सुभाष चन्द्रिका

दशम सर्ग



रजनी के अवशेष अंश में, 
चन्द्र डूबने वाला था।
राहु केतु मे घेर रखा था,
पड़ा दुष्ट से पाला था।

लक्ष्य प्राप्त कर मानो हिमकर, 
था समाधि लेने वाला ।
प्राची दिशि में प्रातः का था,...
दृश्य सुधर दिखने वाला ।।

दुख-सुख का यह अद्भुत संगम, 
जन-जन को उड़कहित कर 
उठतीं कभी विषाम्त तरंगें, 
उर उनके आंदोलित कर ।।

और कभी हर्षातिरेक से,
झूम रहे थे भारत जन । 
" चीर तिमिर को ज्यों अरुणेदय, 
प्रभा विखेर रहा कण-कण ॥

पुनः दुख की भीषण ज्वाला, 
खौला कर मानस का नीर। 
नयन-मार्ग से बाहर करके, 
कर देती भीं कुछ कम पीर ॥

लख अदृश्य के दृश्य द्विधामय, 
विविध, प्रकृति के प्रांगण में। 
कहीं निरसता, कही सरसता ।
रह-रह दिखती नाण-कण में ।

हिन्द केशरी ने उठ देखा, 
नियति-परी का व्यापक रंग। 
स्वयं खो गये अपने में वे, 
हुआ मोह ज्यों जग से भंग ॥

विर्निमेष में रहे देखते,
उस अदृश्य के अद्भुत रंग ।
कही बिरह की विषम वेदना,
कही हर्ष से पुलकित अंग ॥

कहीं धरा पर गहवर छाया, 
कहीं चमकती दाहक धूप ।
कहीं रंक की सूनी कुटिया,
कही विभव से बोझिल भूप ।।

विविध विचार उठ रहे थे यों,
नेता जी के भीतर अमज,
स्यात् लक्ष्य अब सिद्ध हो गया,
भारत माता के सिर ताज ॥

स्वजनों से मिल नेताजी अब, 
कर बैंकाक हेतु प्रस्थान ।
लगे बनाने वहाँ पहुँकर, 
आगे की योजना सुजान।।

इसी समय डाक्यबाबेल का, 
आया अनचाहा प्रस्ताव । 
जिसको सुनने या गुनने का, 
नेता जी का न था स्वभाव ।।

सद्यः मना किया सुभाष ने,
 नहीं मानना है प्रस्ताव । 
अटल रहे काँग्रेसी नेता, 
कहें, नहीं है इसकी चाव ।।

ये अंग्रेज विश्व-वेरी हैं,
 इन्हें चाहिए अपना अर्थ। 
भले फंसे हों अन्य पंक में,
 ये हों परेशान क्यों व्यर्थ ।।

नेता जी के शब्द-शब्द थे, 
वशीकरण मन-मोहक मंत्र ।
कहुआ सत्य बोलने में थे, 
बचपन से ही परम स्वतंत्र ॥

अतः सभी भारत के नेता, 
मान लिये इनके सुविचार ।
हुई विफल बाबेकी गोष्ठी, 
बैठ रहे सिर धुन लाचार ।।

जो शंकाएं थीं सुभाष को, 
उनसे मुक्त हुए संतुष्ट ।
किन्तु देश के द्रोही दुर्जन, 
इससे हुए बहुत ही रुष्ट ॥

बनी योजना नेता जी की, 
शीघ्र पहुंचने की जापान ।
पहुंच वहाँ मिल हिरे हितो, से, 
शुरू करेंगे फिर अभियान ।।

नेता जी के साथ चले थे, 
सद् सहचर हबीबु रहमान । 
ध्वनि कर उड़ा विमान गगन में, 
शीघ्र पहुंचने को जापान ।।

साथ-साथ चल यम दूतों ने, 
घर किया विमान गतिहीन 1 
इस प्रकार भारत माता के 
पुत्र हो गये संज्ञा-हीन ।।

किया गया सारी दुनियाँ में, 
हृदय-विदारक यही प्रचार। 
आग लगी विमान में सहसा 
जल कर हुआ निमिष में क्षार ।।

जिसने सुना जहाँ पर व्याकुल, 
मचा हिन्द में हाहाकार । 
रास्ता साफ हुआ बैरी का, 
उमड़ा उर में हर्ष अपार ॥

सजल नयन कुछ लोग कह रहे, 
भारत का फूटा सौभाग्य ।
नाव किनारे पहुँच डूबने-
वाली है, कैसा दुर्भाग्य ।।

जगह-जगह थे स्वजन चीखते, 
रहा असह्य दुःख का भार 
हाय! विद्याता ! क्यों कर डाला?
 ऐसा भीषण क्रूराचार ।।

हम असहाय कहाँ जाये अब, 
और गहें हा। किसकी छाँह।
नहीं सूझता पथ कोई भी, 
हमें दिखा कौन सुराह ।।

इतने बड़े हाथ किसके हैं?
जो अब गहे हमारी बाँह ।
और दिखाये हमको प्रभुवर, 
चलने योग्य अकंटक राह"

एक सहारा रहा हमारा, 
वह भी नहीं हमारे बीच ।
उजड़ गयी वाटिका हमारी,
जिसे सजाया निशिदिन सींन्च "

आ कर ढाढ़स कौन बंधाए?
नेता कौन सुभाष समान । 
बोझिल नैया कौन संभाले, 
दिखता कोई नही महान।।

झुलसा उपवन राम सजायें?
या कि शत्रुओं की दुर्नीति।
छिना सहारा जिसका सहसा, 
उसके लिए चतुर्दिक भीति ॥

अब कोई क्या कुछ कर सकता?
मानवता जब सिसक रही है।
दानवता दृढ़ जाल बिछा कर, 
सब के सम्मुख विहंस रही है ।।

हाय! हमारे नेता प्यारे, 
कहाँ गए तुम हमे छोड़ कर।
क्या अपराध हो गया हमसे, 
चले गये सम्बन्ध तोड़ कर ।।

भारत माँ के प्यारे नन्दन !
 एक बार फिर से आ जाओ।
अपनी दुखिया माता को फिर. 
आश्वासन दे धीर बंधाओं।।

देखोगे दुर्दशा देश की,
 तो निश्चित अश्रु बहाओगे । 
पूछो गे कारण क्या है? तो,
 उत्तर उचित नहीं पाओगे ॥

तब तो सिर घुन बैठ रहोगे,
 नहीं समझ में कुछ आयेगा। 
"चिन्तन-रत रह सोचोगे तो, 
भेद कदाचित. खुल पायेगा ।

सजल नयन तुम बार-बार फिर, 
मन में पश्चाताप कारोगे। 
स्वप्न अधूरा रहा हमारा, 
आहें बारम्बार भरोगे ।।

हाय! विधाता इसी लिए क्या?
प्राणो का भी मोह त्याग कर।
जन. परिजन तब से विरक्त में, 
दस्यु मंगाने में था तत्पर ॥

नहीं जानता था स्वतंत्र हो ।
भारत वासी कर मनमानी ।
किये कराये पर बच्चों सा, 
अनायास फेरेंगे पानी ॥

जननी मुझे कोसती होगी, 
क्यों कपि को भूषण पहनाया ।
देख रहे थे जयचन्दों को,
तदपि तुम्हारी समझ न आया ॥

विश्व विजयिनी महा शक्ति से, 
धनुष बाण तुमने धरवाया।
पर अपने घर थे मनुजों से, 
बेटे। तुमने पार न पाया।।

तुमने कभी न सोचा होगा। 
धोखा देंगे अपने ही जन । 
यह भी सोचा होगा निश्चित, 
भारत से भागेंगे दुर्जन ।।

