षष्ट सर्ग बीती रजनी तमन्चुर बोले, स्वप्न लोक से लौटे लोग। हेम कलश ले उषा चल पड़ी, वितरित करने, शुभ-सुख भोग। सजी वाटिका रंग-विरंगी, अति कुल का करती आव्हान । मधु बरसातीः सुरभि लुटाती, करने हेतु जीव कल्याण ॥ खग- मृग जग कर विनती करते, हे परमेश्वर! जग के नाथ। मानव-कुल से रक्षा करिये, बढ़ा दया का अपना हाथ ॥ शीतल, मंद, सुगन्ध वायु बह, नव स्फूर्ति भरती अविरल । जगे चराचर निद्रा त्यागे, देख प्रकृति का रूप विमल ।। कर्म क्षेत्र में उतर पड़े अब, सब में बढ्ने का उत्साह । अपनी-अपनी राहों पर चल, वेग रहा ज्यों सरित-प्रवाह ॥ एक पुरुष ने चिन्तन रत रह, जाग बितायी सारी रात । ओर समझ कर बिस्तर छोड़ा, बीती रात हो गया प्रात ॥ बना योजना हर हिटलर से, मिलने की फिर से तत्काल । जिससे भाग हिन्द देश से, सारे श्वेत भूत बैताल ॥ मिले सुभाष चन्द्र हिटलर से, उसने ललक मिलाया हाथ। भूरि प्रशंसा कर के बोला, "हम हैं वीर तुम्हारे साथ ।। पर ही एक बात से चिंतित, जिससे हूँ अत्यधिक अधीर । वैरी के बन मित्र लड़ रहे, हमसे भ...