सरोज - स्मृति ऊनविंश पर जो प्रथम चरण तेरा वह जीवन-सिंधु-तरण तनय, ली कर दृक्-पात तरुण जनक से जन्म की विदा अरुण! गीते मेरी, तज रूप-नाम वर लिया अमर शाश्वत विराम पूरे कर शुचितर सपर्याय जीवन के अष्टादशाध्याय, चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरण कह—“पितः, पूर्ण आलोक वरण करती हूँ मैं, यह नहीं मरण, 'सरोज' का ज्योतिःशरण—तरण— अशब्द अधरों का, सुना, भाष, मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाश मैंने कुछ अहरह रह निर्भर ज्योतिस्तरणा के चरणों पर। जीवित-कविते, शत-शर-जर्जर छोड़कर पिता को पृथ्वी पर तू गई स्वर्ग, क्या यह विचार— “जब पिता करेंगे मार्ग पार यह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम, तारूँगी कर गह दुस्तर तम?” कहता तेरा प्रयाण सविनय,— कोई न अन्य था भावोदय। श्रावण-नभ का स्तब्धांधकार शुक्ला प्रथमा, कर गई पार! धन्ये, मैं पिता निरर्थक था, कुछ भी तेरे हित न कर सका। जाना तो अर्थागमोपाय पर रहा सदा संकुचित-काय लखकर अनर्थ आर्थिक पथ पर हारता रहा मै...
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