नवम सर्ग अहो अद्भुत यह माया लोक, दिखायी देता है अभिराम । इसी में जन्म-मरण का चक्र, चल रहा निशि-वासर अविराम ॥ सृष्टि में मात्र मनुज गतिमान, किन्तु शिशु सा प्रायः नादान । किया करता त्रुटियों दिन-रात, और खो देता निज सम्मान ।। यही लगता कुछ ऐसे लोग, जिन्हे भौतिक सुख से वैराग। मनुज वे नहीं अपितु है देव, स्ववैभव का भी करते त्याग ॥ उन्हीं देवी पुरुषों में एक, मधुर व्यवहार यशस्वी वीर। बाह्य तन वज्र हृदय नवनीत, मुदित मुद्रा प्रायः गम्भीर लिया जिसने विपत्ति को मोल, छेड़ कर अंग्रेजों से जंग। हो रहे जन्म भूमि उनमुक्त, मिटा दे वैरी के सब रंग ।। कौन वह मानवता की मूर्ति, मनोयोगों का जो सम्राट। शत्रुओं था जो का काल कराल । जगत से न्यारी जिसकी बार ॥ वही है नेता वीर सुभाष, हिन्द-पतझर का जो मधुमास । तपन में शीतल मन्द फुहार, तुमुल तम में जो दिव्य प्रकाश ॥ शीत लहरी में भानु समान । धरित्री घर फैला कर-पाश। हरण कर लेता ठिठुरन शीघ्र, अहो अनुपम यह दिव्य प्रकाश ॥ जहाँ पर दिखता दुख अवसाद,...
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