सुभाष चन्द्रिका

द्वितीय सर्ग

एक दिवस अध्ययन काल में,
धधक उठी अन्तस की ज्वाला।
जब अंग्रेजी प्राध्यापक ने,
प्रस्तुत किया-वाक् विष प्याला ।।

सुन अपशब्द विदेशी-मुख से,
भारत माता के प्रति बोला।
हिन्द केसरी मौन त्याग कर,
उत्तेजित हो निज मुँह खोला ।।

"रे निर्लज्ज ! जलाशय में रह,
क्यों विद्रोह मगर से करता?
भूल गया वे दिन जब आया,
भीख मांगने पैरों पड़ता ।।

"चुप नादान गुलाम देश के,
बड़ी बात छोटे मुँह करते।।
हो कर के भी दास मूर्ख तुम,
क्यों उतनी शेखी बघारते ।।

“यदि जाने अनजाने कुत्ते,
घुस जाते है घर के भीतर।
तो दुर-दुर कर हम निकालते,
उनको बाहर पीट-पीट कर ।।

चोरी कर सीना जोरी भी,
रे ओटम! तू क्यों है करता।
नाक रगड़ चिल्लू भर पानी-
में पर-धन से जीवन भरता ।।


समय-समय पर यदि हमको,
आता नागों को दूध पिलाना।
तो कुचाल अवलोक जानते,
वदन कुचल परलोक पठाना ।।

एक शब्द भी इसके आगे,
यदि कोई भी अब जो निकला।
जीभ खींच बाहर कर दूंगा,
फल इसका मैं दूंगा दिखला ।।

तुम्हें पता क्या नहीं? दास हो,
क्या कर्तव्य दास का होता?
धृष्ट गुलाम हाथ स्वामी के,
हाथ स्व प्राणों से है धोता ।।

ओटन साहब! क्षमा कीजिए,
भूल हो गयी मुझसे भारी।
मैने पहले समझ लिया था,
जिसका घर वह ही अधिकारी ।।

किंतु समझ में अब आया यह,
घर के स्वामी दास कहाते।
चोर-दस्यु मालिक हो कर के,
पर-वैभव से रंग जमाते ।।

शब्द निकलना नहीं चाहिए-
था,मेरे मुख से कोई भी! 
फसल काटनी नहीं चाहिए,
अपने हाथों से बोयी भी ।।

शब्दों के बदले करना था,
जो कुछ भी मुझको करना है।
लगता है तुझको विदेश में,
मेरे हाथों ही मरना है ।।

निकल, नीच कमरे से बाहर,
तू गुरु के अनुरूप नहीं है।
कितना भी गहरा हो लेकिन,
प्यास बुझे तो कूप वही है ।।

कहते हुए सुभाष उछल कर,
पहुॅच गये ओटन के पास।
कई तमाचा जड़ कपोल पर,
कहा, और फिर कह लो दास ।।

मची खलबली कक्षा गूंजी,
गूंज उठा विद्यालय सारा।
लगे पूछने एक अन्य से,
“किसने किसको थप्पड़ मारा ।।

इस अपूर्व घटना के कारण,
विद्यालय से दो वर्षों का।
निष्कासन कर के सुभाष का,
बीज बो दिया संघर्षों का ।।

निष्कासन से और बढ़ गयी,
उत्तेजना, लिया कर निश्चय।
अब अरि-दमन हेतु सोचूंगा,
दो वर्षों का बहुत है समय।।

समाचार सुन बहुत खिन्न थे,
पिता जानकी नाथ उदास।
काटो तो ज्यों खून नहीं था,
अब शरीर से, हुए हताश ।।

लगे सोचने मान-प्रतिष्ठा,
जो अब तक थी प्राप्त हो गयी। 
इस मतिमन्द पुत्र के कारण,
अपने आप समाप्त हो गयी ।।

इसी समय आते सुभाष अब,
विद्यालय से दिये दिखायी।
खिन्न पिता जानकी नाथ के,
वाक्-वाण की हुई चढ़ायी ।।

पूछा, "तू क्यों अभी आ गया ?
क्या विद्यालय बन्द हो गया?
अथवा मनमानी करने को,
मूढ़ पूर्ण स्वच्छन्द हो गया?