जिस धरती पर जन्म लिये हैं, 
हा। कृतप्न वे भारत वासी।
 जिनसे पेषित हुए आज तक, 
पुनः चाहते हो वह दासी ॥

देव-पुरुष । तुम यह मत सोचो, 
यह मानव-मन का अपकर्ष 
आशीर्वाद भेजते रहना। 
भारत का हो अति उत्कर्ष ॥

मात्र तुम्हारी कृपा चाहिए
 और नहीं कोई उपहार।
बुद्धि किसी की नहीं भ्रष्ट हो, 
हो सब के ही उच्च विचार ॥

यह मत समझो सब कृतन हैं, 
सभी यहां जयचन्द व मान।
पर बहु संख्यक आज भी यहाँ,
मंगल लक्ष्मी देवि समान ।।

मस्तक ऊंचा हुआ हिन्द का, 
तेरे बलिदानों से, 
गूँज रही हैं सकल दिशाएँ 
तेरे जय गानो से ।।

देव! देख तेरी महिमा को, 
और देख तेरा सद कार्य।
देश द्रोहियों को न सुहाया, 
तेरा देख सुव्रत अनिवार्य

अतः सर्प बन आस्तीन के, 
करके स्नेह-सुधा रस पान 
गरल वमन भून मिटायी, 
दुष्टों ने भारत की शान ।।

आज देव ! है स्वर्ग सुसोभित 
तुझको पा कर हर्ष विभोर । 
और धरित्री नरक हो गयी।
छाया अंधकार घनघोर ॥

आपने घर में आग लगा कर, 
अट्टहास करते भरपूर । 
बीट-कीट से अति प्रसन्न सह, 
सौरभ से रह कोसों दूर ।।

अंग्रेजो से छिप कर आये, 
जग में तुम हे! पुरुष महान । 
जग से छिप कर कहाँ गये तुम, 
हम सब के नेता भगवान ॥

हम तुमको पा निर्भय होकर, 
समझ रहे थे परम स्वतंत्र ।
कौन बतायेगा अब हमको,
स्वतंत्रता का पावन मन्त्र //

जहाँ कहीं भी है नेता तू, 
" देव ! स्वर्ग तेरा अधिकार। 
तेरे पद चिह्नों पर चल कर, 
मनुज करे अपना उद्धार ॥

हे। देश भक्त !! हे चिर महान, 
हे! देव दूत करुणा निधान।
हे! दुष्ट विनाशक सत्य प्राण, 
हे ! वीर यशस्वी शक्तिमान ।।

सब कुछ दे कर हमें चल दिये, 
हे ! त्यागी वैरागी वीर। 
कौन मिलेगा इस धरती पर, 
तुम सा पा सुर मनुज शरीर ॥

भारत वर्ष स्वतंत्र हो गया, 
लक्ष्य तुम्हारा पूर्ण हुआ।
 गोरे भूत भगे भारत से, 
अहंकार सब चूर्ण हुआ ॥

किन्तु एक दुर्दात निशाचर,
 भ्रष्टाचार मचा उत्पात ।
जन-जन के शोषण में तत्पर, 
अवहास करता दिन रात ॥

देश भक्त हम सब के नेता, 
एक बार फिर ले अवतार ।
भारत-भू से शीघ्र ध्वस्त कर दें, 
अति भीषण भ्रष्टाचार ॥

विश्व शांति का अब भी देते-
रहना शुभ संदेश उदार ।
तुझे नहीं हम कुछ दे सकते,
श्रद्धा सुमन मात्र अधिकार ।

जहाँ कही भी देव पुरुष हो, 
शान्ति मिले तुमको भरपूर ।
किसी तरह हम भारत वासी, 
जी लेंगे रह तुमसे दूर ।।


इति 
दशम सर्ग।


इति 
सुभाष चन्द्रिका।।

सुभाष चन्द्रिका

अष्टम सर्ग


कुछ रात शेष थी, कुक्कुट ने दी प्रात सूचना 
जगे चराचर कर्म निरत कर ईश अर्चना । 
नभचर उड़े समोद, गगन में पर फैलाये। 
करते कलरव इतस्ततः मधुरस बरसाये ॥

प्राची में अरुणाम छटा थी अति सुखदाई। 
देख दृश्य यह सचर-अचर में स्फूति समाधी।
 सब में था उत्साह मुदित थी सकल दिशाएँ। 
वातावरण सजीव सजग सब ने सुख पाये ॥

शीतल मन्द सुगन्ध वायु बहती मनभायी। 
कण-कण में थी, स्नेहमयी सुषमा सरसायी।
" धीरे-धीरे जब दिनकर कुछ ऊपर आये। 
उदयाचल के साथ सभी थल विभा विछाये ॥

मह- मह महकी पुष्प वाटिका सुरभि लुटाती ।
मनन-मनन जिसके भीतर भ्रमावलि गाती 
रंग-बिरंगी विविध तितालियाँ नर्तन करतीं।
हाव-भाव रस-रंग रूप मानस में भरतीं ।॥

खिले जलज बहु रंग जीव सब थे प्रसन्न मन । 
करता कलरव गान विहरता मुदित विहग गन। 
बिखरे मधुर सुवास, वायु मण्डल का कण-कण ।
 था सुषमा संयुक्त सभी के थे पुलकित मन ॥

देख मोहक रूप प्रातः काल का।
 दीप्त था मृदु रूप नेता भाल का। 
देखते कुछ क्षण रहे मन में मगन ।
हटा फिर तो घ्यान, कह कर हा वतन

मधुमय दृश्य विलोक प्रात का,
 श्री सुभाष के मन में आया। 
भाग्योदय का प्रथम चिन्ह यह।
 विश्व रूप की है यह माया ॥

धैर्य और विश्वास ने कहा,
अब है निश्चित विजय तुम्हारी)
अतः घोर संग्राम में जुटो,
 है यह आवश्यकता भारी ।।

अब न मुझे चिन्ता करनी है,
 और निराश नहीं होना है।
अब तक जो कुछ खोया हमने, 
आगे और नहीं खोना है।।

हमको निज सर्वस्व मिटा कर, 
आजादी को पा लेना है।
जितना भी अन्याय हुआ है, 
उसका बदला ले लेना है ।।

बर्लिन सुभाष ने जा कर के, 
निज सेना को संदेश दिया।
करतल ध्वनि के साथ सभी ने, 
आदेश तुरंत स्वीकार किया ।।

सब ने की प्रार्थना इश से, 
नेता सुभाष जी अमर रहे।
समय-समय पर शुभ कर, जो हो
हम सब लोगों के बीच कहें।

श्री सुभाष ने सम्बोधित कर,
 महिलाकों में ओज भर दिया।
लक्ष्मी बाई मात्र अकेली 
ने दुश्मन को मात कर दिया ।।

तुम्हे न झांसी सी की रानी सम, 
एकाकी रण में जाना है।
अपितु वीर-ललनाओं के संग, 
वैरी को सीख सिखाना है।

तेज तुम्हारा क्षीण न होगा,
 शत्रु समक्ष नहीं आयेंगे।
मार काट खलिहान करोगी, 
जो भी तुमसे टकरायेंगे ।।

साधन-हीन एक रानी ने,
 भीषणु कुहराम मचाया था।
उसे मार खैकार कर दिया, 
वैरी जो सम्मुख आया था ।

तुम तो धधक रही वह ज्वाला,
 उसे बुझाने जो आयेगा।
तुख जला कर खाक करोगी,
 नभ मण्डल में उड़ जायेगा ।।

अतः उठो देवियो समय है,
 आज बहुत अनुकूल तुम्हारे ।
और रहे मडरा रिपुओं के
 ऊपर अब विनाश घन कारे ॥

