प्रेम सरोवर', 'प्रेम माधुरी' तथा 'प्रेम फुलवारी' किस कवि की कृतियां हैं? – भारतेंदु हरिश्चंद्र
• प्रेमचंद का कौन सा उपन्यास अपूर्ण है? – मंगलसूत्र
• प्रेमचंद का जन्म कहां हुआ था? – लमही
• प्रेमचंद का प्रथम उपन्यास कौन सा है? – प्रेमा
• प्रेमचंद का वास्तविक नाम क्या था? – धनपत राय
• प्रेमचंद की कहानियों का संग्रह 'मानसरोवर' कितने भागों में प्रकाशित है? – आठ
• प्रेमचंद के किस उपन्यास को ग्रामीण जीवन और कृषक संस्कृति का महाकाव्य कहा गया है? – गोदान
• प्रेमचंद के किस कहानी-संग्रह की प्रतियां अंग्रेजी सरकार द्वारा जब्त करके जला दी गई? – सोजे वतन
• प्रेमचंद द्वारा संपादित कौन सा पत्र प्रगतिशील लेखक संघ का मुख पत्र बना? – हंस
• प्रेमचंद ने लगभग कितनी कहानियाँ लिखीं? – 300 से अधिक
• प्रेमचंद पर लिखी शिवरानी देवी की कृति कौन सी है? – प्रेमचंद घर में
• 'प्रेमचंदजी के साथ दो दिन' रचना किसकी है? – बनारसीदास चतुर्वेदी
• 'प्लेग की चुडैल' कहानी किसकी है? – भगवान दीन
• 'प्लॉट का मोरचा' रिपोर्ताज किसने लिखा है? – शमशेर बहादुर सिंह
• फंतासी का प्रयोग किस कवि ने सबसे अधिक किया है? – मुक्तिबोध
• फणीश्वरनाथ 'रेणु' के 'मैला आंचल' की क्या विशेषता है? – ठेठ देशीयता
• 'फाइल और प्रोफाइल' पत्र-संग्रह का संपादन किसने किया है? – पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र'
• 'फूलो का कुरता' कहानी का लेखक कौन है? – यशपाल
• 'फेंस के इधर-उधर' कहानी-संग्रह किसका है? – ज्ञानरंजन
• 'बंग महिला' का वास्तविक नाम क्या था? – राजेंद्रबाला घोष
• बंगाल के अकाल पर किसने मार्मिक और सशक्त रिपोर्ताज लिखे? – रांगेय राघव
• बंगाल के अकाल पर लिखे रांगेय राघव के अधिकतर रिपोर्ताज किस पत्र में प्रकाशित हुए? – विशाल भारत
• 'बंद गली का आखिरी मकान' कहानी किसकी है? – धर्मवीर भारती
• 'बकरी' नाटक किसके द्वारा लिखित है? – सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
• 'बड़ों के प्रेरणादायक कुछ पत्र' शीर्षक से पत्रों का संपादन किसने किया? – वियोगी हरि
• बदरीनारायण चौधरी 'प्रेमघन' ने किस पुस्तक के अनुवाद की आलोचना की है? – संयोगिता स्वयंवर
• 'बनारस अखबार' के संपादक कौन थे? – राजा शिवप्रसाद 'सितारेहिंद'
• 'बरवै रामायण' किसकी रचना है? – तुलसीदास
• 'बरवै रामायण' में कितने कांड हैं? – सात
• 'बलचनमा' उपन्यास में किस क्षेत्र का चित्रण है? – मिथिला
• 'बांधो न नाव इस ठांव' उपन्यास का लेखक कौन है? – उपेंद्रनाथ 'अश्क'
• 'बाणभट्ट की आत्मकथा' उपन्यास का लेखक कौन है? – हजारी प्रसाद द्विवेदी
• बाबूराव विष्णु पराड़कर ने किस पत्र के माध्यम से पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश किया? – हिंदी बंगवासी
• बालकृष्ण भट्ट का निबंध संग्रह कौन सा है? – साहित्य सरोज
• बालकृष्ण भट्ट की रचना 'वेणुसंहार' किस विधा में है? – नाटक
• 'बालबोधिनी' कैसी पत्रिका थी? – महिला पत्रिका
• बालमुकुंद गुप्त किस युग के रचनाकार हैं? – द्विवेदी युग
• 'बाले तेरे बाल जाल में कैसे उलझा दूं लोचन, छोड़ अभी से इस जग को।' ये किसकी पंक्तियां हैं? – सुमित्रानंदन पंत
• 'बिखरे मोती' और 'उन्मादिनी' में किस कथा लेखिका की कहानियां संग्रहीत हैं? – सुभद्राकुमारी चौहान
