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सुभाष चन्द्रिका

दशम सर्ग रजनी के अवशेष अंश में,  चन्द्र डूबने वाला था। राहु केतु मे घेर रखा था, पड़ा दुष्ट से पाला था। लक्ष्य प्राप्त कर मानो हिमकर,  था समाधि लेने वाला । प्राची दिशि में प्रातः का था,... दृश्य सुधर दिखने वाला ।। दुख-सुख का यह अद्भुत संगम,  जन-जन को उड़कहित कर  उठतीं कभी विषाम्त तरंगें,  उर उनके आंदोलित कर ।। और कभी हर्षातिरेक से, झूम रहे थे भारत जन ।  " चीर तिमिर को ज्यों अरुणेदय,  प्रभा विखेर रहा कण-कण ॥ पुनः दुख की भीषण ज्वाला,  खौला कर मानस का नीर।  नयन-मार्ग से बाहर करके,  कर देती भीं कुछ कम पीर ॥ लख अदृश्य के दृश्य द्विधामय,  विविध, प्रकृति के प्रांगण में।  कहीं निरसता, कही सरसता । रह-रह दिखती नाण-कण में । हिन्द केशरी ने उठ देखा,  नियति-परी का व्यापक रंग।  स्वयं खो गये अपने में वे,  हुआ मोह ज्यों जग से भंग ॥ विर्निमेष में रहे देखते, उस अदृश्य के अद्भुत रंग । कही बिरह की विषम वेदना, कही हर्ष से पुलकित अंग ॥ कहीं धरा पर गहवर छाया,  कहीं चमकती दाहक धूप । कहीं रंक की सूनी कुटिया, कही विभव से बोझिल भूप ।। व...

सुभाष चन्द्रिका

सप्तम सर्ग ग्रीष्म दुपहरी में नभ से था,  बरस रहा भीषण अंगार। जीव जन्तु सब खोज रहे थे,  शीतल छाया मंद बयार ।। जीभ निकाले श्वान हांफते,  दौड़ रहे थे वे बेहाल । ऊपर उदर किये बैठे थे,  भूखे प्यास विकन विडाल ।। कीट पतिंगे व्याकुल रहते,  खग कुल के होते आहार। बैठ किसी तरु की डाली पर,  समय बिताते खग लाचार ॥ ताप-तप जल से बाहर आ,  गेंडे खोज वृक्ष की छाँव। हाँफ हाँफ कर दिवस बिताते,  विहुल पाण ग्रीष्म के माह ॥ जल के लिए प्यास के मारे,  व्याकुल मृग दौडे चहुँ ओर। फिर निराश लौटते तुरंत ही, हारे थके लगा कर जोर ।। मृग मरीचिका की यह माया,  इसमें नहीं किसी का दोष । आग उगलते सूरज को क्या? होता है इससे संतोष ॥ इस शाखा से उस शाखा पर,  उछल-कूद कपि थे बेहाल । प्यास मृत्यु को लेकर आयी,  गला दबाये भीषण काल ॥ सरिताओं के हृदय क्षुब्ध थे  देख भानु का अत्याचार ।  शक्ति क्षीण थी विवश सोचती,  चलो करें हम मिल उपचार ॥ मानो भू की हरी शाटिका,  हुई भानु कर से जल क्षार)  जिससे चिंतित धरती रहती,  व्याकुल नत सिर हो लाचार ।। धीरे-धीरे भीष...