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सुभाष चन्द्रिका

दशम सर्ग



रजनी के अवशेष अंश में, 
चन्द्र डूबने वाला था।
राहु केतु मे घेर रखा था,
पड़ा दुष्ट से पाला था।

लक्ष्य प्राप्त कर मानो हिमकर, 
था समाधि लेने वाला ।
प्राची दिशि में प्रातः का था,...
दृश्य सुधर दिखने वाला ।।

दुख-सुख का यह अद्भुत संगम, 
जन-जन को उड़कहित कर 
उठतीं कभी विषाम्त तरंगें, 
उर उनके आंदोलित कर ।।

और कभी हर्षातिरेक से,
झूम रहे थे भारत जन । 
" चीर तिमिर को ज्यों अरुणेदय, 
प्रभा विखेर रहा कण-कण ॥

पुनः दुख की भीषण ज्वाला, 
खौला कर मानस का नीर। 
नयन-मार्ग से बाहर करके, 
कर देती भीं कुछ कम पीर ॥

लख अदृश्य के दृश्य द्विधामय, 
विविध, प्रकृति के प्रांगण में। 
कहीं निरसता, कही सरसता ।
रह-रह दिखती नाण-कण में ।

हिन्द केशरी ने उठ देखा, 
नियति-परी का व्यापक रंग। 
स्वयं खो गये अपने में वे, 
हुआ मोह ज्यों जग से भंग ॥

विर्निमेष में रहे देखते,
उस अदृश्य के अद्भुत रंग ।
कही बिरह की विषम वेदना,
कही हर्ष से पुलकित अंग ॥

कहीं धरा पर गहवर छाया, 
कहीं चमकती दाहक धूप ।
कहीं रंक की सूनी कुटिया,
कही विभव से बोझिल भूप ।।

विविध विचार उठ रहे थे यों,
नेता जी के भीतर अमज,
स्यात् लक्ष्य अब सिद्ध हो गया,
भारत माता के सिर ताज ॥

स्वजनों से मिल नेताजी अब, 
कर बैंकाक हेतु प्रस्थान ।
लगे बनाने वहाँ पहुँकर, 
आगे की योजना सुजान।।

इसी समय डाक्यबाबेल का, 
आया अनचाहा प्रस्ताव । 
जिसको सुनने या गुनने का, 
नेता जी का न था स्वभाव ।।

सद्यः मना किया सुभाष ने,
 नहीं मानना है प्रस्ताव । 
अटल रहे काँग्रेसी नेता, 
कहें, नहीं है इसकी चाव ।।

ये अंग्रेज विश्व-वेरी हैं,
 इन्हें चाहिए अपना अर्थ। 
भले फंसे हों अन्य पंक में,
 ये हों परेशान क्यों व्यर्थ ।।

नेता जी के शब्द-शब्द थे, 
वशीकरण मन-मोहक मंत्र ।
कहुआ सत्य बोलने में थे, 
बचपन से ही परम स्वतंत्र ॥

अतः सभी भारत के नेता, 
मान लिये इनके सुविचार ।
हुई विफल बाबेकी गोष्ठी, 
बैठ रहे सिर धुन लाचार ।।

जो शंकाएं थीं सुभाष को, 
उनसे मुक्त हुए संतुष्ट ।
किन्तु देश के द्रोही दुर्जन, 
इससे हुए बहुत ही रुष्ट ॥

बनी योजना नेता जी की, 
शीघ्र पहुंचने की जापान ।
पहुंच वहाँ मिल हिरे हितो, से, 
शुरू करेंगे फिर अभियान ।।

नेता जी के साथ चले थे, 
सद् सहचर हबीबु रहमान । 
ध्वनि कर उड़ा विमान गगन में, 
शीघ्र पहुंचने को जापान ।।

साथ-साथ चल यम दूतों ने, 
घर किया विमान गतिहीन 1 
इस प्रकार भारत माता के 
पुत्र हो गये संज्ञा-हीन ।।

