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सुभाष चन्द्रिका

नवम सर्ग अहो अद्भुत यह माया लोक,  दिखायी देता है अभिराम ।  इसी में जन्म-मरण का चक्र,  चल रहा निशि-वासर अविराम ॥ सृष्टि में मात्र मनुज गतिमान,  किन्तु शिशु सा प्रायः नादान । किया करता त्रुटियों दिन-रात,  और खो देता निज सम्मान ।। यही लगता कुछ ऐसे लोग,  जिन्हे भौतिक सुख से वैराग। मनुज वे नहीं अपितु है देव,  स्ववैभव का भी करते त्याग ॥ उन्हीं देवी पुरुषों में एक, मधुर व्यवहार यशस्वी वीर।  बाह्य तन वज्र हृदय नवनीत,  मुदित मुद्रा प्रायः गम्भीर लिया जिसने विपत्ति को मोल,  छेड़ कर अंग्रेजों से जंग।  हो रहे जन्म भूमि उनमुक्त,  मिटा दे वैरी के सब रंग ।। कौन वह मानवता की मूर्ति,  मनोयोगों का जो सम्राट।  शत्रुओं था जो का काल कराल ।  जगत से न्यारी जिसकी बार ॥ वही है नेता वीर सुभाष,  हिन्द-पतझर का जो मधुमास ।  तपन में शीतल मन्द फुहार,  तुमुल तम में जो दिव्य प्रकाश ॥ शीत लहरी में भानु समान ।  धरित्री घर फैला कर-पाश।  हरण कर लेता ठिठुरन शीघ्र,  अहो अनुपम यह दिव्य प्रकाश ॥ जहाँ पर दिखता दुख अवसाद,...

सुभाष चन्द्रिका

अष्टम सर्ग कुछ रात शेष थी, कुक्कुट ने दी प्रात सूचना  जगे चराचर कर्म निरत कर ईश अर्चना ।  नभचर उड़े समोद, गगन में पर फैलाये।  करते कलरव इतस्ततः मधुरस बरसाये ॥ प्राची में अरुणाम छटा थी अति सुखदाई।  देख दृश्य यह सचर-अचर में स्फूति समाधी।  सब में था उत्साह मुदित थी सकल दिशाएँ।  वातावरण सजीव सजग सब ने सुख पाये ॥ शीतल मन्द सुगन्ध वायु बहती मनभायी।  कण-कण में थी, स्नेहमयी सुषमा सरसायी। " धीरे-धीरे जब दिनकर कुछ ऊपर आये।  उदयाचल के साथ सभी थल विभा विछाये ॥ मह- मह महकी पुष्प वाटिका सुरभि लुटाती । मनन-मनन जिसके भीतर भ्रमावलि गाती  रंग-बिरंगी विविध तितालियाँ नर्तन करतीं। हाव-भाव रस-रंग रूप मानस में भरतीं ।॥ खिले जलज बहु रंग जीव सब थे प्रसन्न मन ।  करता कलरव गान विहरता मुदित विहग गन।  बिखरे मधुर सुवास, वायु मण्डल का कण-कण ।  था सुषमा संयुक्त सभी के थे पुलकित मन ॥ देख मोहक रूप प्रातः काल का।  दीप्त था मृदु रूप नेता भाल का।  देखते कुछ क्षण रहे मन में मगन । हटा फिर तो घ्यान, कह कर हा वतन मधुमय दृश्य विलोक प्रात का,  श्री सुभाष ...

सुभाष चन्द्रिका

षष्ट सर्ग बीती रजनी तमन्चुर बोले,  स्वप्न लोक से लौटे लोग। हेम कलश ले उषा चल पड़ी, वितरित करने, शुभ-सुख भोग। सजी वाटिका रंग-विरंगी,  अति कुल का करती आव्हान । मधु बरसातीः सुरभि लुटाती,  करने हेतु जीव कल्याण ॥ खग- मृग जग कर विनती करते,  हे परमेश्वर! जग के नाथ। मानव-कुल से रक्षा करिये,  बढ़ा दया का अपना हाथ ॥ शीतल, मंद, सुगन्ध वायु बह,  नव स्फूर्ति भरती अविरल । जगे चराचर निद्रा त्यागे,  देख प्रकृति का रूप विमल ।। कर्म क्षेत्र में उतर पड़े अब,  सब में बढ्ने का उत्साह । अपनी-अपनी राहों पर चल,  वेग रहा ज्यों सरित-प्रवाह ॥  एक पुरुष ने चिन्तन रत रह,  जाग बितायी सारी रात । ओर समझ कर बिस्तर छोड़ा,  बीती रात हो गया प्रात ॥  बना योजना हर हिटलर से, मिलने की फिर से तत्काल । जिससे भाग हिन्द देश से,  सारे श्वेत भूत बैताल ॥ मिले सुभाष चन्द्र हिटलर से,  उसने ललक मिलाया हाथ। भूरि प्रशंसा कर के बोला,  "हम हैं वीर तुम्हारे साथ ।।  पर ही एक बात से चिंतित,  जिससे हूँ अत्यधिक अधीर । वैरी के बन मित्र लड़ रहे,  हमसे भ...

सुभाष चन्द्रिका

पंचम सर्ग भ्रकती तनी श्री चितरंजन की,  देख कुशासन का अन्याय ।  अतः विरोध-हेतु दृढ़ व्रत ले,  किया इकट्ठा जन समुदाय ।। सम्बोधित कर जन समूह को,  रखा सम्मुख एक विचार । कौंसिल में प्रवेश कर करना है  दुःशासन का संहार । नेता जी ने पूर्ण समर्थन किया,  श्रवण कर यह प्रस्ताव। पर कांग्रेस संगठन में थे,  बहुतों के विपरीत सुझाव ।। गान्धी, नेहरू आदि ने कहा, नहीं उचित है यह प्रस्ताव।  जिसके कारण काँग्रेस की,  हुआ एकता में बिखराव ।। नरम-गरम दल दो खेमों में  बँटा कांग्रेसी समुदाय,  जिससे ऐम्य सूत्र में बंधने । का- अब कोई नहीं उपाय ॥ अपनी अपनी सूझ-बूझ से  दोनो ही दल थे गतिमान ।  जिससे अंग्रेजी शासन में,  मची खलबली, थे हैरान ॥ दमन- चक्र चल पड़ा कुशासन का,  उसका हौशला बुलंद ।  आह्वादित थे लीव स्वार्थ रत,  हिन्द-कलंक मान जय चंद। जिनके संकेतों पर लुंठक,  निर्दोषों पर अत्याचार "  पकड़ मार थे, जेल भेजते,  मचा देश में हाहाकार ।। भडक उठी थी क्रान्ति अधिक ही, सत्ता की भी नींद हराम।  आठ पहर चौकन्ने रहते,  ...