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अप्रैल 23, 2023 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

"कामायनी"- 'आशा'- सर्ग काव्य खंड

"आशा" - सर्ग काव्य खंड  उषा सुनहले तीर बरसती,  जय-लक्ष्मी-सी उदित हुई;  उधर पराजित काल-रात्रि भी,  जल में अंतर्निहित हुई।  वह विवर्ण मुख त्रस्त प्रकृति का,  आज लगा हँसने फिर से;  वर्षा बीती, हुआ सृष्टि में,  शरद विकास नए सिर से।  नव कोमल आलोक बिखरता,  हिम संसृति पर भर अनुराग;  सित सरोज पर क्रीड़ा करता,  जैसे मधुमय पिंग पराग।  धीरे-धीरे हिम-आच्छादन,  हटने लगा धरातल से;  जगीं वनस्पतियाँ अलसाई,  मुख धोती शीतल जल से।  नेत्र निमीलन करती मानो,  प्रकृति प्रबुद्ध लगी होने;  जलधि लहरियों की अँगड़ाई,  बार-बार जाती सोने।  सिंधु सेज पर धरा वधू अब,  तनिक संकुचित बैठी-सी;  प्रलय निशा की हलचल स्मृति में,  मान किए-सी ऐंठी-सी।  देखा मनु ने वह अति रंजित  विजन विश्व का नव एकांत;  जैसे कोलाहल सोया हो,  हिम शीतल जड़ता-सा श्रांत।  इंद्रनील मणि महा चषक था,  सोम रहित उलटा लटका;  आज पवन मृदु साँस ले रहा,  जैसे बीत गया खटका।  वह विराट् था हेम घोलता,...

कामायनी (आशा सर्ग की व्याख्या )

आशा सर्ग की व्याख्या उषा ने स्वर्णिम किरणों रूपी तीरों को बरसाकर प्रलय रात्रि को इतना अधिक विचलित कर दिया कि अंत में उसे पराजय ही स्वीकार करनी पड़ी और वह जल में ही समा गई तथा उषा साक्षात् लक्ष्मी ही जान पड़ने लगी। प्रलय के कारण प्रकृति का जो मुखड़ा भयातुर और कांतिहीन जान पड़ता था, आज वह पुनः उसी प्रकार मुस्करा उठा जिस प्रकार वर्षा के समाप्त होने पर शरद ऋतु के आते ही संसार में चारों ओर आनंद छा जाता है। उषा का आगमन होने पर उस बर्फ़ीले प्रदेश पर सूर्य रश्मियों का नवीन प्रकाश प्रेमपूर्वक इस प्रकार फैलने लगा मानो कि सफ़ेद कमल पर मकरंदपूर्ण पीला पराग बिखर गया हो। पृथ्वी पर जो बर्फ़ की तहें जमी हुई थीं, वे भी अब धीरे-धीरे लुप्त होने लगी और उनके नीचे दबे हुए पेड़-पौधे पुनः स्पष्ट होने लगे तथा कुछ जल से भीगी हुई वनस्पतियों को देखकर यही प्रतीत होता था मानो वे जागने पर अब शीतल जल से अपना मुख धोकर आलस्य दूर कर रही हों। जिस प्रकार पूर्ण रूप से जागने से पहले कामिनी अपनी सुकुमार पलकें खोलती और बंद करती है, उसी प्रकार प्राकृतिक वस्तुएँ पहले तो धीरे-धीरे उत्पन्न हुई और तत्पश्चात् पूर्णतः विकसित होने लगी।...

कामायनी (जयशंकर प्रसाद)

                  चिंता सर्ग की व्याख्या  हिमालय पर्वत की ऊँची चोटी पर एक शिला की शीतल छाया में बैठा हुआ एक पुरुष अश्रु पूर्ण नेत्रों से जल प्रलय के फलस्वरूप उत्पन्न हुई अपार जलराशि को देख रहा था। वह पुरुष अपने चारों ओर जल तत्व की ही प्रधानता देखता था। शिला-खंड के पास से प्रवाहित होने वाला जल द्रव रूप में था, और बर्फ़ के रूप में ठोस था लेकिन जल या बर्फ़ वास्तव जल तत्व के ही दो रूप हैं। कवि का अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार जल तत्व एक होते हुए भी तरल और सघन रूपों में विद्यमान है, उसी प्रकार ईश्वर की सत्ता एक होने पर भी सृष्टि में विविध रूपों में प्रतिभासित होती है। जिस प्रकार दूर-दूर तक फैली हुई बर्फ़ बिल्कुल जड़ जान पड़ती थी, उसी प्रकार उस व्यक्ति का हृदय भी स्पंदनहीन जान पड़ता था। जैसे पवन की नीरव चोटों से शिला की स्थिरता नहीं टूटती, वैसे ही मनु का हृदय चट्टान के ही सदृश्य था और उनकी शांति किसी भी प्रकार भंग नहीं हो रही थी। वह तरुण पुरुष तपस्वी की भांति दैवीय शक्ति की साधना में लीन जान पड़ता था। इस प्रलय कालीन सागर की लहरें रह-रह शिलाखंड से आ...

कामायनी (जयशंकर प्रसाद)

चिंता सर्ग हिम गिरि के उत्तुंग शिखर पर,  बैठ शिला की शीतल छाँह।  एक पुरुष, भीगे नयनों से,  देख रहा था प्रलय प्रवाह।  नीचे जल था, ऊपर हिम था,  एक तरल था, एक सघन।  एक तत्व की ही प्रधानता  कहो उसे जड़ या चेतन।  दूर-दूर तक विस्तृत था हिम,  स्तब्ध उसी के हृदय समान।  नीरवता-सी शिला-चरण से  टकराता फिरता पवमान।  तरुण तपस्वी-सा वह बैठा,  साधन करता सुर-श्मशान।  नीचे प्रलय सिंधु लहरों का  होता था सकरुण अवसान।  उसी तपस्वी-से लंबे, थे  देवदारु दो चार खड़े।  हुए हिम-धवल, जैसे पत्थर  बनकर ठिठुरे रहे अड़े।  अवयव की दृढ़ मांस-पेशियाँ,  ऊर्जस्वित था वीर्य्य अपार।  स्फीत शिराएँ, स्वस्थ रक्त का,  होता था जिनमें संचार।  चिंता-कातर बदन हो रहा,  पौरुष जिसमें ओत-प्रोत।  उधर उपेक्षामय यौवन का  बहता भीतर मधुमय स्रोत।  बँधी महा-बट से नौका थी,  सूखे में अब पड़ी रही।  उतर चला था वह जल-प्लावन,  और निकलने लगी मही।  निकल रही थी मर्म वेदना,  करुणा विकल कहान...