किया गया सारी दुनियाँ में, 
हृदय-विदारक यही प्रचार। 
आग लगी विमान में सहसा 
जल कर हुआ निमिष में क्षार ।।

जिसने सुना जहाँ पर व्याकुल, 
मचा हिन्द में हाहाकार । 
रास्ता साफ हुआ बैरी का, 
उमड़ा उर में हर्ष अपार ॥

सजल नयन कुछ लोग कह रहे, 
भारत का फूटा सौभाग्य ।
नाव किनारे पहुँच डूबने-
वाली है, कैसा दुर्भाग्य ।।

जगह-जगह थे स्वजन चीखते, 
रहा असह्य दुःख का भार 
हाय! विद्याता ! क्यों कर डाला?
 ऐसा भीषण क्रूराचार ।।

हम असहाय कहाँ जाये अब, 
और गहें हा। किसकी छाँह।
नहीं सूझता पथ कोई भी, 
हमें दिखा कौन सुराह ।।

इतने बड़े हाथ किसके हैं?
जो अब गहे हमारी बाँह ।
और दिखाये हमको प्रभुवर, 
चलने योग्य अकंटक राह"

एक सहारा रहा हमारा, 
वह भी नहीं हमारे बीच ।
उजड़ गयी वाटिका हमारी,
जिसे सजाया निशिदिन सींन्च "

आ कर ढाढ़स कौन बंधाए?
नेता कौन सुभाष समान । 
बोझिल नैया कौन संभाले, 
दिखता कोई नही महान।।

झुलसा उपवन राम सजायें?
या कि शत्रुओं की दुर्नीति।
छिना सहारा जिसका सहसा, 
उसके लिए चतुर्दिक भीति ॥

अब कोई क्या कुछ कर सकता?
मानवता जब सिसक रही है।
दानवता दृढ़ जाल बिछा कर, 
सब के सम्मुख विहंस रही है ।।

हाय! हमारे नेता प्यारे, 
कहाँ गए तुम हमे छोड़ कर।
क्या अपराध हो गया हमसे, 
चले गये सम्बन्ध तोड़ कर ।।

भारत माँ के प्यारे नन्दन !
 एक बार फिर से आ जाओ।
अपनी दुखिया माता को फिर. 
आश्वासन दे धीर बंधाओं।।

देखोगे दुर्दशा देश की,
 तो निश्चित अश्रु बहाओगे । 
पूछो गे कारण क्या है? तो,
 उत्तर उचित नहीं पाओगे ॥

तब तो सिर घुन बैठ रहोगे,
 नहीं समझ में कुछ आयेगा। 
"चिन्तन-रत रह सोचोगे तो, 
भेद कदाचित. खुल पायेगा ।

सजल नयन तुम बार-बार फिर, 
मन में पश्चाताप कारोगे। 
स्वप्न अधूरा रहा हमारा, 
आहें बारम्बार भरोगे ।।

हाय! विधाता इसी लिए क्या?
प्राणो का भी मोह त्याग कर।
जन. परिजन तब से विरक्त में, 
दस्यु मंगाने में था तत्पर ॥

नहीं जानता था स्वतंत्र हो ।
भारत वासी कर मनमानी ।
किये कराये पर बच्चों सा, 
अनायास फेरेंगे पानी ॥

जननी मुझे कोसती होगी, 
क्यों कपि को भूषण पहनाया ।
देख रहे थे जयचन्दों को,
तदपि तुम्हारी समझ न आया ॥

विश्व विजयिनी महा शक्ति से, 
धनुष बाण तुमने धरवाया।
पर अपने घर थे मनुजों से, 
बेटे। तुमने पार न पाया।।

तुमने कभी न सोचा होगा। 
धोखा देंगे अपने ही जन । 
यह भी सोचा होगा निश्चित, 
भारत से भागेंगे दुर्जन ।।

