सन् साठ के बाद भारतीय जनता में निराशा की भावना बढ़ने लगी थी । समाज एवं राजनीति में चारों और हाहाकार मचा हुआ था । आम आदमी गरीबी, महंगाई आदि अनेक कारणों से शोषण की चक्की में पिसा जा रहा था । जिसके कारण जनमानस विचलित हो गया था । राजनीति के मूल्य विघटन ने भाई-भतीजावाद एवं कुर्सीवाद को प्रोत्साहन दिया । देश एवं आम आदमी के प्रगति करने की जगह राजनेता, सत्ताधारी अपनी तिजोरियाँ भरने लगे। सन् १९४७ में स्वतंत्रता के समय भारत-पाक बटवारा, शरणार्थियों की समस्या, सन् १९६२ में चीन से युद्ध, १९६५ और १९७१ में पाकिस्तान से हुए युद्धों के कारण भारत की आर्थिक स्थिति और दयनीय बनती गई । इन तीनों युद्धों ने भारत को एक महत्त्वपूर्ण सबक सिखलाया और हमारी अनेक कमजोरियों हमें अवगत कराया । वही दूसरी ओर राजनीतिक भ्रष्टाचार, सामाजिक कुरीतियाँ, पाखण्ड अंधश्रद्धा, उँच-नीच आदि के कारण देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी । चुनाव जीतने के समस्त नारे कुर्सी हथियाने के बाद खोखले साबीत हुए । इन परिस्थितियों ने युवा पीढ़ी में कुंठा, निराशा, विद्रोह और आक्रोश को भर दिया । जिसके साक्षात्कार हमें साठोत्तरी काव्य में ह...
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