"आशा" - सर्ग काव्य खंड उषा सुनहले तीर बरसती, जय-लक्ष्मी-सी उदित हुई; उधर पराजित काल-रात्रि भी, जल में अंतर्निहित हुई। वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का, आज लगा हँसने फिर से; वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में, शरद विकास नए सिर से। नव कोमल आलोक बिखरता, हिम संसृति पर भर अनुराग; सित सरोज पर क्रीड़ा करता, जैसे मधुमय पिंग पराग। धीरे-धीरे हिम-आच्छादन, हटने लगा धरातल से; जगीं वनस्पतियाँ अलसाई, मुख धोती शीतल जल से। नेत्र निमीलन करती मानो, प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने; जलधि लहरियों की अँगड़ाई, बार-बार जाती सोने। सिंधु सेज पर धरा वधू अब, तनिक संकुचित बैठी-सी; प्रलय निशा की हलचल स्मृति में, मान किए-सी ऐंठी-सी। देखा मनु ने वह अति रंजित विजन विश्व का नव एकांत; जैसे कोलाहल सोया हो, हिम शीतल जड़ता-सा श्रांत। इंद्रनील मणि महा चषक था, सोम रहित उलटा लटका; आज पवन मृदु साँस ले रहा, जैसे बीत गया खटका। वह विराट् था हेम घोलता,...
साहित्य प्रेमियों, साहित्य के साधक और साहित्य का अध्ययन करने वाले सभी बंधुओं को यह ब्लॉग समर्पित है।🙏🙏