• बिहारी के काव्य-सौंदर्य का सम्यक् विवेचन करनेवाली पहली आलोचनात्मक पुस्तक कौन सी है? – बिहारी की वाग्विभूति
• 'बिहारी सतसई' पर किस ग्रंथ का प्रभाव है? – गाथा सप्तशती
• 'बिहारी सतसई' में कितने दोहे हैं? – सात सौ तेरह
• 'बीच बहस में' तथा 'पोस्टकार्ड' कहानियों के लेखक कौन हैं? – निर्मल वर्मा
• 'बुंदेली' और 'कन्नौजी' बोली हिंदी के किस उपभाषा वर्ग की बोलियाँ हैं? – पश्चिमी हिंदी
• बुंदेली लोकशैली में गाई जानेवाले छंद में रची सुभद्राकुमारी चौहान की कौन सी कविता स्वाधीनता आंदोलन का नारा बनी? – झांसी की रानी
• 'बूंद और समुद्र' उपन्यास किसका है? – अमृतलाल नागर
• 'बेढब बनारसी' के नाम से विख्यात लेखक का वास्तविक नाम क्या है? – कृष्णदेव प्रसाद गौड़
• ब्रजभाषा और अवधी किस काल की काव्य भाषाएं थी? – मध्य काल
• ब्रजभाषा का विकास अपभ्रंश के किस रूप में हुआ? – शौरसेनी
• ब्रजभाषा, खड़ी बोली, हरियाणवी, बुंदेली और कन्नौजी बोलियां हिंदी की बोलियों के किस वर्ग की हैं? – पश्चिमी हिंदी
• 'भक्तन को कहा सीकरी सों काम' किस कवि की पंक्ति है? – कुंभनदास
• भक्ति का कौन सा रूप पहले दक्षिण के आलवार संतों की वाणी के माध्यम से प्रस्फुटित हुआ? – रामभक्ति
• भक्ति का प्रस्थान ग्रंथ कौन सा है? – भागवत
• भक्तिकाल के अंतर्गत किस काव्यधारा में विवाह पूर्व समाज-निरपेक्ष स्वच्छंद प्रेम का निरूपण किया गया है? – सूफी काव्य
• भक्तिकाल के अंतर्गत प्रेमपीर का प्रचारक कवि किसे माना गया? – जायसी
• भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास 'चित्रलेखा' की मूल कथा किस पर आधारित है? – पाप-पुण्य
• भगवतीचरण वर्मा के उपन्यास 'भूले-बिसरे चित्र' के संदर्भ में कहा जानेवाला कौन सा तथ्य ठीक है? – वर्तमान जीवन का चित्रकूट
• भगवतीचरण वर्मा के किस उपन्यास ने उन्हें हिंदी उपन्यास साहित्य में ऊंचा दरजा दिलाया? – चित्रलेखा
• भरतमुनि के अनुसार रसों की संख्या कितनी है? – आठ
• भरथरी, जलंध्रीपाव कवि किस साहित्य से संबद्ध हैं? – नाथ साहित्य
• भवानी प्रसाद मिश्र की पुस्तक 'कुछ नीति, कुछ राजनीति' में किस प्रकार की रचनाएं हैं? – भाषणों का संग्रह
• भवानी प्रसाद मिश्र की रचनाएं अज्ञेय द्वारा संपादित किस 'सप्तक' में संकलित हैं? – दूसरा सप्तक
• 'भाग्यवती' उपन्यास किसकी कृति है? – श्रद्धाराम फिल्लौरी
• भारत के विभाजन की त्रासदी का वर्णन करनेवाला उपन्यास कौन सा है? – तमस
• भारतीय आर्य भाषा परिवार की भाषाओं का मूल स्रोत कौन सी भाषा है? – वैदिक संस्कृत
• भारतीय काव्यशास्त्र के अंतर्गत कितने प्रकार के काव्य-हेतु की चर्चा की गई है? – तीन
• भारतीय काव्यशास्त्र में ध्वनि सिद्धांत के अंतर्गत 'ध्वनि' शब्द का प्रयोग किस अर्थ में हुआ है? – व्यंग्य
• भारतीय काव्यशास्त्र में प्रतिभा के कितने भेद माने गए हैं? – दो
• भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपरा का सूत्रपात ईसा पूर्व द्वितीय शताब्दी में किस ग्रंथ से हुआ? – नाट्यशास्त्र
• भारतेंदु का कौन सा नाटक शेक्सपियर के 'मर्चेट ऑफ वेनिस' का अनुवाद है? – दुर्लभ बंधु
• हिंदी का प्रथम राष्ट्रवादी कवि कौन है? – श्रीधर पाठक
• भारतेंदु युग को पुनर्जागरणकाल की संज्ञा किसने दी? – डॉ. नगेंद्र
• भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म कब हुआ था? – 1850 ई.
