मंगलवार, 10 फ़रवरी 2026

जगद्गुरु रामभद्राचार्य के ‘अरूंधती’ महाकाव्य में स्त्री विमर्श

जगद्गुरु रामभद्राचार्य के  ‘अरूंधती’ महाकाव्य में स्त्री विमर्श
 
“ बंदउँ गुरु पद पदुम परागा।सुरुचि सुबास सरस अनुरागा।।
अमिय मूरिमय चूरन चारु। समन सकल भव रुज परिवारू।।"
जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी के चरण-कमलों की धूल की बंदना करता हूं।जो सुगंध स्वाद से भरपूर है, और जन्म - मृत्यु के सभी रोगों को नाश करने वाली संजीवनी बूटी के समान है। जगद्गुरु जी का 77 वें जन्मदिन  दिवस पर उनके श्री चरणों में कोटि-कोटि नमन।

प्रथम अध्याय -
प्रस्तावना 
क-  जगतगुरु रामभद्राचार्य आचार्य जी का 
साहित्यिक परिचय 
ख-  एक प्रज्ञाचक्षु रचनाकार के रूप में उनकी विलक्षणता 
ग-  महाकाव्य की परंपरा और अरुंधती संस्कृति और हिंदी महाकाव्य की 
      पृष्ठभूमि 
घ-   अरुंधती का स्थान
ङ-    शोध की प्रासंगिकता 
च-  आधुनिक युग में इस महाकाव्य के अध्ययन की आवश्यकता

द्वितीय अध्याय-
क-  अरुंधती का कथानक और पात्र परिकल्पना 
ख-कथानक के आधार पौराणिक संदर्भ और जगतगुरु द्वारा किया गया मौलिक नवाचार 
ग- पात्र  परिचय
अरुंधति और वशिष्ठ के चरित्र का मनोवैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक विश्लेषण 
घ- सहयोगी पात्र 
क-  समाज और ऋषि परंपरा के अन्य पात्र का महत्व

तृतीय अध्याय -
क-  जगतगुरु की दृष्टि में ना विमर्श अधिकार और मेधा
ख- अरुंधति के माध्यम से स्त्री की बौद्धिक स्वतंत्रता का चित्रण
ग-  पारिवारिक एवं सामाजिक भूमिका
घ-   एक पत्नी माता और आचार्य के रूप में अरुंधति का गौरव
च-  रूढ़ियों का खंडन स्त्री के प्रति संकीर्ण मान्यताओं पर गुरु जी का साहित्यिक प्रहार 

चतुर्थ अध्याय -
क-  दार्शनिक एवं आध्यात्मिक पक्ष
ख- दांपत्य योग गृहस्थ जीवन को तपोवन बनाना 
ग- प्रकृति एवं संस्कृत काव्य में वर्णित प्रकृति एवं उसका आध्यात्मिक अर्थ 
घ- भारतीय नारी को स्थापित करना 

पंचम अध्याय -
क-    भाषा शिल्प एवं रस योजना 
ख-  भाषा सौष्ठव- संस्कृतनिष्ठ  हिंदी और छंदों का प्रभावी प्रयोग 
ग-   रस - विवेचन शांत करूं और श्रृंगार का समावेश 
घ-   अलंकार विधान - काव्य सौंदर्य बढ़ाने वाले प्रमुख अलंकारों का प्रयोग 

षष्ठ अध्याय-

उपसंहार एवं निष्कर्ष –

शोध का निष्कर्ष
क-   महाकाव्य के माध्यम से प्राप्त होने वाला सार्वभौमिक संदेश 
ख-  आधुनिक समाज के लिए प्रासंगिकता 
ग-    नारी सशक्तिकरण के क्षेत्र में अरुंधती की भूमिका
संदर्भ सूची ग्रंथ
१- अरूंधती महाकाव्य- जगद्गुरु रामभद्राचार्य (तुलसी पीठ प्रकाशन चित्रकूट)
२- अष्टावक्र महाकाव्य – जगद्गुरु रामभद्राचार्य 
३-  राघवकृपाभाष्यम् – जगद्गुरु रामभद्राचार्य 
४- अहिल्योद्धार – जगद्गुरु रामभद्राचार्य 
५-  सीताराम विवाह दर्शन – जगद्गुरु रामभद्राचार्य 