सुन सुभाष के उत्प्रेरक ओजस्वी भाषण ।
 सब के मन में बढ़ा क्रान्ति के प्रति आकर्षण।
 वीर नारियों की नस-नस में विद्युत धारा। 
भारतीय वीरों ने रिपुओं को ललकारा ।।

नेता ने ललकार चुनौती शत्रु पक्ष को -
दी, भारत के वीर तुम्हारे वीर वक्ष को। 
भेजेंगे यमलोक न होगा रक्षम कोई। 
तुमने ही विषवेलि, स्वयं अपने हित बोयी।

पश्चाताप अपार, करोगे कुछ दिन बीतें । 
रोओगे ने सिर पीट, बुध्दि बल वैभव रीते।
 समझ न आती बात तुम्हारी हे! मतवाले। 
तुम ही ज्यों भगवान, हृदय के कुत्सित कालें ।॥

कर पग-पग अन्याय, बन रहे उत्तम प्राणी।
गंवा रहे दिन-रात, मनुज का पावन पानी।
बनो न श्रेष्ठ महान, नित्य दुष्कर्म निरत रह।
करो, न निज गुण गान,स्वयं को मानव कह कह ।।

यदि हो कर के श्रेष्ठ, तुम्हे जीना है जग में।
है पाना सम्मान, अगर तुमको पग-पग में।
तो न श्येन सा कर्म करो मानवता तज कर।
घृणा न कर उत्पन्न, स्व कलुषित मुँह दिखला कर ।।

मना उत्सव अब चारों ओर, 
हृदय में सब के हर्ष अपार ।
 हुई है ज्यों आजादी प्राप्त, 
मिल गया हो जीवन आधार ।।

हृदय की आजादी के बाद,
 हुआ ज्यों पिंजड़े से शुक मुक्त।
आह। कितनी सदियों के बाद,
 हुई है भारत मां उन्मुक्त ॥

इन्हीं भावों के साथ सहर्ष ।
अमेरिका व इंग्लैंड विरुद्ध ।
घोषणा की सुभाष ने आज,
सजग हो आओ करने युद्ध ।।

घोषणा सुन सारा संसार,
चकित अब करने लगे विचार ।
अहा जग में है नेता एक, 
करेगा भारत का उद्धार ॥

जिसने सुनी घोषणा युद्ध, 
वही भारतवासी तैयार ।
हो गया सब कुछ अर्पण हेतु 
अहो अनुपम यह उच्च विचार ॥

सैनिकों को करने तैयार
 लगे नेता सुभाष तत्काल 
हुआ आदेश तुरंत रधीर, 
कूच कर दिये प्राप्त शुभ काल ।।

मिली जापानी सेना शीघ्र, 
हिन्द सेना के साथ सहर्ष।
उभय सेनाओं के मिल वीर, 
लगे करने भीषण संघर्ष ॥

संसाधन थे सैनिक जापान
 दिखाते रण-कौशल अविराम ।
इधर पैदल भारत के वीर,
 रहे करते भीषण सग्रांम //

आजाद हिन्द सैनिक सोल्लास ।
बढ़ चले रणक्षेत्र की ओर।
उधर भारत की सेना देख । 
क्रुद्ध अरि लगे मचाने शोर

इधर भारत के सैनिक खीज, 
बुलाने लगे शत्रु को पास। 
"बढ़ो आगे सफेद शैतान;
 हो रहे हो क्यों अभी हताश ॥

उभय सेनाओं के ही बीच, 
लगा होने भीषण संग्राम। 
शत्रु दल था साधन सम्पन्न, 
बिना साधन भारत ज्यों राम ।

बर्मा के प्रधान बामा ने, 
करने का पूरा सहयोग । 
वचन दिया भारत सेना को, 
था यह शुभ कारक संयोग ।।

सुन बामा की मधुमय बातें, 
हिन्द सैनिकों में उत्साह ।
और अधिक बढ़ गया तुरंत ही, 
सबमें बढ़ी विजय की चाह ॥

अस्त्र-शस्त्र की कमी नहीं थी,
 अंग्रेजी सेना के पास।
जिसके कारण भारत सैनिक,
 प्रायः दिखते अधिक उदास ॥

किन्तु स्वयं में शक्ति समेटे,
 भारत के सैनिक प्रलयंकर।
खेद-खेद कर मार गिराते, 
वैदेशिक रिपुकों को सत्वर ॥

उधर विदेशी सैनिक सारे, 
कर प्रयोग वैज्ञानिक साधन ।
मार रहे थे हिन्द सैनिकों - को
 अवसर पाकर शत्रु मुदित मन ।।

एक और धाय-धाँय थी, 
होती गोली की बौछार ।
एक और लाठी डंडे से, 
करते वार वीर लाचार ।।

कितने हिन्द सैनिकों के कर, 
थी शोभा पाती करवाल ।
कुछ के कर में थी बन्दूकें,
 ज्यों वैरी के काल कराल ।।

कुछ सेनानी वीर निहत्थे, 
मल्ल युद्ध में पूर्ण प्रवीण ।
उठा फेंकते थे रिपुलों को, 
जो हो जाते प्राण-विहीन ।।

धीरे-धीरे लगे पिछड़ने,
 शत्रु पक्ष के वीर अशक्त
 पीछा करते थे खदेड़ते।
 भारत माँ के सच्चे भक्त ॥

बढ़ा मनोबल हिन्द सैन्य का, 
था उनमें अपूर्व उल्लास । 
शत्रु पक्ष में दैन्य भाव था, 
निज जीवन से हुए निराश ।।

थी आजाद सेना हिन्द सेना शुचि, 
ज्यों सुर-सरि का निर्मल नीर।
 जाति धर्म का भेद नहीं था,
 सब भारत माँ के सुत बिर ॥

सब का एक लक्ष्य था केवल, 
भारत माता हो उन्मुक्त।
और रहें उनकी संताने,
सारी सुख सुविधा संयुक्त ॥

नही किसी में भेदभाव था, 
और किसी में नहीं दुराव ।
एक साथ था खान-पान सब,
तथा सभी में था सम भाव ।।

वर्ण नाम का पता नहीं था,
सब का मात्र एक था कर्म।
भारत माता कब स्वतंत्र हो,
सबका एक यही था धर्म ।।

इसी लिए सब एक साथ मिल, 
लगे तोड़ने में अरि-व्यूह।
कभी नहीं पीछे हटते थे।

बढ़ते रहे हिन्द के सैनिक, 
होता रहा घोर संग्राम /
विजय एक के बाद दूसरी, 
करते बढ़ते थे अविराम ॥

टिडडिम पर अधिकार प्राप्त कर, 
आगे बढ़ते रहे जवान । 
इसी बीच, पर कुछ सेनानी,
 भाग गये कायर नादान ।।

इसकी चिन्ता किये बिना ही, 
भारत के सैनिक बलवान । 
ढा कर घोर विपत्ति शत्रु का, 
मिटा रहे थे नाम निशान ॥

विजय कोहिमा पर पाकर जब, 
आगे बढ़े हिन्द के शेर।
विषम परिस्थिति थी फिर भी वे, 
मार कर रहे थे अरि ढेर ।।

इसी समय जापानी लोगो -
का, लख कर अशिष्ट व्यवहार। 
क्षुब्ध हुए भारत के सैनिक, 
हुआ हृदय में कष्ट अपार ॥

फिर भी निज कर्तव्य ध्यान से,
 रंच न होने पाया ओझल ।
 लक्ष्य-सिधित हित रहे जूझते, 
आत्मा का पाकर के सम्बल ॥

भौतिक सुख-सुविधाएं तज कर 
मोह स्वप्राणों का भी त्याग। 
जंग-ज्वाल में कूद रहे थे,
 भारत के सैनिक बेदाग ॥