• भारतेंदु हरिश्चंद्र की जीवनी-साहित्य से संबंधित पुस्तक कौन सी है? – बूंदी का राजवंश
• भारतेंदु हरिश्चंद्र की यात्रावृत्त विषयक रचनाएं किस पत्रिका में प्रकाशित हुईं? – कविवचनसुधा
• भारतेंदु हरिश्चंद्र के नाटकों की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता कौन सी है? – राष्ट्रीय-सांस्कृतिक जागरण
• भारतेंदुकृत सामयिक उपादानों पर आधारित नाटक कौन सा है? – भारत-दुर्दशा
• भाव-संधि, भाव-शबलता तथा भाव-शांति किस भाव की प्रमुख स्थितियां हैं? – संचारी भाव
• भाषा का मूल रूप कौन सा है? – मौखिक रूप
• भाषा के संदर्भ में महात्मा गांधी ने किसका समर्थन किया? – हिंदुस्तानी
• भाषा विज्ञान के किस खंड में 'पद' से वाक्य बनाने की प्रक्रिया का वर्णनात्मक, तुलनात्मक तथा ऐतिहासिक दृष्टि से अध्ययन होता है? – वाक्य विज्ञान
• भीष्म साहनी को उनकी किस कृति पर 'साहित्य अकादमी पुरस्कार' प्रदान किया गया? – तमस
• 'भूले-बिसरे चित्र' किस विधा की रचना है? – उपन्यास
• 'भोजपुरी' मूलतः किस प्रदेश की बोली है? – बिहार
• 'मंगला प्रसाद पारितोषिक' किस संस्था द्वारा प्रदान किया जाता रहा है? – हिंदी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग
• 'मंडियाली' का संबंध किससे है? – पहाड़ी
• मछुआरों के जीवन पर आधारित उपन्यास कौन सा है? – सागर, लहरें और मनुष्य
• मणि कौल की फिल्म 'सतह से उठता आदमी' किस कवि पर बनी थी? – मुक्तिबोध
• 'मतवाला' पत्र का प्रकाशन कहां से हुआ? – कलकत्ता
• मतिराम की प्रसिद्धि का आधार-स्तंभ कौन सा ग्रंथ है? – रसराज
• 'मधुकर' के 'रेखाचित्र विशेषांक' (1946) का संपादन किसने किया था? – बनारसीदास चतुर्वेदी
• 'मधुशाला' किस विधा की रचना है? – कविता
• मध्य काल में राजकाज की भाषा के रूप में किस भाषा को मान्यता मिली हुई थी? – फारसी
• 'मन की चंचलता' कहानी किस लेखक की है? – माधव प्रसाद मिश्र
• 'मनुष्यों की मुक्ति की तरह कविता की भी मुक्ति है।' यह कथन किसका है? – निराला
• मन्नू भंडारी की किस कहानी में नौकरी करती, परिवार के लिए मरती-खपती लड़की के टूट जाने का दर्द उकेरा गया है? – ए खाने आकाश नाई
• मन्मथनाथ गुप्त की संस्मरणात्मक कृति कौन सी है? – क्रांति युग के संस्मरण
• मराठी भाषा में वर्ष 1881 से प्रारंभ हुए 'केसरी' पत्र के संपादक कौन थे? – लोकमान्य तिलक
• मलिक मुहम्मद जायसी की रचना 'पद्मावत' किस भाषा में है? – अवधी
• महात्मा गांधी हिंदी साहित्य सम्मेलन के सभापति कब बने? – 1918 ई.