संक्षिप्त जीवन परिचय

जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी संस्कृत, हिन्दी, अंग्रेजी, जैसे अनेकानेक भाषाओं के ज्ञाता, प्रख्यात साहित्यकार , व्याकरणाचार्य , प्राचीन एवं अर्वाचीन और करण संवत कथाकार, सनातन संस्कृति के प्रखर सूर्य, 58वें ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित(2023), पद्मविभूषण (2015) से विभूषित, (2005) में साहित्य 
अकादमी पुरस्कार से सम्मानित एवं महामहोपाध्याय के मानद उपाधि से गौरवान्वित जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी एक ऐसी विलक्षण विभूति है। जिनके लिए शब्द कम पड़ जाते हैं, उनकी विद्वता तपस्या और साहित्य साधना को शब्दों में व्यक्त करना हिमालय को दर्पण दिखाने जैसा है।
जन्म स्थान - ऐसे महाकवि का जन्म १४ जनवरी १९५० मकर संक्रांति के एकादशी के माध्य रात्रि को उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के सुजानगंज क्षेत्र के साड़ी खुर्द ( जो आज इनकी  मां शची देवी के नाम पर शचीपुरम् नाम से  जाना जाता है) में माता श्रीमती शची देवी  से हुआ था । इनके पिता श्री रामदेव मिश्र थे।  इनके बचपन का नाम गिरिधर मिश्रा था। ११नवम्बर १९८३ की कार्तिक पूर्णिमा के परम पावन दिवस पर श्री रामानंद सम्प्रदाय में विरक्त दीक्षा लेकर श्री रामभद्र दास नाम से समलंकृत हुए। 
बालक गिरिधर का जीवन सामान्य रूप से शुरू हुआ था, लेकिन महज दो महीने की आयु में एक त्रासदी घटित हुई। उनकी आँखों में 'रोहे' (Trachoma) नामक संक्रमण हो गया था। गाँव में उचित चिकित्सा सुविधा न होने के कारण, एक वृद्ध महिला ने उनकी आँखों में एक देशी दवा (जड़ी-बूटी का लेप) लगा दी, जिससे उनकी आँखों से रक्तस्राव शुरू हो गया और उन्होंने अपनी दोनों आँखों की रोशनी हमेशा के लिए खो दी।
इलाज के लिए उन्हें लखनऊ के किंग जॉर्ज अस्पताल ले जाया गया, लेकिन उनकी दृष्टि वापस नहीं आ सकी।
शिक्षा- प्रारम्भिक शिक्षा सर्वप्रथम पूज्य पितामह श्री सूर्यबली मिश्र के द्वारा गीता और मानस का आद्यन्त कंठस्थीकरण आठ वर्ष की अल्पायु में ही कराया गया था। तदुपरान्त स्थानीय आदर्श श्री गौरीशंकर संस्कृत विश्वविद्यालय पांच वर्ष पर्यन्त पाणिनीय व्याकरण की आरम्भिक शिक्षा सम्पन्न करके विशेष अध्ययन हेतु वाराणसी स्थित सम्पूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रवेश। परीक्षा के हर स्तर पर सर्वातिशायी अंकों की प्राप्ति तथा विभिन्न प्रकार की स्थानीय एवं राष्ट्रीय प्रतियोगिता में प्रथम स्थान अनेकानेक स्वर्ण पदकों से सम्मानित तथा आचार्योंपाधि प्राप्त्योपरान्त यू.जी.सी. के द्वारा "आध्यात्मरामायणे अपाणनीय प्रयोगाणाम विमर्श:" विषय पर १९८१ में शोध सम्पन्न कर विद्यावारिधि(Ph.D)की उपाधि प्राप्त किया।