जिस धरती पर जन्म लिये हैं, 
हा। कृतप्न वे भारत वासी।
 जिनसे पेषित हुए आज तक, 
पुनः चाहते हो वह दासी ॥

देव-पुरुष । तुम यह मत सोचो, 
यह मानव-मन का अपकर्ष 
आशीर्वाद भेजते रहना। 
भारत का हो अति उत्कर्ष ॥

मात्र तुम्हारी कृपा चाहिए
 और नहीं कोई उपहार।
बुद्धि किसी की नहीं भ्रष्ट हो, 
हो सब के ही उच्च विचार ॥

यह मत समझो सब कृतन हैं, 
सभी यहां जयचन्द व मान।
पर बहु संख्यक आज भी यहाँ,
मंगल लक्ष्मी देवि समान ।।

मस्तक ऊंचा हुआ हिन्द का, 
तेरे बलिदानों से, 
गूँज रही हैं सकल दिशाएँ 
तेरे जय गानो से ।।

देव! देख तेरी महिमा को, 
और देख तेरा सद कार्य।
देश द्रोहियों को न सुहाया, 
तेरा देख सुव्रत अनिवार्य

अतः सर्प बन आस्तीन के, 
करके स्नेह-सुधा रस पान 
गरल वमन भून मिटायी, 
दुष्टों ने भारत की शान ।।

आज देव ! है स्वर्ग सुसोभित 
तुझको पा कर हर्ष विभोर । 
और धरित्री नरक हो गयी।
छाया अंधकार घनघोर ॥

आपने घर में आग लगा कर, 
अट्टहास करते भरपूर । 
बीट-कीट से अति प्रसन्न सह, 
सौरभ से रह कोसों दूर ।।

अंग्रेजो से छिप कर आये, 
जग में तुम हे! पुरुष महान । 
जग से छिप कर कहाँ गये तुम, 
हम सब के नेता भगवान ॥

हम तुमको पा निर्भय होकर, 
समझ रहे थे परम स्वतंत्र ।
कौन बतायेगा अब हमको,
स्वतंत्रता का पावन मन्त्र //

जहाँ कहीं भी है नेता तू, 
" देव ! स्वर्ग तेरा अधिकार। 
तेरे पद चिह्नों पर चल कर, 
मनुज करे अपना उद्धार ॥

हे। देश भक्त !! हे चिर महान, 
हे! देव दूत करुणा निधान।
हे! दुष्ट विनाशक सत्य प्राण, 
हे ! वीर यशस्वी शक्तिमान ।।

सब कुछ दे कर हमें चल दिये, 
हे ! त्यागी वैरागी वीर। 
कौन मिलेगा इस धरती पर, 
तुम सा पा सुर मनुज शरीर ॥

भारत वर्ष स्वतंत्र हो गया, 
लक्ष्य तुम्हारा पूर्ण हुआ।
 गोरे भूत भगे भारत से, 
अहंकार सब चूर्ण हुआ ॥

किन्तु एक दुर्दात निशाचर,
 भ्रष्टाचार मचा उत्पात ।
जन-जन के शोषण में तत्पर, 
अवहास करता दिन रात ॥

देश भक्त हम सब के नेता, 
एक बार फिर ले अवतार ।
भारत-भू से शीघ्र ध्वस्त कर दें, 
अति भीषण भ्रष्टाचार ॥

विश्व शांति का अब भी देते-
रहना शुभ संदेश उदार ।
तुझे नहीं हम कुछ दे सकते,
श्रद्धा सुमन मात्र अधिकार ।

जहाँ कही भी देव पुरुष हो, 
शान्ति मिले तुमको भरपूर ।
किसी तरह हम भारत वासी, 
जी लेंगे रह तुमसे दूर ।।


इति 
दशम सर्ग।


इति 
सुभाष चन्द्रिका।।

सुभाष चन्द्रिका

सप्तम सर्ग


ग्रीष्म दुपहरी में नभ से था, 
बरस रहा भीषण अंगार।
जीव जन्तु सब खोज रहे थे, 
शीतल छाया मंद बयार ।।