• महादेवी वर्मा का जन्म कहां हुआ था? – फर्रुखाबाद
• महादेवी वर्मा की 'यामा' में कितनी कृतियां सम्मिलित हैं? – चार
• महादेवी वर्मा को उनकी किस कृति पर 'भारतीय ज्ञानपीठ' पुरस्कार मिला? – यामा
• महादेवी वर्मा ने हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए किस संस्था की स्थापना प्रयाग में की? – साहित्यकार संसद्
• 'महाप्राण' की उपाधि किस कवि के नाम के साथ जोड़ी जाती है? – सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'
• महाभारत काल की पृष्ठभूमि पर वर्तमान युग के परिवेश को चित्रित करनेवाली कृति कौन सी है? – अंधायुग
• 'महाभोज' किसकी रचना है? – मन्नू भंडारी
• महावीर प्रसाद द्विवेदी के किस निबंध में व्यंग्य शैली प्रभावी है? – म्युनिसिपैलिटी के कारनामे
• महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा प्रयुक्त 'अनस्थिरता' तथा 'बेंकटेश्वर समाचार' के संपादक लज्जाराम मेहता द्वारा प्रयुक्त शब्द को लेकर किसने विवाद चलाया? – बालमुकुंद गुप्त
साहित्य प्रेमियों, साहित्य के साधक और साहित्य का अध्ययन करने वाले सभी बंधुओं को यह ब्लॉग समर्पित है।🙏🙏
यू पी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य -9
यूपी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य
1- सम्पूर्ण साहित्य को फैंटेसी का एक प्रकार कहा है ?
-- फ्रायड ने
2- कृति को फैंटेसी की पुत्री कहा है ?
-- मुक्तिबोध ने
3- फैंटेसी को अनुभव की कन्या कहा है ?
-- मुक्तिबोध ने
4- "फैंटेसी एक झीना पर्दा है जिसमें जीवन तथ्य झांक उठते है" कथन है?
-- मुक्तिबोध का
5- प्रसाद कृत कामायनी को विशाल फैंटेसी माना है ?
-- मुक्तिबोध ने
6- मुक्तिबोध की कौनसी रचना "एक विराट स्वप्न फैंटेसी" मानी जाती है ?
-- अंधेरे में
7- मुक्तिबोध का फैंटेसी लेखन का प्रयोजन है ?
-- दोषयुक्त मानव या संसार के प्रति नवीन दृष्टिकोण से विचार करना
8- "वह फैंटेसी ही क्या जिसमें ---------- न हो " मुक्तिबोध के इस कथन में रिक्त स्थान में आऐगा ?
-- असंगति
9- मुक्तिबोध ने अपनी किस कृति में फैंटेसी की विवेचना की है ?
-- "एक साहित्यिक की डायरी" में
10- "फैंटेसी में मन की निगूढ वृत्तियों का, अनुभूत जीवन समस्याओं का और इच्छित जीवन स्थितियों का प्रक्षेप होता है। --------" कथन है ?
-- मुक्तिबोध का
11- "फैंटेसी मनोविज्ञान का शब्द है,"
-- डा बच्चन सिंह
12- फैंटेसी का संबंध स्वप्न और अचेतन मन में घटित होने वाली घटनाओं की विघटित और बेतरतीब बिम्बावलियों से किसने माना है ?
-- डा बच्चन सिंह ने
13- देवकीनंदन खत्री के फैंटेसी लेखन का उद्देश्य है ?
-- 1- मनोरंजन 2- यथार्थ जीवन से पलायन
14- फैंटेसी है ?
-- स्वप्नचित्रमूलक साहित्य
15- फैंटेसी का मुख्य आधार है ?