साहित्य साधना - 
प्रकाशित कृतियों का विवरण -
१-मुकुन्द स्मरणम भाग १एवं २ २- भारत महिमा ३- मानस में तापस प्रसंग ४- परम बडभागी जटायू ५- काका विदुर(हिन्दी खंड काव्य) ६- मां सबरी (हिन्दी खंड काव्य) ७- जानकी कृपा कटाक्ष (संस्कृत स्त्रोत काव्य) ८- सुग्रीव की 
कुचाल एवं विभीषण की करतूत, ९- श्री गीता तात्पर्य (दर्शन ग्रंथ) १०- तुलसी साहित्य में कृष्ण कथा(समीक्षात्मक ग्रंथ), ११- सनातन धर्म की विग्रह स्वरूपा गौ माता, १२- मानस में सुमित्रा, १३- श्री रामानंद सिद्धांत चन्द्रिका( संस्कृत में दर्शन ग्रंथ हिन्दी अनुवाद सहित), १४- भक्ति गीत शुधा (गीत काव्य) १५- श्री नारद भक्ति सूत्रेषु राघव कृपा भाष्यम् ( हिन्दी अनुवाद सहित),
जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी एक अत्यंत विपुल रचनाकार हैं। उन्होंने संस्कृत, हिंदी, अवधी, मैथिली और अन्य कई भाषाओं में 100 से अधिक पुस्तकों की रचना की है। यहाँ उनकी कुछ  अन्य प्रमुख प्रकाशित रचनाओं की सूची प्रस्तुत है, जिन्हें विभिन्न श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
महाकाव्य
१- श्रीभार्गवराघवीयम् (संस्कृत): 2002 में 
प्रकाशित, इस महाकाव्य में 40 सर्ग हैं। इसके लिए उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला है।
२- अष्टावक्र (हिंदी): 2010 में प्रकाशित, यह महाकाव्य ऋषि अष्टावक्र के जीवन पर आधारित है।
३- अरुंधती (हिंदी): 1994 में प्रकाशित, यह ऋषि वशिष्ठ और उनकी पत्नी अरुंधती के जीवन पर आधारित है।
खंडकाव्य-
१- आजादचन्द्रशेखरचरितम् (संस्कृत): स्वतंत्रता सेनानी चंद्रशेखर आजाद पर आधारित।
२- सरयुलहरी (संस्कृत): सरयू नदी की स्तुति में शतक।
३- भृंगदूतम् (संस्कृत): कालिदास के मेघदूतम् की शैली में एक दूतकाव्य।
४- काकविडांबना (संस्कृत): कौवों के माध्यम से शोषक वर्ग पर व्यंग्य।
नाटक -
१- श्रीराघवाभ्युदयम् (संस्कृत): भगवान राम के अभ्युदय पर आधारित एक नाटक।
२- उत्साह (हिंदी): एक एकांकी नाटक संग्रह।
टीका और भाष्य (Commentaries)
उन्होंने 'प्रस्थानत्रयी' (ब्रह्मसूत्र, उपनिषद और भगवद गीता) पर विशिष्टाद्वैत वेदांत के अनुसार भाष्य लिखे हैं:
३- श्रीराघवकृपाभाष्यम्: ब्रह्मसूत्र, भगवद गीता और ईशावास्यादि ग्यारह उपनिषदों पर संस्कृत भाष्य।
४- श्रीरामचरितमानस: रामचरितमानस पर उनकी विस्तृत टीका काफी प्रसिद्ध है।
गीत और स्तोत्र५- राघवगीतगुंजन (हिंदी): गीतों का संग्रह।६- श्रीसीतारामसुप्रभातम (संस्कृत): भगवान राम और सीता की प्रातःकालीन स्तुति।
इनके अलावा, उन्होंने अष्टाध्यायी (पाणिनी 
व्याकरण) पर भी कार्य किया है और अनेक प्रवचन संग्रह भी प्रकाशित हैं।
अरूंधति महाकाव्य का संक्षिप्त परिचय -
प्रस्तुत "अरूंधती" महाकाव्य के प्रणेता वाचस्पति, शास्त्र मर्मज्ञ, आध्यात्म सिंधु, युगद्रष्टा,शब्द ऋषि, सारस्वत प्रतिभा सम्पन्न पौराणिक कथाओं के मर्मज्ञ वैदिक वाङ्मय के महाप्राज्ञा सर्वाम्नाय तुलसी पीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य जी महाराज है। संस्कृत भाषा निष्णात कवि पुंगव पूज्यपाद श्री आचार्य जी ने इस महाकाव्य की सर्जनात्मक परिधि में वेद सम्मत आस्तिक दर्शन के शास्वत सिद्धांत का अनुशीलन भारतीय सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में प्रतिबिम्बित करते हुए मानव जीवन की सम्पूर्ण कलावधि की विकासोन्मुख भावदशाओं का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विम्बनिरूपण- सृष्टि, प्रणय, प्रीति, परितोष, प्रतिक्षा, अनुनय, प्रतिशोध, क्षमा, शक्ति, उपराम, प्रबोध, भक्ति, उपलब्धि, 
उत्कंठा और प्रमोद सरिस पंचदश‌सर्गान्तर्गत शीर्षकों में एवं द्विदशशतसप्तनवति पदों में व्यक्त किया है। जो निम्नलिखित हैं -
अरुन्धती का जन्म और विवाह:
कथा का आरम्भ अरुन्धती के परिचय से होता है। वह ऋषि कर्दम और माता देवहूति की आठवीं पुत्री हैं। उनका विवाह ब्रह्मा के मानस पुत्र महर्षि वशिष्ठ के साथ होता है। यह जोड़ी वैदिक संस्कृति में आदर्श दांपत्य जीवन का प्रतीक मानी जाती है। विवाह के समय ब्रह्मा जी उन्हें आशीर्वाद देते हैं कि भविष्य में उन्हें भगवान राम के दर्शन प्राप्त होंगे।