भारतीय महिलाओं का लख, 
रण-कौशल वैरी थे दंग। 
शत्रु सैनिकों का सहसा अब
 उतर चला था मुँह का रंग ॥

भारत-सैनिक महिलाओं का,
 था द्रष्टव्य घोर संग्राम।
 मर कट उभय दलों के सैनिक, 
पहुँच रहे थे यम को धाम ।।

इधर-उधर से दोनो दल का, 
होता रहा वार पर वार। 
कुछ ही क्षण में बचे सिपाही,
 वैरी के भागे लाचार ॥

इस प्रकार परतंत्र भूमि पर, 
विजय प्राप्त कर, कर अधिकार।
हिन्द, नारियों ने दिखलाया,
 दुनिया को स्वशक्ति भण्डार ॥

देखा जग ने चकित हिन्द की-
ललओं का शौर्य अपार ।
पानी के हित कैसा मरना, 
कैसा जीना नहीं विचार ॥

कर्नल शाहनवाज डिवीजन,
 को भेजा तुरंत इम्फाल। 
सिंह नाद कर झपटी सेना,
 शत्रु के लिए व्याल कराल ॥

घमासान था युद्ध हो रहा, 
जल-मर गिरते रहे जवान।
उनके शव पर से ही चलते,
 बढ़ कर लेते रहे निशान ॥

किये बिना परवाह किसी की, 
रहे जूझते वीर जवान ।
उभय पक्ष के वीरों के शव -
से, ज्यों थी रण भू समसान ॥

अद्भुत रण-कौशल दिखता था, 
हिन्द सैनिकों अविराम ।
अस्त्र-शस्त्र से लैस विपक्षी, 
होते रहे तदपि नाकाम ।।

इस प्रकार भारत के सैनिक, 
करते हुए घोर संघर्ष।
और विजय पर विजय प्राप्त कर,
 आगे बढ़ते रहे सहर्ष ।।

संघर्षों की बलिवेदी पर, 
होते हुए शहीद जवान।
कब्जा कर अनेक क्षेत्रों पर
 फहरा परचम राष्ट्र निशान।।

स्वतंत्रता की ललक तीव्र थी, 
आगे बढ़ते रहे सुधीर । 
अब तो दिल्ली दूर नहीं है, 
दिल्ली चलो वीर गम्भीर ॥

इसी समय आजाद हिन्द सेना के ऊपर, 
मंडराया दुर्भाग्य हटे पीछे निर्भय पर-
इस घटना से दुःख हुआ जो भी सुन पाया
 सब के भीतर क्षोभ और नैरास्य समाया

पर सुभाष को दुःख नहीं, ये आशावादी, 
मित्रो! दृढ़ विश्वास, प्राप्त होगी आजादी।
 त्यागे मन का क्षोभ तजो चिन्ताएँ सारी,
 वीर! उठो सवेग करो रण की तैयारी ॥



इति 
अष्टम सर्ग

सुभाष चन्द्रिका

सप्तम सर्ग


ग्रीष्म दुपहरी में नभ से था, 
बरस रहा भीषण अंगार।
जीव जन्तु सब खोज रहे थे, 
शीतल छाया मंद बयार ।।

जीभ निकाले श्वान हांफते, 
दौड़ रहे थे वे बेहाल ।
ऊपर उदर किये बैठे थे, 
भूखे प्यास विकन विडाल ।।

कीट पतिंगे व्याकुल रहते, 
खग कुल के होते आहार।
बैठ किसी तरु की डाली पर, 
समय बिताते खग लाचार ॥

ताप-तप जल से बाहर आ, 
गेंडे खोज वृक्ष की छाँव।
हाँफ हाँफ कर दिवस बिताते, 
विहुल पाण ग्रीष्म के माह ॥

जल के लिए प्यास के मारे, 
व्याकुल मृग दौडे चहुँ ओर।
फिर निराश लौटते तुरंत ही,
हारे थके लगा कर जोर ।।

मृग मरीचिका की यह माया, 
इसमें नहीं किसी का दोष ।
आग उगलते सूरज को क्या?
होता है इससे संतोष ॥

इस शाखा से उस शाखा पर, 
उछल-कूद कपि थे बेहाल ।
प्यास मृत्यु को लेकर आयी, 
गला दबाये भीषण काल ॥

सरिताओं के हृदय क्षुब्ध थे 
देख भानु का अत्याचार । 
शक्ति क्षीण थी विवश सोचती, 
चलो करें हम मिल उपचार ॥

मानो भू की हरी शाटिका, 
हुई भानु कर से जल क्षार) 
जिससे चिंतित धरती रहती, 
व्याकुल नत सिर हो लाचार ।।

धीरे-धीरे भीषण गर्मी, 
अब कुछ शान्त लगी होने ।
चले जीव सब प्यास बुझाने, 
तथा उदासी निज खोने ॥

छिपी विवर में पिपीलिकाएँ; 
निकट देख रवि का अवसान।
आश्वासन सा देती मानो।
त्याग निराशा बढ़ो जवान ॥

एक पुरुष चिन्तित मुद्रा में, 
देख रहा था सब कुछ मौन।
कब तक रवि उगलेगा पावक,
इसे बताने वाला कौन ?

स्वयं बता कर लुप्त हो गया 
बरसाता पावक मार्तण्ड।
क्यूंकी जलाने जो चलता जग,
वही भोगता दण्ड प्रचण्ड ||

सोचा नेता जी ने मन में, 
लख रवि का पश्चिम प्रस्थान ।
हुए पूर्ण आश्वस्त भगेंगे, 
निश्चित भारत से शैतान ।।

वर्लिन में जब थे नेताजी,
रास बिहारी ने लिख पत्र ।
भेजा स्वयं टोकियो रह कर 
मुझसे मिले शीघ्र जन मित्र ।।

पढ़ा पत्र नेता सुभाष ने, 
जिसका लक्ष्य मात्र था एक, 
मिलें सुभाष टोकियो में आ 
जिससे हो वारताएं नेक ॥

उत्तर लिख भेजा सुभाष ने। 
करूंगा मैं अतिशीघ्र प्रयास ।
कुछ आवश्यक कार्य शेष हैं; 
कर के होगा फिर प्रस्थान ॥

करके सब कार्यों को पूरा, 
सेना को कर सजग समान।
चलने से पहले वर्लीन से, 
नेता वीर सुभास महान ॥

स्वसैनिकों को कर सम्बोधित, 
प्रकट किये निज मन के भाव । 
" वीर सैनिको मन में जो हो, 
उसमें रंच न करो दुराव ।।

मैंने जन्म लिया है केवल, 
करने हित भारत उद्घार ।
तब तक कर्म करूंगा अविचल, 
जब तक सिर से टले न भार"

बोलो वीरो ! जो कठिनाई, 
हो समक्ष अतिशय विकराल ।
दूर करूँगा यथा शक्ति मैं, 
मन, वाणी, क्रम से तत्काता ।।

यद्यपि है विश्वास मुझे यह, 
दृढ़ प्रतिज्ञ तुम हो मतिमान ।
कितने ही भीषण वैरी हों, 
कार करोगे तुम खलिहान ।।

लक्ष्य तुम्हारा एक यही हो, 
हे। भारत माता के लाल।
तुम न तनिक भी विचलित होगे, 
भले खड़ा हो सम्मुख काल ॥

जैसे भी भारत स्वतंत्र हो, 
कर लोगे तुम वैसा काम ।
तन, मन, धन सब कुछ देकर भी, 
लक्ष्य न चूकोगे अविराम ।।

वीर! लक्ष्य पूर्ण हों,
 इन्हीं कामनाओं के साथ।
विदा ले रहा हूँ मैं तुमसे ।
पुनः बढ़ाने हेतु स्वहाथ //