जीभ निकाले श्वान हांफते, 
दौड़ रहे थे वे बेहाल ।
ऊपर उदर किये बैठे थे, 
भूखे प्यास विकन विडाल ।।

कीट पतिंगे व्याकुल रहते, 
खग कुल के होते आहार।
बैठ किसी तरु की डाली पर, 
समय बिताते खग लाचार ॥

ताप-तप जल से बाहर आ, 
गेंडे खोज वृक्ष की छाँव।
हाँफ हाँफ कर दिवस बिताते, 
विहुल पाण ग्रीष्म के माह ॥

जल के लिए प्यास के मारे, 
व्याकुल मृग दौडे चहुँ ओर।
फिर निराश लौटते तुरंत ही,
हारे थके लगा कर जोर ।।

मृग मरीचिका की यह माया, 
इसमें नहीं किसी का दोष ।
आग उगलते सूरज को क्या?
होता है इससे संतोष ॥

इस शाखा से उस शाखा पर, 
उछल-कूद कपि थे बेहाल ।
प्यास मृत्यु को लेकर आयी, 
गला दबाये भीषण काल ॥

सरिताओं के हृदय क्षुब्ध थे 
देख भानु का अत्याचार । 
शक्ति क्षीण थी विवश सोचती, 
चलो करें हम मिल उपचार ॥

मानो भू की हरी शाटिका, 
हुई भानु कर से जल क्षार) 
जिससे चिंतित धरती रहती, 
व्याकुल नत सिर हो लाचार ।।

धीरे-धीरे भीषण गर्मी, 
अब कुछ शान्त लगी होने ।
चले जीव सब प्यास बुझाने, 
तथा उदासी निज खोने ॥

छिपी विवर में पिपीलिकाएँ; 
निकट देख रवि का अवसान।
आश्वासन सा देती मानो।
त्याग निराशा बढ़ो जवान ॥

एक पुरुष चिन्तित मुद्रा में, 
देख रहा था सब कुछ मौन।
कब तक रवि उगलेगा पावक,
इसे बताने वाला कौन ?

स्वयं बता कर लुप्त हो गया 
बरसाता पावक मार्तण्ड।
क्यूंकी जलाने जो चलता जग,
वही भोगता दण्ड प्रचण्ड ||

सोचा नेता जी ने मन में, 
लख रवि का पश्चिम प्रस्थान ।
हुए पूर्ण आश्वस्त भगेंगे, 
निश्चित भारत से शैतान ।।

वर्लिन में जब थे नेताजी,
रास बिहारी ने लिख पत्र ।
भेजा स्वयं टोकियो रह कर 
मुझसे मिले शीघ्र जन मित्र ।।

पढ़ा पत्र नेता सुभाष ने, 
जिसका लक्ष्य मात्र था एक, 
मिलें सुभाष टोकियो में आ 
जिससे हो वारताएं नेक ॥

उत्तर लिख भेजा सुभाष ने। 
करूंगा मैं अतिशीघ्र प्रयास ।
कुछ आवश्यक कार्य शेष हैं; 
कर के होगा फिर प्रस्थान ॥

करके सब कार्यों को पूरा, 
सेना को कर सजग समान।
चलने से पहले वर्लीन से, 
नेता वीर सुभास महान ॥

स्वसैनिकों को कर सम्बोधित, 
प्रकट किये निज मन के भाव । 
" वीर सैनिको मन में जो हो, 
उसमें रंच न करो दुराव ।।

मैंने जन्म लिया है केवल, 
करने हित भारत उद्घार ।
तब तक कर्म करूंगा अविचल, 
जब तक सिर से टले न भार"

बोलो वीरो ! जो कठिनाई, 
हो समक्ष अतिशय विकराल ।
दूर करूँगा यथा शक्ति मैं, 
मन, वाणी, क्रम से तत्काता ।।