​विश्वामित्र से संघर्ष और पुत्र वियोग:
कथा में एक प्रमुख मोड़ तब आता है जब राजा विश्वरथ (जो बाद में विश्वामित्र बने) वशिष्ठ की कामधेनु गाय को बलपूर्वक छीनने का प्रयास करते हैं। वशिष्ठ के ब्रह्मदंड के सामने विश्वरथ की शक्ति क्षीण हो जाती है। प्रतिशोध की ज्वाला में 
जलते हुए विश्वामित्र, वशिष्ठ और अरुन्धती के 100 पुत्रों को मृत्यु का श्राप दे देते हैं। यह अरुन्धती के लिए अत्यंत कष्टकारी समय होता है, फिर भी वह अपने धैर्य और तपोबल से विचलित नहीं होतीं।
​पुनर्निर्माण और शक्ति का जन्म:
इतने बड़े दु:ख के बाद भी अरुन्धती और वशिष्ठ क्षमाशीलता का परिचय देते हैं। कालान्तर में उन्हें 'शक्ति' और 'सुयज्ञ' नामक पुत्रों की प्राप्ति होती है। दुर्भाग्यवश, विश्वामित्र के उकसावे पर एक राक्षस द्वारा शक्ति का भी वध कर दिया जाता है। इसके बाद अरुन्धती अपने पौत्र (शक्ति के पुत्र) 'पराशर' का पालन-पोषण करती हैं और उसे शिक्षा देती हैं।
​राम की प्रतीक्षा और वनवास:
ब्रह्मा के वरदान के अनुसार, यह ऋषि दम्पति भगवान राम की प्रतीक्षा में अपना जीवन वानप्रस्थ आश्रम में व्यतीत करने लगते हैं। वे 
अयोध्या के पास एक आश्रम में रहने लगते हैं। जब राम का जन्म होता है, तो वशिष्ठ और अरुन्धती अत्यंत हर्षित होते हैं। राम और अरुन्धती के पुत्र सुयज्ञ, दोनों वशिष्ठ के आश्रम में एक साथ शिक्षा ग्रहण करते हैं।
​सीता से भेंट और राम वनवास:
मिथिला में राम-सीता विवाह के बाद, जब नवविवाहित जोड़ी अयोध्या आती है, तब अरुन्धती पहली बार सीता जी से मिलती हैं। अरुन्धती सीता को पुत्रीवत स्नेह देती हैं। इसके पश्चात राम को 14 वर्ष का वनवास होता है, जो अरुन्धती के लिए पुनः एक प्रतीक्षा का काल बन जाता है।
​3. महाकाव्य का समापन
​कथा का समापन राम के वनवास से लौटने के बाद होता है। 14 वर्षों के बाद जब राम और सीता अयोध्या लौटते हैं, तो वे अरुन्धती और 
वशिष्ठ के आश्रम में जाते हैं। यहाँ एक अत्यंत भावुक प्रसंग आता है जहाँ अरुन्धती स्वयं अपने हाथों से भोजन बनाकर राम और सीता को खिलाती हैं। इसी मिलन और भोजन के प्रसंग के साथ महाकाव्य का सुखद अंत होता है।
 