-- कल्पना
16- दिवास्वप्नात्मक अथवा दुःस्वप्नात्मक मानसिक बिम्ब कहा जाता है ?
-- फैंटेसी को
17- कालरिज ने कल्पना के कितने भेद माने है ?
-- 2 ( प्राथमिक कल्पना और विशिष्ट कल्पना )
18- फैंटेसी का सम्बन्ध होता है ?
-- अचेतन मन से
19- किसकी कृतियों में फैंटेसी, लयात्मकता एवं जीवंतता का अद्भूत संगम दिखता है ?
-- रवीन्द्रनाथ ठाकुर की
20- फैंटेसी कभी रूढ नहीं होती है। यह कथन है ?
-- सत्य
'अन्तरात्मा की पुकार' एक विवेचन
'अन्तरात्मा की पुकार' एक विवेचन
आलोक मणि त्रिपाठी
प्रवक्ता हिन्दी
कवि और उसके काव्य का विवेचन और मूल्यांकन कई स्तरो पर किया जा सकता है और यह भी सच है कि विभिन्न समयों और युग-प्रवृत्तियो के प्रभाव से उक्त विवेचन और मूल्यांकन परिर्वतन भी होते रहते हैं। परन्तु इन अनिवार्य परिवर्तनों के रहते हुए भी कवि की मूल वस्तु के स्वरूप और उसके स्वरूप और उसके काव्योत्कर्ष के सम्बन्ध में कुछ स्थाई और अपरिवर्तनीय धारणाएं भी रहा करती है। इन धारणाओं की पुष्टि करना आवश्यक होता है अन्यथा किसी भी कवि के सम्बन्ध में राष्ट्रीय प्रतिक्रियाओं का स्थिरीकरण नहीं हो पाता है।
पंडित श्री राम बरन त्रिपाठी का जन्म 7-जुलाई-1938 में उत्तर प्रदेश के जौनपुर जिले के सुजानगंज ब्लॉक में दहेव ग्राम में हुआ था। पं त्रिपाठी जी की माता का नाम स्वर्गीय श्री मती इसराजी देवी और पिता का नाम स्वर्गीय श्री लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी था। जब त्रिपाठी जी की आयु दस वर्ष थी तभी इनके पिता की मृत्यु हो गई। पंडित श्री लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी अपने पीछे दो पुत्रियां और एक पुत्र को छोड़ कर इस लोक से विदा हुए।
पं रामबरन त्रिपाठी की शिक्षा गांव के ही प्रथमिक विद्यालय से आरंभ हुई थी। उन्होंने तत्कालीन संस्कृत साहित्य और हिन्दी साहित्य का अध्ययन किया था। वे एक अच्छे चित्रकार और बांसुरी वादक भी भी थे । रामलीला , कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर इनकी बनाई हुई कलाकृतियां सब को अपनी ओर आकृष्ट किए बिना नहीं रहती थी। बालकाल से ही कविता करने लगे थे । इनकी कविताओं में कबीर , जयशंकर प्रसाद सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और अयोध्या सिंह उपाध्याय हरिऔध की सी मिठास देखने को मिलता है। वे आरम्भ से ही विद्रोही कवि के रूप में दिखाई पड़ते हैं। गतानुगतिकता के प्रति तीव्र विद्रोह उनकी कविताओं में आदि से अंत तक बना रहा है। व्यक्तित्व की जैसी निर्बाध अभिव्यक्ति उनकी रचनाओं में हुआ है वैसा आज के आधुनिक कवियों कम दिखाई देता है। त्रिपाठी जी ने भावनाओं को कोमलता प्रदान करने का प्रयत्न नहीं किया है फिर भी इनकी रचनाओं में भाव कोमलता सर्वत्र व्याप्त है।