नयनों से हर्षअश्रू छलकते, 
अंग-अंग उल्लास अपार ।
 दे कर विदा स्व नेताजी को,
 नमन किया फिर बारम्बार ॥

हर हिटलर, से मिल कर के फिर, 
अन्य जनों से मिले सुभाष । 
अब जाना है मुझे टोकियो, 
कह चल पड़े मुदित सोल्लास ।

कर्नल हसन संग नेता ने 
किया टोकियो को प्रस्थान /
ध्वनि करता विमान नभ पथ से, 
चला वेग से पवन समान ॥

कुछ ही समय बिता कर पहुंचा, 
नगर टोकियो नभचर यान।
 उतर यान से चले लक्ष्य को, 
कर्नल हसन सुभाष महान ॥

आया देख सुभाष चन्द्र को, 
रास विहारी अन्य अनेक । 
हिन्द मूल के प्रतिनिधियों ने 
स्वागत किये विविध विधि नेक ।

माल्यार्पण कर नेता जी को 
करके विविध भाँति सत्कार ! 
आगत - स्वागत कर जनता ने 
किया मुदीत मन जय-जय कार ।।

रह करके कुछ समय टोकियो,
 में, नेता सुभाष बहु काम।
साहस धीरज मनो योग से,
 करते रहे सदा अविराम //

अंग्रेजी शासन में जितने -
थे, अधिकारी पद आसीन 
वे सब नेता जी के सम्मुख, 
बिखते थे अति दीन मलीन ।।

इसी लिए एकान्त जगह में,
 बैठ रचा करते थे जाल। 
जिसमें फँस भारत की सत्ता 
रहती थी निशि दिन बेहाल ।।

सम्बोधित कर के जन-जन को, 
श्री सुभाष ने अपने भाव 
प्रकट किये जिससे सब के ही
 बदले सारे पूर्व स्वभाव ॥

देखा जब नेता सुभाष ने, 
उनका कथन की सभी को मान्य/
और सभी तैयार निछावर – 
करने हित अपना धन-धान्य ॥

पुनः किया आरम्भ मुदित मन, 
निज प्रभावशाली वक्तव्य ।
 " मेरे हृदय धाम के बासी, 
अब है दूर नहीं गन्तव्य ॥

प्राप्त हुआ अवसर यदि चूके। 
तो होगी यह भारी भूल।
 अब तक का सब किया-कराया, 
मिल जायेगा निश्चित धूल //

पिछले महा युद्ध में हमको, 
दिया गया धोखा भरपूर
जिससे सारे कार्य हमारे,
हुए अचानक चकनाचूर ।।

ऐसा अवसर सौ वर्षों में, 
हमे मिलेगा क्या विश्वास ?
अतः पूर्ण स्वातंत्र्य प्राप्त हो,
अब करना है यही प्रयास ।।

हम अपना सर्वस्व होम कर, 
लेंगे निज मौलिक अधिकार।
और शत्रु को उत्तर देंगे, 
हथ इंट का पत्थर मार ॥

मिला सुअवसर हमको जो है,
 उसे नहीं अब खायेंगे। 
भारत माँ की मुक्ति के लिए, 
अब रह सजग रहन सोएंगे ।।

अंग्रेजी शासन का जब तक, 
रबि न अस्त हो जायेगा।
तब तक युद्ध हमारा उससे, 
सहज नहीं रुक पायेगा ॥

विजय हमारी होगी निश्चित, 
है इसमें संदेह नहीं।
अतः हमे बढ़ते रहना है, 
हो अपना संकल्प यही ॥

जापानी अधिकारी गण से, 
पा सहयोगी आश्वासन, 
नेता जी अब अति प्रसन्न थे,
खिले हृदय के भाव सुमन ।।

फिर सुभाष ने नभवाणी से, 
किया प्रसारित निज भाषण
"देश वासियो? उठो शत्रु को।
मार भगाने का कर प्रण

मैं यह जान रहा हूँ सम्यक, 
स्वार्थी कुछ भारत-वासी । 
अंग्रेजों थे वशी भूत हो, 
चढ़ा रहे हमको फाँसी ॥

नही भी मिलें देश-द्रोही, 
उन्हे निकालो भारत से।
कर दो ऐसी दशा खलों की,
दर-दर घूमें भारत से ॥

देश वासियो ! यही कहूंगा, 
तुम मुझ पर विश्वास करो।
मृत्यु साथ सब ले कर आये, 
अतः राष्ट्र के लिए मरो ॥

अंग्रेजी शासन प्रचण्ड है,
 जिसके सम्मुख सब निर्बल । 
अतः मुझे पग-पग दंडित कर
 दिख लाते हैं अपना बल ॥

मुझको प्रायः अपराधी कह,
हवा खिलायी कारा की।
जैसे पिजड़े में बन्दी शुक-
की दुर्गति, बिन चारा की ।।

वार ग्यारह बंदी करके, 
की मेरी दुर्गात भारी।
जिसके कारण मुझको ग्रसती -
थी, अति भीषण बीमारी ॥

पर मुझको पद्म च्यूत करने में,
 उसे सफलता मिली नहीं।
जिस प्रकार भी विजय प्राप्त हो,
 मात्र लक्ष्य हो एक यही ॥

छलिया वनचर शक्ति समन्वित, 
आंग्ल-शासकों की माया। 
हमे भ्रष्ट करने में असफल, 
यद्यपि नाना व्यूह रचाया ।।

भीतर के हैं या बाहर के,
 जितने भारतीय भाई,
 मिल कर सब ने संघ बनाया,
 हम सब को जो सुखदाई ॥

मैने बार-बार बतलाया, 
जब शुभ अवसर आता है।
तब भारत माँ के भक्तों का, 
जुडता उससे नाता है ।।

भारत वासी अब स्वतंत्र हो, 
शीघ्र मधुर फल पायेंगे। 
खोल जेल के दरवाजे फिर, 
स्वजनों को बाहर लायेंगे ।।

विजय प्राप्ति की प्रसन्नता में, 
उत्सव समय मनायेंगे।
और स्वमाथे के कलंक को, 
वे अति शीघ्र मिटायेंगे।।

हम स्वतंत्र हो कर युग-युग तक,
 कर भारत माँ की पूजा
 यो कृतार्थ हम हो जायेंगे, 
जय भारत मां स्वर गूंजा ॥

चौंक सभी ने मुड़ कर देखा,
 दिखे नेक भारत बासी ।
सब जय कार कर रहे आते।
जय सुभाष जय उर वासी "

आगत - स्वागत कर नेता जी,
 रास विहारी से मिल कर। 
कह सिंगापुर में मिलने को,
 वर्लिन जाने को तत्पर "

चले टोकियो से वर्लीन को,
 फिर नेता जी सहित हुलास । 
अंग-अंग में ओज भरा था। 
रोम-रोम में था उल्लास ॥



इति
 सप्तम सर्ग

सुभाष चन्द्रिका

षष्ट सर्ग

बीती रजनी तमन्चुर बोले, 
स्वप्न लोक से लौटे लोग।
हेम कलश ले उषा चल पड़ी,
वितरित करने, शुभ-सुख भोग।

सजी वाटिका रंग-विरंगी, 
अति कुल का करती आव्हान ।
मधु बरसातीः सुरभि लुटाती, 
करने हेतु जीव कल्याण ॥

खग- मृग जग कर विनती करते, 
हे परमेश्वर! जग के नाथ।
मानव-कुल से रक्षा करिये, 
बढ़ा दया का अपना हाथ ॥

शीतल, मंद, सुगन्ध वायु बह, 
नव स्फूर्ति भरती अविरल ।
जगे चराचर निद्रा त्यागे, 
देख प्रकृति का रूप विमल ।।