 
आपने अरूंधती के माध्यम से संसार को यह बोध कराया है कि भारतीय सांस्कृतिक में स्त्री केवल अनुगामिनी नहीं, अपितु ऋषियों की भी मार्गदर्शक एवं तपो भूमि है।इस महाकाव्य में नारी विमर्श का उदात्त रूप आपने प्रस्तुत किया है वह आधुनिक जगत के लिए अनुकरणीय है। 
प्रस्तुत महाकाव्य में करूण,वीर एवं शांत रस की त्रिवेणी प्रवाहित होती है आपकी लेखनी ने संस्कृत और शास्त्रीयता और हिंदी की तरलता को जिस प्रकार से एकाकर किया है, वह आपकी उभय भाषाचक्रवर्ती उपाधि को सार्थक 
करता है । अरुंधति महाकाव्य आध्यात्मिक तर्पण है,  जिसमें गृहस्थ जीवन पवित्रता और बैराग्य की पराकाष्ठा एक साथ दिखाई पड़ती है आपने वशिष्ठ और अरुंधती के संबंधों के माध्यम से दांपत्य जीवन की जो व्याख्या की है वह हिंदी साहित्य में अद्वितीय है।
आपकी भाषा कालिदास के लालित्यपूर्ण शैली और तुलसीदास की भक्ति प्रवणता का अनूठा संगम है। अलंकारों का सहज प्रयोग और छंदों की गतिशीलता पाठक को उस युग में ले जाती है, जहां ऋषि और देव संवाद करते थे।
 'अरुंधति'  शब्द-  शब्द मंत्र की भांति पवित्र और प्रभावशाली है। जहां प्रज्ञा और करुणा का मिलन होता है वही अरुंधती जैसा चरित्र जन्म लेता है।
अरुंधति महाकाव्य आधुनिक काल  में आर्ष काव्य परंपरा का पुनरूद्धार है, इसमें केवल शब्दों का चमत्कार नहीं अपितु  अनुभूतियों का 
साक्षात्कार है। इस महाकाव्य में आपने यह सिद्ध किया है कि ज्ञान एवं भक्ति परस्पर विरोधी नहीं है, बल्कि एक दूसरे के पूरक हैं।