सर्वत्र अभिव्यक्ति की अत्यंत निर्बाध रूप प्रदर्शित होता है। त्रिपाठी जी की प्रतिभा बहुमुखी है। उन्होंने कविताएं तो लिखी ही है, निबंध , आलोचना, उपन्यास , कहानी आदि भी लिखा है। व्यंग और कटाक्ष को वे नहीं भूलते लेकिन कथा काव्य के प्रति उनका झुकाव अधिक है। उनका महाकाव्य 'दिव्यालोक 'और 'क्रौंचवध ' कथानक उनके अंतरात्मा की उमड़ती हुई आवेगों को प्रदर्शित करती है। अनुभूति की तीव्रता के कारण उनके अंदर के आवेग बहुत वेगवान होकर प्रकट हुए हैं , कोमलकांत पदावली, छंदोबद्ध योजना,विशुद्ध गीतिकाव्यात्मकता और अलंकार योजना ने उनके काव्य को सहृदय विद्वानों के द्वारा सदैव ही सम्मान मिलता रहा है।
त्रिपाठी जी की कविताएं साधारण पाठकों को दुर्बोध मालूम नहीं होती है। इसका कारण यह है कि कवि अपने आवेगों को संयत रखकर लिखता है। कवि को एक बात कहते - कहते कभी - कभी दूसरी बात याद आ जाती है तब वहां कवि अपने आयोगों को अंकुश नहीं रख सका है। अंकुश वह रख सकता है जो भावो को सजाने का प्रयास करता है। कवि त्रिपाठी जी यह नहीं करते इसलिए उनके भावों की अविरल धारा में प्रायः सभी प्रसंग आ जाते हैं जो पाठक की दृष्टि में प्रासंगिक है। कवि की इसी प्रतिभा ने उसे अधिक लोकप्रिय बना दिया।
इस पुस्तक में कवि की पहली रचना -'वाणी वंदना' में मानवतावादी राष्ट्रप्रेम का भाव दिखाई देता है । कवि मां शारदे से आग्रह करता है -
कृषकों के कुदाल खुरपी पर
अम्ब!फेर अपने सशक्त कर
श्रमिक वर्ग में नवल तेज भर
****************
भारत के वीरों में जाकर ।
मां शस्त्रास्त्रों में प्रलयंकर
भर दे ओज अपूर्व प्रखरतर
जिससे कांपे अरि दल थर -थर।।
कवि का सम्पूर्ण जीवन ग्रामीण परिवेश में बीता है गांव के प्राकृतिक स्वरूप सहज सामान्य वातावरण ने कवि को अपने में डुबा लिया है। कोयल , पपीहा, मोर ,मैना, तोता पीपल ,बरगद,टेंसू के साथ - साथ उदित और अस्ताचल सूर्य का पूर्ण विम्ब ये सब मिलकर कवि को सौन्दर्य की नवीन अनुभूति तथा दीप्ति प्रदान करते हैं। कवि प्रकृति के समक्ष नतमस्तक होकर स्वयं को कृतार्थ अनुभव करता है। इसी यथार्थ बोध ने कवि में एक नवीन आस्था को जन्म दिया है इसी नवीन आस्था के वशीभूत होकर कवि उस थोपी हुई तथाकथित पर व्यंग करता है।
"बालारूण निरख-निरख कर , वह कल कपोल की लाली ।
अपमानित हो छिप जाता, खो अपनी छंटा निराली।।
टेसू -प्रसून खिल-खिलकर, लालिमा गर्व से ऐंठें।
अधरोष्ठ राग रंजित लख, लज्जित मुख नत से बैठा।।"
****। ******। *******
"कोकिल की सरस काली,
चातक का मधुर -मधुर स्वर।
मधुकर का मधुमय गुंजन,
न्योछावर तब वाणी पर।।"