स्वाभाविक वाणी में बोले,
"विद्यालय तो बंद हो गया।
पर न अन्य कोई कारण था,
कारण यह मतिमंद हो गया //

प्राध्यापक ओटंग महोदय
कहते कुत्ते भारत वासी ।
मात्र पेट भरने के खातिर
दौड़ लगाते घोर उदासी ।

सहनशीलता विकल हो उठी,
फिर तो कुछ भी नहीं विचारा।
और उछल गालों पर उनके,
मैंने जम कर थप्पड़ मारा 
दो वर्षों का निष्कासन होगया,
अतः आते शीघ्र आ गया।
इससे कष्ट नहीं कुछ भी है,
मुंह मांगा वरदान पा गया ।।

"जिसकी बुद्धि भ्रष्ट होती है।
उसको तम प्रकाश लगता है।
परसी थाली त्याग अभागा ।
एक ग्रास के हित भगता है।।

चलो, ठीक है वही करो अब,
जो कुछ भी तुमको करना है।
उसकी चिन्ता छोड़ो जिसको -
जीवन भर घुट-घुट मरना है।,,

चिन्तन करते समय-समय पर,
नेताओं से भी मिलते थे।
बातें सुन अपने मन की वे,
प्रात-कमल जैसे खिलेते थे ।।

मुक्ति के लिए भारत माँ की-
बना अनेक योजनाओं को।
दो वर्षों का समय बिताया,
पद-तल दलित यातनाओं को ।

समय बीतने पर सुभाष अब,
स्काटिस विद्यालय में जा कर।
ले प्रवेश फिर दत्त-चित्त हो ।
शिक्षा पाने में थे तत्पर ।। 

किन्तु अध्ययन से उचटा जब,
मन विश्राम चाहने लगता।
भूत भगाने हेतु देश से,
विविध भाँति चिन्तन में पगता ।।

देश-भक्त अपने मित्रों से,
देश-मुक्ति हित वार्ता करते ।
युद्ध छेड़ने हेतु शत्रु से,
नव उत्साह हृदय में भरते ।।

किन्तु विचार परस्पर करते,
प्रथम लक्ष्य है शिक्षा पाना।
तत्पश्चात हमें मिल कर है;
अँग्रेजो को मार भगाना ।।

घोर परिश्रम निष्ठा पूर्वक,
ले उपाधि बी. ए. आनर्स ।
श्रेणी प्रथम प्राप्त भारत के,
लिए किया प्रस्तुत आदर्श ॥

गद्‌गद् हृदय पिता ने सोचा,
होगी इच्छा पूर्ण हमारी।
अब इसमें संदेह नहीं है,
होगा सुवन उच्च अधिकारी ॥

आई. सी. एस. की तैयारी "
हेतु, विलायत इसे पठाएँ।
जिससे त्याग चपलता सारी।
सही राह पर यह आ जाये ॥

अतः बुला कर सुत सुभाष को,
"कहा विदेश तुम्हें जाना है।
आई० सी० एस० की उपाधि ले,
कुल का सम्मान बढ़ाना है।।

क्षुब्धः हृदय बोले सुभाष फिर,
"शिरोधार्य आदेश आप का।
किंतु घड़ा कैसे फूटेगा ?
आंग्ल सुरक्षित घड़ा पाप का ।।

देश गुलाम भले है लेकिन,
मुझे नहीं स्वीकार गुलामी ।
आई० सी० एस० हो कर भी मैं,
दास और वे मेरे स्वामी ।

रह करके परतंत्र स्वर्ग-सुख,
भी मुझको स्वीकार नहीं है।
पर नित रहूँ स्वतंत्र, नरक दुख,
भी मेरा सुख-सार यही है।