कर्म क्षेत्र में उतर पड़े अब, 
सब में बढ्ने का उत्साह ।
अपनी-अपनी राहों पर चल, 
वेग रहा ज्यों सरित-प्रवाह ॥ 

एक पुरुष ने चिन्तन रत रह, 
जाग बितायी सारी रात ।
ओर समझ कर बिस्तर छोड़ा, 
बीती रात हो गया प्रात ॥ 

बना योजना हर हिटलर से,
मिलने की फिर से तत्काल ।
जिससे भाग हिन्द देश से, 
सारे श्वेत भूत बैताल ॥

मिले सुभाष चन्द्र हिटलर से, 
उसने ललक मिलाया हाथ।
भूरि प्रशंसा कर के बोला, 
"हम हैं वीर तुम्हारे साथ ।। 

पर ही एक बात से चिंतित, 
जिससे हूँ अत्यधिक अधीर ।
वैरी के बन मित्र लड़ रहे, 
हमसे भारत के रणधीर ।।

समाधान अति कठिन, न दिखता -
इसका कोई सहज निदान ।
कैसे कहूँ हमारे सैनिक, 
देंगे निज वैरी को मान ।।

हृदय खोल कर अगर साथ दें, 
तो होगी यह बात विचित्र ।
फिर भी सब सुविधाएँ दूंगा, 
निः संदेह, न मिथ्या मित्र ।।

सुन हिटलर की तार्किक बातें, 
रह सुभाष कुछ क्षण गम्भीर। 
बोले, 'जर्मनेश, कोशिश से, 
होंगे वश में भारत-वीर ॥ १२

मैं संदेश भेज कर अपना, 
रोकूंगा उनको तत्काल । 
लड़े नहीं जर्मन सेना है 
मिल कांटे वैरी के जाल ।।

हिन्द सैनिकों के खेमें में। 
पहुँचा नेता का संदेश, 
हुए चकित सब सैनिक क्षण में, 
बदल गया सारा परिवेश ॥

क्या लिख भेजा नेता जी ने, 
सब में कौतूहल भरपूर । 
प्रिय नेता हैं जर्मन में ही, 
हम से नहीं रहे आते दूर ॥

जो लिख भेजा था सुभाष ने, 
पढ़ा गया वह शुभ संदेश। 
सब सुनने में दत्त-चित्त थे, 
ज्यों अधिकारी का आदेश ॥

सुनो ध्यान से भारत- पुत्रो ! 
पहुंच गया हूँ जर्मन देश। 
नम्र निवेदन मैं करता हूँ, 
तुम से वीरो। एक विशेष ॥

बन्धु ! तुम्हें जानना चहिए, 
तुम छेड़े हो जो संग्राम
वह ब्रिटेन जर्मन सम्बन्धित; 
उससे नहीं हमारा काय /

अतः चाहता हूँ मैं वीरो !
 बन्द करो यह भीषण जंग। 
सन्धि करो जर्मन सेना से, 
बन कर लड़ो उसी के भंग ॥

सुन संदेश सुभाष चन्द्र के, 
फाड़क उठे वीरों के अंग।
सब के मानस में अब ठठने
लगी, हर्ष की तुंग तरंग ।।

हिन्द सैनिकों के मन में था, 
नेता जी के प्रति अनुराग ।
उमड़ा वे थे पूर्ण समर्पित, 
ज्यों सब उठे नींद से जाग ।।52

झण्डा ऊंचा कर के आगे,
 बढ़ने लगे हिन्द के वीर।
जर्मन-सेना हुई सशंकित, 
शायद यह दुर्नीति गंभीर ।।

फिर भी सावधान हो कर के, 
लगे प्रतीक्षा करने शान्त ।
भारत सैनिक रूके निकट जा, 
मिटा विपक्षी-शंका-ध्वान्त ।।

एक दूत ने जर्मन सेना -
में जा दिया संधि प्रस्ताव ।
हृदय-कली खिल उठी अचानक,
सब में जागे मैत्री भाव ॥

समाचार जब सुखद सुना यह, 
हर्षित हिटलर ने साभार ।
मिल कर गले सुभाष से कहा, 
आप नहीं नर हैं अवतार ।।

भेंट रूप में जो कुछ भी दूँ,
 वह सर्वथा रहेगा न्यून।
 हृदय हर्ष से गद्गद मेरा, 
अर्पित मेरे भाव प्रसून ।।

यथा शक्ति हे मित्र ! आप का,
 मैं करके निशि-दिन सहयोग। 
लक्ष्य सिद्धि हित पल करूँगा, 
तज कर जीवन का सुख भोग 1

नेता जी के लिए कराया, 
हर हिटलर ने नवनिर्माण ।
एक रेडियो स्टेशन का जो, 
कृतज्ञता का पुष्ट प्रमाण ॥

मात्र आप के लिए मित्र यह, 
करें प्रसारित हार्दिक भाव। 
निश्चित ही प्रत्येक व्यक्ति पर, 
होगा इसका पूर्ण प्रभाव ।।,

" आप कर रहे हैं जो कुछ भी,
 मेरे हित हे मनुज महान। 
किस प्रकार मैं उसच्ण हो सकूँ?
 इसका दिखता नहीं निदान ॥

दिया आपने प्रश्रय मुझको, 
जिससे मिला सशम्ताधार। 
यहाँ निहत्या में था आया, 
दिया आप ने शस्त्रागार ॥

फिर भी आप दे रहे मुझको, 
क्यों इतना महत्व सम्मान ।
यह महानता मात्र आप की, 
जो लघु थी कह रहे महान ",,

एक दूसरे को अपने से, 
मान रहे थे श्रेष्ठ महान।
एक अन्य को पूर्ण समर्पित,
 दोनो ही व्यक्तित्व समान 1

पा सहयोग पूर्ण हिटलर का, 
अब इटली को कर प्रस्थान ।
मिल मुसोलिनी से सुभाषने, 
कार्य किया अपना आसान ।।

अब सुभाष जी कई शक्तियों-
का पाकर, सहयोग अपार ।
आशान्वित हो गये लक्ष्य का,
 प्राप्त हुआ ज्यों दृढ़ आधार ।।

सभी योजनाको का बर्लिन 
गया बनाया केन्द्र सहर्ष । 
शत्रु पराजित जैसे भी हों,
 करता है वैसा संघर्ष ॥ 

कर आजाद हिन्द सेना, का 
दृढ़ संगठन और विस्तार 1।
बढ़ा मनोवल वीर सैनिको-
का, ज्यों प्राप्त लक्ष्य का द्वार ॥

अभिवादन पद वीर सैनिकों का, 
स्वदेश का था 'जय हिन्द, ।
 गूंज उठी वाणी सुभाष की। 
ज्यों कमलों से गूंज मिलिन्द ॥

लख प्रभाव नेता सुभाष का…
 और संगठन-शक्ति कपार ।
अति प्रसन्न मन हर हिटलर ने,
 किया उचित आदर सत्कार ।।

खान-पान आवास व्यवस्था, 
कर हिटलर ने अति प्रसन्न मन । 
ऐसी ममता स्नेह प्राप्त कर,
 हिन्द सैनिकों के पुलकित मन ।।

जर्मन-भारत के सैनिक मिल, 
करने लगे वार पर वार ।
भरी सेना में मची खलबली,
भागे पीठ दिखा लाचार ।।

सन-सन चलने लगी गोलियाँ,
 जगह-जगह कट-कट तलवार' 
बैरी सैनिक ढेर हुए बहु,
 कुछ पक्षी भी खाये मार ॥

भूरि प्रशंसा कर हिटलरने, 
धन्यवाद दे वारंवार ।
भर उत्साह, युगल सेना में,
प्रकट किया बहु विध सहकार ॥

