   फिर तम प्रकाश झगड़े में नवज्योति विजयिनि होती हँसता यह विश्व हमारा बरसाता मंजुल मोती।   प्राची के अरुण मुकुर में सुन्दर प्रतिबिम्ब तुम्हारा उस अलस ऊषा में देखूँ अपनी आँखों का तारा।   कुछ रेखाएँ हो ऐसी जिनमें आकृति हो उलझी तब एक झलक! वह कितनी मधुमय रचना हो सुलझी।   जिसमें इतराई फिरती नारी निसर्ग सुन्दरता छलकी पड़ती हो जिसमें शिशु की उर्मिल निर्मलता   आँखों का निधि वह मुख हो अवगुंठन नील गगन-सा यह शिथिल हृदय ही मेरा खुल जावे स्वयं मगन-सा।   मेरी मानसपूजा का पावन प्रतीक अविचल हो झरता अनन्त यौवन मधु अम्लान स्वर्ण शतदल हो।   कल्पना अखिल जीवन की किरनों से दृग तारा की अभिषेक करे प्रतिनिधि बन आलोकमयी धारा की।   वेदना मधुर हो जावे मेरी निर्दय तन्मयता मिल जाये आज हृदय को पाऊँ मैं ...

"आंसू" -जयशंकर प्रसाद

              भाग - पांच सपनों की सोनजुही सब बिखरें, ये बनकर तारा सित सरसित से भर जावे वह स्वर्ग गंगा की धारा नीलिमा शयन पर बैठी अपने नभ के आँगन में विस्मृति की नील नलिन रस बरसो अपांग के घन से। चिर दग्ध दुखी यह वसुधा आलोक माँगती तब भी तम तुहिन बरस दो कन-कन यह पगली सोये अब भी। विस्मृति समाधि पर होगी वर्षा कल्याण जलद की सुख सोये थका हुआ-सा चिन्ता छुट जाय विपद की। चेतना लहर न उठेगी जीवन समुद्र थिर होगा सन्ध्या हो सर्ग प्रलय की विच्छेद मिलन फिर होगा। रजनी की रोई आँखें आलोक बिन्दु टपकाती तम की काली छलनाएँ उनको चुप-चुप पी जाती। सुख अपमानित करता-सा जब व्यंग हँसी हँसता है चुपके से तब मत रो तू यब कैसी परवशता है। अपने आँसू की अंजलि आँखो से भर क्यों पीता नक्षत्र पतन के क्षण में उज्जवल होकर है जीता। वह हँसी और यह आँसू घुलने दे-मिल जाने दे बरसात नई होने दे कलियों को खिल जाने दे। चुन-चुन ले रे कन-कन से जगती की सजग व्यथाएँ रह जायेंगी कहने को जन-रंजन-करी कथाएँ। जब नील दिशा अंचल में हिमकर थक सो जाते हैं अस्ताचल की घाटी में दिनकर भी खो जाते हैं। नक्षत्र डूब ज...

"आंसू" जयशंकर प्रसाद

आंसू जयशंकर प्रसाद         भाग - चार  यह पारावार तरल हो फेनिल हो गरल उगलता मथ डाला किस तृष्णा से तल में बड़वानल जलता।   निश्वास मलय में मिलकर छाया पथ छू आयेगा अन्तिम किरणें बिखराकर हिमकर भी छिप जायेगा।   चमकूँगा धूल कणों में सौरभ हो उड़ जाऊँगा पाऊँगा कहीं तुम्हें तो ग्रहपथ मे टकराऊँगा।   इस यान्त्रिक जीवन में क्या ऐसी थी कोई क्षमता जगती थी ज्योति भरी-सी। तेरी सजीवता ममता।   हैं चन्द्र हृदय में बैठा उस शीतल किरण सहारे सौन्दर्य सुधा बलिहारी चुगता चकोर अंगारे।   बलने का सम्बल लेकर दीपक पतंग से मिलता जलने की दीन दशा में वह फूल सदृश हो खिलता!   इस गगन यूथिका वन में तारे जूही से खिलते सित शतदल से शशि तुम क्यों उनमे जाकर हो मिलते?   मत कहो कि यही सफलता कलियों के लघु जीवन की मकरंद भरी खिल जायें तोड़ी जाये बेमन की।   यदि दो घड़ियों का जीवन कोमल वृन्तों में बीते कुछ हानि तुम्हारी है क्या चुपचाप चू पड़े जीते!   सब सुमन मनोरथ अंजलि बिखरा दी इन चरणों में कुचलो न कीट-सा, इनके कुछ हैं मकरन्द कणों में।   निर्मोह काल के काले- पट ...