यद्यपि है विश्वास मुझे यह, 
दृढ़ प्रतिज्ञ तुम हो मतिमान ।
कितने ही भीषण वैरी हों, 
कार करोगे तुम खलिहान ।।

लक्ष्य तुम्हारा एक यही हो, 
हे। भारत माता के लाल।
तुम न तनिक भी विचलित होगे, 
भले खड़ा हो सम्मुख काल ॥

जैसे भी भारत स्वतंत्र हो, 
कर लोगे तुम वैसा काम ।
तन, मन, धन सब कुछ देकर भी, 
लक्ष्य न चूकोगे अविराम ।।

वीर! लक्ष्य पूर्ण हों,
 इन्हीं कामनाओं के साथ।
विदा ले रहा हूँ मैं तुमसे ।
पुनः बढ़ाने हेतु स्वहाथ //

नयनों से हर्षअश्रू छलकते, 
अंग-अंग उल्लास अपार ।
 दे कर विदा स्व नेताजी को,
 नमन किया फिर बारम्बार ॥

हर हिटलर, से मिल कर के फिर, 
अन्य जनों से मिले सुभाष । 
अब जाना है मुझे टोकियो, 
कह चल पड़े मुदित सोल्लास ।

कर्नल हसन संग नेता ने 
किया टोकियो को प्रस्थान /
ध्वनि करता विमान नभ पथ से, 
चला वेग से पवन समान ॥

कुछ ही समय बिता कर पहुंचा, 
नगर टोकियो नभचर यान।
 उतर यान से चले लक्ष्य को, 
कर्नल हसन सुभाष महान ॥

आया देख सुभाष चन्द्र को, 
रास विहारी अन्य अनेक । 
हिन्द मूल के प्रतिनिधियों ने 
स्वागत किये विविध विधि नेक ।

माल्यार्पण कर नेता जी को 
करके विविध भाँति सत्कार ! 
आगत - स्वागत कर जनता ने 
किया मुदीत मन जय-जय कार ।।

रह करके कुछ समय टोकियो,
 में, नेता सुभाष बहु काम।
साहस धीरज मनो योग से,
 करते रहे सदा अविराम //

अंग्रेजी शासन में जितने -
थे, अधिकारी पद आसीन 
वे सब नेता जी के सम्मुख, 
बिखते थे अति दीन मलीन ।।

इसी लिए एकान्त जगह में,
 बैठ रचा करते थे जाल। 
जिसमें फँस भारत की सत्ता 
रहती थी निशि दिन बेहाल ।।

सम्बोधित कर के जन-जन को, 
श्री सुभाष ने अपने भाव 
प्रकट किये जिससे सब के ही
 बदले सारे पूर्व स्वभाव ॥

देखा जब नेता सुभाष ने, 
उनका कथन की सभी को मान्य/
और सभी तैयार निछावर – 
करने हित अपना धन-धान्य ॥

पुनः किया आरम्भ मुदित मन, 
निज प्रभावशाली वक्तव्य ।
 " मेरे हृदय धाम के बासी, 
अब है दूर नहीं गन्तव्य ॥

प्राप्त हुआ अवसर यदि चूके। 
तो होगी यह भारी भूल।
 अब तक का सब किया-कराया, 
मिल जायेगा निश्चित धूल //

पिछले महा युद्ध में हमको, 
दिया गया धोखा भरपूर
जिससे सारे कार्य हमारे,
हुए अचानक चकनाचूर ।।

ऐसा अवसर सौ वर्षों में, 
हमे मिलेगा क्या विश्वास ?
अतः पूर्ण स्वातंत्र्य प्राप्त हो,
अब करना है यही प्रयास ।।

हम अपना सर्वस्व होम कर, 
लेंगे निज मौलिक अधिकार।
और शत्रु को उत्तर देंगे, 
हथ इंट का पत्थर मार ॥