महाकाव्य पर शोध की आवश्यकता
इस महाकाव्य पर शोध की आवश्यकता के प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
१.   नारी गरिमा और सशक्तिकरण का पुनरुद्धार
प्राचीन भारतीय साहित्य में ऋषियों की चर्चा अधिक होती है, जबकि ऋषिकाओं (विदुषी महिलाओं) का जीवन अक्सर पृष्ठभूमि में रह जाता है।
नायिका-प्रधान महाकाव्य: यह महाकाव्य वशिष्ठ 
की पत्नी अरुंधती को केंद्र में रखकर लिखा गया है। शोध के माध्यम से यह सामने लाया जा सकता है कि कैसे कवि ने एक पौराणिक नारी पात्र को आधुनिक संदर्भ में ‘सशक्त नारी’ के रूप में प्रस्तुत किया है।
शिक्षा और अधिकार: इसमें नारी शिक्षा और समाज में उनके समान अधिकारों की वकालत की गई है, जो वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक है।
२.   भारतीय संस्कृति और जीवन मूल्यों की स्थापना
वर्तमान दौर में जब सांस्कृतिक मूल्यों का क्षरण हो रहा है, ‘अरुंधती’ महाकाव्य भारतीय गृहस्थ जीवन के आदर्शों को प्रस्तुत करता है।
दांपत्य जीवन का आदर्श: वशिष्ठ और अरुंधती का जीवन दांपत्य प्रेम, त्याग और सहधर्मचारिणी के रूप में आदर्श प्रस्तुत करता है। शोध द्वारा यह स्थापित किया जा सकता है 
कि सफल गृहस्थ जीवन के लिए आपसी सामंजस्य कितना आवश्यक है।
समन्वयवादी दृष्टिकोण: ग्रंथ में विभिन्न दार्शनिक मतों और सामाजिक वर्गों के बीच समन्वय का प्रयास है, जिसे शोध द्वारा और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।
३.   साहित्यिक और भाषाई महत्व
हिंदी साहित्य में महाकाव्य परंपरा क्षीण होती जा रही थी, जिसे इस ग्रंथ ने पुनर्जीवित किया है।
रस और अलंकार योजना: इस महाकाव्य में ‘करुण’ और ‘शृंगार’ रस का अद्भुत परिपाक है। शोधकर्ता इसके छंद, बिम्ब और अलंकारों के प्रयोग का विश्लेषण कर हिंदी साहित्य की समृद्धि को उजागर कर सकते हैं।
संस्कृतनिष्ठ हिंदी: इसकी भाषा शैली पर शोध करने से यह समझा जा सकता है कि कैसे तत्सम शब्दावली का प्रयोग करते हुए भी भावों को सहजता से व्यक्त किया जा सकता है।
४.   उपेक्षित पात्रों को न्याय
रामायण और अन्य पौराणिक कथाओं में अरुंधती का उल्लेख मिलता है, लेकिन उनका विस्तृत जीवन परिचय दुर्लभ है। इस महाकाव्य पर शोध करने से एक उपेक्षित पौराणिक चरित्र के व्यक्तित्व के विभिन्न आयाम (जैसे उनकी तपस्या, विद्वता और मातृत्व) समाज के सामने आ सकेंगे।
५.   आधुनिक समस्याओं का समाधानकवि ने पौराणिक कथा के माध्यम से आज की समस्याओं (जैसे जातिवाद, नारी शोषण, शिक्षा का अभाव) पर भी प्रकाश ला है। शोध का एक उद्देश्य यह खोजना हो सकता है कि यह महाकाव्य आधुनिक सामाजिक चुनौतियों के क्या समाधान प्रस्तुत करता है।
अन्त में महाकवि के लिए दो शब्द-
नयनों न अस्ति मस्त ज्ञानचक्षु विराजते,
साहित्य सिंधु हंसाय,रामभद्राय ते नमः।।
 अर्थात जिनके भौतिक नेत्र नहीं है, पर ज्ञान के चक्षु विराजमान है, साहित्य रूपी सागर के उस राजहंस जगतगुरु रामभद्राचार्य को कोटि-कोटि नमन।