किया प्रसारित नेता जी ने, 
बर्लिन से अपना संदेश।
हिन्द मूल के जितने भी थे, 
जग में उनके लिए विशेष //

भारत-वीरो सुनो ध्यान से,
 होंगे हम अति शीघ्र स्वतंत्र ।
यह सदात्मा की पुकार है, 
चलो मान कर इसको मन्त्र।।

भारत-भूमि हमारी माता,
 इस पर अपना ही अधिकार ।
पर-धन जीवी टिक न सकेंगे, 
यदि हो माता के प्रति प्यार।।

अपने भाग्य विधाता हम ही,
 ये यायावर विकट पिशाच। 
इन्हें भगाओं भारत भू से, 
अब न पढ़ाये तीन व पाँच ।।

जब तक जीवित एक व्यक्ति भी, 
भारत की धरती पर शेष । 
तब तक है अधिकार हमारा 
भारत अपनि, पर सविशेष ॥

मेरा दृढ़ विश्वास यही है,
 हम है पूर्ण स्वतन्त्र समर्थ। 
जीभ खींच लेंगे उनकी हम, 
जो हमको समझें असमर्थ ॥

इस झंडे के नीचे रह जो, 
बोया गया बीज संग्राम।
है वह आज पल्लवित पुष्पित)
करें अगर हम उसका नाम ॥

प्राणों का भी मोह त्याग कर
 हम कर के भीषण संघर्ष ।
प्राण रहें या जायें मगर है,
लक्ष्य एक वैरी अपकर्ष ॥

दृढ़ व्रत हो हम रण क्षेत्र में, 
उतरेंगे यह बना विधान ।
एक-एक वैरी का जब तक, 
मिटा न देंगे नाम निशान ॥

तब तक चैन नहीं जीवन में, 
नहीं शान्ति या सुख स्वीकार ।
भूख-प्यास को भी सह कर के,
 कर देंगे वैरी का संहार।।

बिना प्रतिज्ञा पूर्ण हुए है, 
कहाँ चैन हमको सुख-शान्ति । 
यह संसार भले कुछ सोचे, 
तब तक बंद न होगी क्रान्ति ॥,

नेता जी के शब्द-शब्द में, 
थी अद्भुत आकर्षण शक्ति। 
अतः भारतीयों के उर में, 
जगी विलक्षण श्रद्धा भक्ति ॥

बलि वेदी पर चढ़ जाने को,
 भारतीय सब थे तैयार ।
 इच्छा मात्र एक थी सबमे, 
मातृभूमि का ही उद्घार”

जितने भारतीय थे जग में,
 सब में भर अपूर्व उत्साह । 
उनके रग-रग में उमंग ज्यों, 
वर्षा ऋतु में नदी प्रवाह ।।

क्रान्ति वहि प्रज्ज्वलित कर, भारत प्राण सुभाष।
लक्ष्य प्राप्ति हित चल पड़े, अंग-अंग उल्लास ।।


इति
 षष्ठ सर्ग

सुभाष चन्द्रिका

पंचम सर्ग


भ्रकती तनी श्री चितरंजन की, 
देख कुशासन का अन्याय । 
अतः विरोध-हेतु दृढ़ व्रत ले, 
किया इकट्ठा जन समुदाय ।।

सम्बोधित कर जन समूह को, 
रखा सम्मुख एक विचार ।
कौंसिल में प्रवेश कर करना है 
दुःशासन का संहार ।

नेता जी ने पूर्ण समर्थन किया, 
श्रवण कर यह प्रस्ताव।
पर कांग्रेस संगठन में थे, 
बहुतों के विपरीत सुझाव ।।

गान्धी, नेहरू आदि ने कहा,
नहीं उचित है यह प्रस्ताव। 
जिसके कारण काँग्रेस की, 
हुआ एकता में बिखराव ।।

नरम-गरम दल दो खेमों में 
बँटा कांग्रेसी समुदाय, 
जिससे ऐम्य सूत्र में बंधने ।
का- अब कोई नहीं उपाय ॥

अपनी अपनी सूझ-बूझ से 
दोनो ही दल थे गतिमान । 
जिससे अंग्रेजी शासन में, 
मची खलबली, थे हैरान ॥

दमन- चक्र चल पड़ा कुशासन का, 
उसका हौशला बुलंद । 
आह्वादित थे लीव स्वार्थ रत, 
हिन्द-कलंक मान जय चंद।

जिनके संकेतों पर लुंठक, 
निर्दोषों पर अत्याचार " 
पकड़ मार थे, जेल भेजते, 
मचा देश में हाहाकार ।।

भडक उठी थी क्रान्ति अधिक ही,
सत्ता की भी नींद हराम। 
आठ पहर चौकन्ने रहते, 
कब छिड़ जाय घोर संग्राम ।।

उसी समय नेता जी को भी, 
बरवस भेजा कारागार।
इससे जन-मानस विक्षुब्ध था, 
धधक उठा अन्तस-अंगार ।।

उधर सिंह पिंजड़े में बन्दी, 
तड़प, मरज रहता लाचार ।
स्वास्थ्य दिनों-दिन बिगड़ रहा था।
उठते मन में विविध विचार ॥

मिली सूचना जब सत्ता को, 
रोग ग्रस्त है सबल सुभाष । 
हर्ष-सिन्धु लहराया सम्मुख, 
विजय संपदा ज्यों हो पास ॥

उदासीनता से शासन की, 
कृश तन होता गया नितांत । 
ज्यों चंदन में घुन का धावा, 
शुक्ल पक्ष में हो घन ध्वान्त ॥

कारागृह से नेता जी की -
मुक्ति के लिए बारम्बार 
माँग की गयी तदपि न पिघती, 
निर्मम अंग्रेजी सरकार ।।

विश्वसनीय चिकित्सक द्वारा.
जब शासन ने सुना निदान ।
निन्दा विप्लव के भय से अब, 
बना मुक्ति के लिए विधान ॥

किया मुक्त तन क्षीण, 
केसरी बाहर आया।
मुक्त पवन में श्वास, 
लिया, अनुपम सुख पाया ।।

नव वसन्त को प्राप्त,
 यथा मधुकर हर्षाया !
कृश तन फिर भी दिव्य-
तेज आनन पर छाया ।।

जन्म भूमि के दर्शनार्थ, 
आकुलता छायी।
एक-एक पल का विलम्ब 
था अति दुख दायी ॥

स्वजनों ने कर पूर्ण-
व्यवस्था का बतलायी। 
सुनते ही संदेश, 
हृदय कलिका मुस्क्यायी ॥

मातृ-भूमि के अंक, 
पहुंच शैशव पुख पाये । 
जन परिजन को देख, 
अम्बु अम्बक छलकाये ।।

उमड़ी भीड़ अधार, 
श्रवण कर, नेता आए।
शीघ्र स्वस्थ हो जायें।

रोग-मुक्त हो लक्ष्य, 
प्राप्ति के लिए चढ़ाई।
की, शासन ने सोध,
विपत्ति पुनः मंडरायी ।।

जहाँ कहीं भी क्रांति 
पक्ष के, दिये दिखायी। 
दे शारीरिक दण्ड 
जेल की हवा खिलायी ।।

दमन चक्र को देख, 
कुशासन का दुखदाई।
क्रान्ति- क्रान्ति सामान्य, 
हिन्द-जनता चिल्लायी ।।

सुप्त जवानी ने फिरसे-
अब ली लंगड़ाई
वज प्राणों का मोह, 
समर दीपिका जलाई ।।

नेता जी चुप-चाप, बैठने वाले का थे। 
देश के लिए पूर्ण समर्पित निशि-दिन जब थे। 
अतः हृदय में शूल, आंग्ल संत के अब थे।
क्यों कि प्रभावित उत्तेजक भाषण से सब थे ॥