मिला सुअवसर हमको जो है,
 उसे नहीं अब खायेंगे। 
भारत माँ की मुक्ति के लिए, 
अब रह सजग रहन सोएंगे ।।

अंग्रेजी शासन का जब तक, 
रबि न अस्त हो जायेगा।
तब तक युद्ध हमारा उससे, 
सहज नहीं रुक पायेगा ॥

विजय हमारी होगी निश्चित, 
है इसमें संदेह नहीं।
अतः हमे बढ़ते रहना है, 
हो अपना संकल्प यही ॥

जापानी अधिकारी गण से, 
पा सहयोगी आश्वासन, 
नेता जी अब अति प्रसन्न थे,
खिले हृदय के भाव सुमन ।।

फिर सुभाष ने नभवाणी से, 
किया प्रसारित निज भाषण
"देश वासियो? उठो शत्रु को।
मार भगाने का कर प्रण

मैं यह जान रहा हूँ सम्यक, 
स्वार्थी कुछ भारत-वासी । 
अंग्रेजों थे वशी भूत हो, 
चढ़ा रहे हमको फाँसी ॥

नही भी मिलें देश-द्रोही, 
उन्हे निकालो भारत से।
कर दो ऐसी दशा खलों की,
दर-दर घूमें भारत से ॥

देश वासियो ! यही कहूंगा, 
तुम मुझ पर विश्वास करो।
मृत्यु साथ सब ले कर आये, 
अतः राष्ट्र के लिए मरो ॥

अंग्रेजी शासन प्रचण्ड है,
 जिसके सम्मुख सब निर्बल । 
अतः मुझे पग-पग दंडित कर
 दिख लाते हैं अपना बल ॥

मुझको प्रायः अपराधी कह,
हवा खिलायी कारा की।
जैसे पिजड़े में बन्दी शुक-
की दुर्गति, बिन चारा की ।।

वार ग्यारह बंदी करके, 
की मेरी दुर्गात भारी।
जिसके कारण मुझको ग्रसती -
थी, अति भीषण बीमारी ॥

पर मुझको पद्म च्यूत करने में,
 उसे सफलता मिली नहीं।
जिस प्रकार भी विजय प्राप्त हो,
 मात्र लक्ष्य हो एक यही ॥

छलिया वनचर शक्ति समन्वित, 
आंग्ल-शासकों की माया। 
हमे भ्रष्ट करने में असफल, 
यद्यपि नाना व्यूह रचाया ।।

भीतर के हैं या बाहर के,
 जितने भारतीय भाई,
 मिल कर सब ने संघ बनाया,
 हम सब को जो सुखदाई ॥

मैने बार-बार बतलाया, 
जब शुभ अवसर आता है।
तब भारत माँ के भक्तों का, 
जुडता उससे नाता है ।।

भारत वासी अब स्वतंत्र हो, 
शीघ्र मधुर फल पायेंगे। 
खोल जेल के दरवाजे फिर, 
स्वजनों को बाहर लायेंगे ।।

विजय प्राप्ति की प्रसन्नता में, 
उत्सव समय मनायेंगे।
और स्वमाथे के कलंक को, 
वे अति शीघ्र मिटायेंगे।।

हम स्वतंत्र हो कर युग-युग तक,
 कर भारत माँ की पूजा
 यो कृतार्थ हम हो जायेंगे, 
जय भारत मां स्वर गूंजा ॥

चौंक सभी ने मुड़ कर देखा,
 दिखे नेक भारत बासी ।
सब जय कार कर रहे आते।
जय सुभाष जय उर वासी "

आगत - स्वागत कर नेता जी,
 रास विहारी से मिल कर। 
कह सिंगापुर में मिलने को,
 वर्लिन जाने को तत्पर "

चले टोकियो से वर्लीन को,
 फिर नेता जी सहित हुलास । 
अंग-अंग में ओज भरा था। 
रोम-रोम में था उल्लास ॥



इति
 सप्तम सर्ग

यूपी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य