"आंसू" जयशंकर प्रसाद

"आंसू"  जयशंकर प्रसाद           भाग -तीन हीरे-सा हृदय हमारा कुचला शिरीष कोमल ने हिमशीतल प्रणय अनल बन अब लगा विरह से जलने।   अलियों से आँख बचा कर जब कुंज संकुचित होते धुँधली संध्या प्रत्याशा हम एक-एक को रोते।   जल उठा स्नेह, दीपक-सा, नवनीत हृदय था मेरा अब शेष धूमरेखा से चित्रित कर रहा अँधेरा।   नीरव मुरली, कलरव चुप अलिकुल थे बन्द नलिन में कालिन्दी वही प्रणय की इस तममय हृदय पुलिन में।   कुसुमाकर रजनी के जो पिछले पहरों में खिलता उस मृदुल शिरीष सुमन-सा मैं प्रात धूल में मिलता।   व्याकुल उस मधु सौरभ से मलयानिल धीरे-धीरे निश्वास छोड़ जाता हैं अब विरह तरंगिनि तीरे।   चुम्बन अंकित प्राची का पीला कपोल दिखलाता मै कोरी आँख निरखता पथ, प्रात समय सो जाता।   श्यामल अंचल धरणी का भर मुक्ता आँसू कन से छूँछा बादल बन आया मैं प्रेम प्रभात गगन से।   विष प्याली जो पी ली थी वह मदिरा बनी नयन में सौन्दर्य पलक प्याले का अब प्रेम बना जीवन में।   कामना सिन्धु लहराता छवि पूरनिमा थी छाई रतनाकर बनी चमकती मेरे शशि की परछाई।   छायानट छव...

"आंसू " जयशंकर प्रसाद

"आंसू " जयशंकर प्रसाद              भाग - दो घन में सुंदर बिजली-सी बिजली में चपल चमक सी आँखो में काली पुतली पुतली में श्याम झलक सी प्रतिमा में सजीवता-सी बस गयी सुछवि आँखों में थी एक लकीर हृदय में जो अलग रही लाखों में।   माना कि रूप सीमा हैं सुन्दर! तव चिर यौवन में पर समा गये थे, मेरे मन के निस्सीम गगन में।   लावण्य शैल राई-सा जिस पर वारी बलिहारी उस कमनीयता कला की सुषमा थी प्यारी-प्यारी।   बाँधा था विधु को किसने इन काली जंजीरों से मणि वाले फणियों का मुख क्यों भरा हुआ हीरों से?   काली आँखों में कितनी यौवन के मद की लाली मानिक मदिरा से भर दी किसने नीलम की प्याली?   तिर रही अतृप्ति जलधि में नीलम की नाव निराली कालापानी वेला-सी हैं अंजन रेखा काली।   अंकित कर क्षितिज पटी को तूलिका बरौनी तेरी कितने घायल हृदयों की बन जाती चतुर चितेरी।   कोमल कपोल पाली में सीधी सादी स्मित रेखा जानेगा वही कुटिलता जिसमें भौं में बल देखा।   विद्रुम सीपी सम्पुट में मोती के दाने कैसे हैं हंस न, शुक यह, फिर क्यों चुगने की मुद्रा ऐसे?   विकसित...