प्रेम जीवन की उर्जा शक्ति का श्रोत है प्रेम ही जीवन में कुछ कर गुजरने की प्रेरणा देता है। प्रेम सम्पूर्ण सृष्टि का मूल रहस्य है। इसी के कारण सृष्टि की रचना हुई है। अन्तर्मन में प्रेम उत्पन्न होते ही सब कुछ रूपान्तरित हो जाता है। ऐसा प्रतीत होता है, मानो अंधकार को चीरता हुआ कोई प्रकाश किरण उदित हुई है। यही प्रेम निराशा और निष्क्रियता के अंधकार को समाप्त करके जीवन में नवीन प्रकाश धारण करता है।
"जीवन के प्रथम पहर में,
तुम अरूणोदय से आए ।
धीरे धीरे रग - रग में ,
आलोक मधुर बिखराए।।"
कवि का प्रारम्भिक जीवन कष्टों और संघर्षों में व्यतीत हुआ था। 'मेरा बचपन ' कविता के माध्यम से कवि समसामयिक परिवेश के प्रति ईमानदारी उनके आत्मपरिचय से आरंभ होता है, कवि त्रिपाठी जी अपने विषय में बिना कुछ छिपाए हुए कहते हैं -
"अनुबंधित था अंधियारों से बचपन मेरा।
एक किरण के लिए तरसता रहा सबेरा।।"
****। *****। ******
"जिधर देखता विपदाओं ने डाला डेरा ।"
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"जाऊं कहां और किस पथ से समझ न पाता।
किस करनी का दंड मिल रहा हाय विधाता।।"
भारत के समाज का वास्तविक चित्र गांवों में ही देखा जा सकता है आज भी गांवों में शोषण ,अशिक्षा , बेकारी , अंधविश्वास, भूखमरी विद्यमान है। कवि मूलतः गांव का निवासी है। प्रगतिशील और सर्वहारा का समर्थक होने के कारण गांवों की दशा का बहुत बारीकी से अवलोकन किया है ।
' निर्धन बाला ' कविता में कवि ने बाल मनोविज्ञान और ममतामयी मां के कोमल हृदय का जो चित्रण प्रस्तुत किया है , वह पाठक मन को करूणाकलित कर देता है। सहृदय पाठक ' निर्धन बाला ' कविता पढ़कर अश्रुविलगित हुए बिना नहीं रह पाता -
"किसी तरह पा सकी एक रोटी का टुकड़ा,
बड़े प्रेम से, जर्जर वसना, प्रसन्न वदना,
बैठी घर के द्वार।
और ज्यों ही चाहा खाना उसने।
झपट कहीं से श्वान ले गया।।"
******। ********
"गीली मिट्टी लाकर के , लगी बनाने मधुर रोटियां।
कहती जाती अन्य साथियों से ..........
अभी मिलेगी रोटी
किन्तु याद रखना मारूंगी
यदि कुक्कुर छीनेगा रोटी।"
*****************
"अपने हिस्से की रोटी को , दिया सुता को ।
खा ले इसको कहते ही नेत्रों से मोती,
अकिंचना के , टपक पड़े भू-तल पर बिखरे।।"
आज सम्पूर्ण भारत में पाश्चात महानगरीय सभ्यता का बोलबाला है। गांव कस्बें बन रहें हैं, कस्बें शहर बन रहें हैं । गांव से लेकर शहर तक का मानव दिखावे के अंधानुकरण में फंसाता जा रहा है, जिसके कारण वह बह बहुत परेशान और दुखी हैं। जिसके कारण चोरी डकैती लूट मार अपहरण बलात्कार जैसी घटनाओं से समाचार पत्र भरें पड़े हैं। समाज के इस अवनति का कारण कवि पाश्चात्य और महानगरीय सभ्यता को ही मानता है। जिसके कारण कवि को हर व्यक्ति में अब उसको रावण दिखाई देता है । राम की संख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है -
"जितने रावण आज धरा पर, उतने राम कहां से आए?