उत्तेजक व्याख्यान नित्य देने के कारण। 
प्रायः शासन जेल भेजता उन्हें अकारण। 
लक्ष्य प्राप्ति के हेतु, रहा हो जिसका दृढ़ प्रण। 
कारागृह उस व्यक्ति लिए था साधारण ।।

किन्तु रोग की मार, सहायक बन कर आयी। 
जग-निन्दा भयभीत आंग्ल सत्ता धराई। 
जिससे करनी बार-बार धी पड़ी रिहायी। 
शासन था अब खिन्न विपत्ति शीश मंडरायी।।

लगा असत आरोप स्वगृह में ही एकाकी। 
रहने का आदेश, दिया, थी अद्भुत झाँकी। 
घर के चारों ओर सैनिकों का था पहरा 
सन्नाटा थो घोर वायुमण्डल था बहरा ।।

घर के भी जो लोग, चाहते जा कर मिलना । 
था ससक्त प्रतिबन्ध, कहाँ का मिलता जुलना । 
रहने लगे उदास, सोच कर मन में आता। 
कोई नहीं उपाय, मुक्ति का वाम विधाता ॥

माँ दुर्गा का ध्यान, एक दिन किया व्यथित मन । 
मातः दो वरदान, नरक से उबरे जीवन ।
है समाज ही प्राण, मीन का जैसे पानी। 
उससे ही रह दूर, जिये कैसे वह प्राणी ॥

अब तो नहीं उपाय, दीखता मुझे मुक्ति का । 
मात्र सहारा एक, तुम्हारी दिव्य शक्ति का।
करो न अम्बे देर, निकालो इस कारा से। 
जोड़ों माँ अतिशीघ्र, मुझे बढ़ती धारा से ।।

कुछ क्षण के पश्चात, उमड़ कर आँसू धारा। 
चली सिन्धु के पास, मिलन का लिये सहारा। 
मन्दिर हुआ प्रदीष्ट, ज्योति अद्भुत थी छायी। 
शक्ति स्वयं साकार, रूप धारण कर आयी ।।

पुलकित हुए सुभाष, हृदय की कली खिल गयी 
मानो मिला स्वराज्य, विश्व सम्पदा मिल गयी। 
उमड़ पड़ा वात्सल्य, फेर कर हाथ शीश पर 
हुई लुप्त वह मूर्ति, हृदय संतोष मोद भर ॥

हृदय भरा आह्लाद, मुदित मन मोर नाचता 
यथा लक्ष्य प्रत्यक्ष, देश का भाग्य वांचता । 
"एक मास पर्यन्त, साधना लीन रहूँगा। 
सुख-दुख एक समान, निरन्तर समुद्र सहूंगा ।।

और नहीं इस बीच, किसी से कभी मिलूंगा। 
यही प्रतिज्ञा एक, मिलूंगा जब निकलूंगा। 
यह घोषणा अपूर्व, लिखित बाहर टंगवाया। 
खान पान का पूर्ण तरीका भी बतलाया ॥

जब खटकाता मृत्य, द्वार थाली के मर में। 
खुलता तनिक कपाट, अंधेरा रहता घर में। 
खिसका देता शीघ्र, अशन थाली को भीतर।
हो जाता फिर बन्द द्वार नीरव बन्दी घर ॥

धीरे-धीरे एक, मास, की बीती बेला। 
होते आधी रात, उन्होंने नाटक खेला। 
घर का पिछला द्वार, खोल उपवन में आकर। 
देखा चारों ओर, सजग आँखें दौड़ा कर ।।

था दुष्कर दीवार, लांघ कर बाहर जाना। 
और सुरक्षित लक्ष्य, सिद्धि के पथ को पाना।
सहसा आया ध्यान, आम्र-तरू ऊपर चढ़ कर । 
हो सकता हूँ पार, वहाँ से कूद भूमि पर ।।

था अपूर्व उत्साह, लपक कर चढ़े वृक्ष पर। 
उत्तर गये अति शीघ्र, भित्ति पर मुदित कूद कर 
अब न रहा कुछ शेष, छलांग एक थी बाकी। 
नीरवता थी देख, रही अद्भुत यह झाँकी ।।

इधर-उधर अवलोक, कूद भूतल पर आये। 
चले मौलवी राज, मार्ग से वेश बनाये।"
हुई धम्म भावाज, श्रवण कर चिहुँके प्रहरी।
दिखा एक माजार, मिट्टी तब शंका गहरी

मार्ग रहा सुनसान, मौन थीं सभी दिशाएँ। 
सक्रिय केवल एक, पथिक लेकर आशाएँ।
ठमका सम्मुख देख, आ रहे गस्ती बाले ।
रुका निकट आ यान, कहा, ओ कुत्ते काले।।

नई जानता डैम, यहाँ पर आना-जाना । 
शख्त मना है चोर, लूटने चला खजाना।,
या अल्लाह। पठान मुझे डेरे पर जाना। 
अब न कभी इस राह हमारा होगा आना ।।,

"भाग यहाँ से जल्द, नई गलती दुहराना। 
छोड़ रहा हम आज, तुझे फिर कभी न आना), 
कह कर उड़ा द्विचक यान सुभाष मुस्काये। 
झोंक आँख में धूल, लक्ष्य हित परग बढ़ाये ।।।।

अति प्रसन्न थे आज, कुयोग समाप्त हो गया। 
बढ़ने लगे सवेग, लक्ष्य ज्यों प्राप्त हो गया। 
पहुँच गये कुछ दूर, नहीं थी चिंता कोई। 
प्राप्त, हुई ज्यों वस्तु, युगों से जो थी खोई।।

इधर निशि बीती हुआ प्रभात, 
मृत्या आया ले कर जलपान ।
खुला देखा कारा का द्वार 
चकित चिल्लाया हो हैरान ।।

दौड़कर एक सिपाही मौन, 
आ गया कारागृह के पास। 
धड़कते हृदय चकित चहुँ ओर, 
देख बोला हो अधिक उदास "

निकल कर कारा से चुप चाप। 
न जाने कहाँ भग गया चोर। 
निरीक्षण कक्ष वाटिका आदि 
का किया, गया कहाँ किस ओर

प्रहरियों की आखों में धूल, 
झोंक कर निकल गया दुर्दान्त । 
कहाँ जायेगा छिप कर नीच।
नहीं हम बैठेंगे रह शान्त /

फोन कर चारों ओर प्रचार।
जेल से निकल गया चुप-चाप ।
भगा अज्ञात दिशा की ओर ।
बढ़ा शासन के उर संताप ।।

नहीं जाने पाये वह चोर, 
झोक सब थी आँखों में धूल । 
निकल भागा मायावी नीच, 
पकड़ लें करें न इसमें भूल ॥

इधर चौकन्ना भारत वीर, 
लगा बढ़ने ज्यों झंझावात । 
रेल, बस बग्घी पैदल धीर, 
रहा चलता सलक्ष्य दिन-रात ॥

पहुंच पेशावर सीमा पार किया, 
पहुँचा काबुल सोल्लस ।
प्राप्त कर भगत राम का प्यार।
बढ़ी मन आशा अधिक हुलाए।

उत्तम चन्द्र भगत का पाकर, 
नेता जी हार्दिक सहयोग /
थे प्रसन्न ज्यों सिद्ध हुआ हो,
 महा तपस्वी का तप योग ।।

जर्मन इटली के शास्ताओं- 
से मिल कर स्व लक्ष्य की ओर।
बढ़ने लगे सिद्धि ज्यों सन्मुख, 
मिटी निराशा बाधा घोर ।।

किये बिना विश्राम, निशिदिन चिन्तन-मग्न रह। 
आगे का संग्राम, निर्णायक हो फिर तरह ॥

इति 
पंचम सर्ग।

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