त्रेता में कुबेर लूटते थे,
आज लूट रही निर्धन टोली,
सीता आग मांगते हारी,
आज रूप की जलती होली।।"
कवि अत्यंत संवेदनशील प्राणी होता है। युगीन चेतना की जितनी गहरी और व्यापक अनुभूति उसे होती है शायद ही और किसी जीव में देखने को मिलें। उसका व्यक्तित्व जितना गरिमामय होंगा उसकी अनुभूति भी उतनी ही ज्यादा गौरवपूर्ण होगी। अनुभूतियों का मूल स्त्रोत यथार्थ में निहित है और किसी अन्य की अपेक्षा कवि यथार्थ के अधिक निकट सम्पर्क में रहता है। त्रिपाठी जी ने 'मुक्त छंद वाटिका' में समाज और संस्कृति का जो आइना चित्रण किया है, वह पूर्ण यथार्थ है । त्रिपाठी जी ने समाज को सिर्फ देखा ही नहीं है बल्कि क्रियात्मक रूप से अनुभव भी किया है। एक उदाहरण देखिए -
" भारत वासी कुछ अधर्म सापेक्ष हो गये,
बचे खुचे कुछ लोग , धर्म निरपेक्ष हो गये।
कौन निभाये धर्म-कर्म की रीति निराली,
जिसके कारण देश रहा ये गौरवशाली।।"
"वैज्ञानिक बना रहे हंस -हंस कर विष के वाण,
जिससे जा सकतें हैं भू के सारे जीवों के प्राण।।"
काव्य पाठक मर्म को छूता है, वह उसके आवेग को जगाता है, उसकी संवेदना को दर्द देता है और उसकी बुद्धि को झकझोरता है। बौद्धिकता नई कविता की देन है, किन्तु आवेग और संवेदना तो काव्य के सर्वकालिक गुण हैं। संवेदनशील कवि स्वयं उस पीड़ा का भोक्ता होता है, जिसका वह वर्णन करता है। ' अन्तरात्मा की पुकार ' में जो भी कविता और छंद है वह कवि का भोगा हुआ अतीत है, वर्तमान है और भविष्य भी है। अतीत का एक उदाहरण -
"तन पुलकित मन हर्षित था, सम्पर्क हुआ जब तेरा।
अब बीत रही क्या मुझ पर , यह हृदय जानता मेरा।।
ये विरह -व्यथा की बातें, छंदों में नहीं समातीं।
स्वच्छंद हुई सी आकर, नित अश्रुधार बरसातीं।।"
कवि के आशय की अभीसिप्त व्यंजना काव्य भाषा का प्रयोजन है आशय की अनुरूपता के साथ भाषा का स्वरूप-विधान कविता की भाषा -योजना का प्रमुख नियामक तत्व हैं। दूसरे शब्दों में भाव और भाषा का बहुत गहरा सम्बन्ध है। कालिदास ने 'वागर्थाविव सम्पृक्ति वागर्थ प्रतिपत्तये ' कहकर काव्य की भाषा और उसके आशय के सम्पृक्त होने का उल्लेख किया है। 'गिरा अरथ जल बीचि समय कहियत भिन्न न भिन्न ' के द्वारा तुलसीदास ने वाणी और अर्थ की अभिन्नता द्योतित की है। अर्थात काव्य -भाषा का आदर्श स्वरूप वहीं है जो कवि के वक्तव्य को उत्कृष्ट रूप में अभिव्यक्त कर सके। त्रिपाठी जी की भाषा में भाव , वाणी और वक्तव्य को सरल तरीके से प्रस्तुत किया गया है, सरल व्यवहारिक भाषा,व्यंग्यात्मकता, यथार्थ के कारण कविता की भाषा में तीखापन है, साथ ही आध्यात्मिक और विनयपरक कविताओं में भाषा का वही मधुर और प्रौढ़ रूप मिलता है। समष्टि रूप से यह कहा जा सकता है कि त्रिपाठी जी की भाषा में कोमलता और माधुर्य के साथ ओज का प्रान्त रहा है।
अन्त में यह कहना चाहता हूं कि त्रिपाठी जी की रचना 'अन्तरात्मा की पुकार ' अत्यंत सशक्त रूप में पाठकों को प्रभावित करती है। यही त्रिपाठी जी के काव्य की महानता है किन्तु इतने पर भी हमें यह ध्यान रखना होगा । किसी भी काव्य का अभिशंसात्मक मूल्यांकन नहीं किया जा सकता, क्योंकि काव्य सभी 'गरिमामावाची '
अयथार्थ तत्वों से परे है। हम कह सकते हैं कि -
अपारे काव्य संसारे कविरेव प्रजापतिः |
यथा वै रोचते विश्वं तत्थेदं परिवर्तते ||
'यह अपार काव्य संसार में कवि सृष्टा ब्रह्म के
समान आचरण करता है |'
यूपी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य
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सन् साठ के बाद भारतीय जनता में निराशा की भावना बढ़ने लगी थी । समाज एवं राजनीति में चारों और हाहाकार मचा हुआ था । आम आदमी गरीबी, महंगाई आदि ...
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Samas(Compound)(समास) समास(Compound) की परिभाषा- अनेक शब्दों को संक्षिप्त करके नए शब्द बनाने की प्रक्रिया समास कहलाती है। दूसरे अर्थ ...