पुनः निराशा व्याप्त हो गयी,
कहा पिता ने, “ठीक कह रहे।
खट्टे हैं अंगूर डाल के,
इसी लिए तुम नहीं खा रहे ।

“नहीं पिता जी! क्षमा कीजिए,
अति मीठे अंगूर डाल के ।
तोडूॅगा निश्चित पर चखना,
है समान विष अति कराल के ।।

करें व्यवस्था लंदन जा कर,
लक्ष्य वेध कर मैं आऊँगा ।
किन्तु नहीं स्वीकार दासता,
उसको निश्चित ठुकराऊँगा ।।

“आठ दिनों के भीतर ही हो-
जायेगी सम्पूर्ण व्यवस्था। 
जिससे हो भविष्य गौरव मय,
नहीं दिखाना कभी अनास्था ।।

अन्य खुराफातें निकाल कर,
मन से जीवन, के विकास में।
दत्त-चित हो लग जाओ सुत,
मत प्रमाद करना प्रयास में ।।

हुई व्यवस्था शुभ मुहूर्त में,
लंदन जाने की सुधि खोयी ।
छलके नयन पिता के हर्षित,
ममता बिलख-बिलख कर रोयी ।।

लंदन पहुॅच गये कैम्ब्रिज के,
उसी कक्ष में किया प्रवेश ।
जिसमें सहपाठी दिलीप थे,
मग्न अध्ययन में सविशेष ।।

सहसा देख सुभाष चन्द्र को,
विस्मित से दिलीप ने उठ कर।
पुलकित स्वागत किया मित्र का,
गले लगाया नयन नीर भर ।।

प्रिय! मेरा उत्साह बढ़ गया,
दूर देश में तुमको पा कर ।
एकाकी जीवन के दुख को,
दूर कर दिया तुमने आ कर ।।

रह न सका अश्चार्य, मौन जब,
अतः राय ने निज मुॅह खोला।
“मेरा मित्र हो गया कैसे?
मलयज-पग रहा जो शोला ।।

जब मैं कहता था भविष्य में,
हम दोनों ही लंदन जा कर।
उच्च उपाधि प्राप्त कर लौटेंगे,
भारत का सिर ऊँचा कर ।।

तुम उत्तेजित हो कहते थे,
“मुझे न शत्रु-देश में जाना।
रह स्वाधीन नमक रोटी खा,
जीवन में सब कुछ है पाना ।।

किन्तु देख लंदन में तुमको,
मैं अतिशय आश्चर्य चकित हूँ। 
कारण कुछ भी समझ न पाया,
जिसके कारण सोच थकित हूँ ।।

प्रिय वर! कारण और न कुछ भी,
आज्ञा मान पिता-माता की ।
पालन करने मैं आया हूँ,
आगे इच्छा जग माता की ।।

बोले राय दिलीप यही क्या?
मान चलूँ बचपन बोला था?
बाल सुलभ भावों का गट्ठर,
यों उसने जब तब खोला था ।।

अच्छा हुआ सखे सुख-वैभव,
जीवन का शुभ अंग हो गया ।
और दुखों का मूल भयानक,
असम्भाव्य व्रत भंग हो गया ।।

“नहीं असम्भव व्रत है मेरा,
और नहीं वह भंग हो गया ।
अपितु विलायत आ जाने से,
ज्योतिष्मान पतंग हो गया ।।

शत्रु-निकट होने से होता,
उसकी रीति-नीति का ज्ञान ।
ज्यों कुछ दिन रह निकट हमारे,
हुए विदेशी महिमावान ।।

करो प्रतिक्षा उस दिन की जब,
आई०सी०एस० हो जाऊँगा ।
देखो फिर, मैं क्या करता हूँ,
अवसर पा कर बतलाऊंगा ।।

अब भी नहीं समझ में आया,
हे रहस्य नर! स्पष्ट बताओ ।
जो कहते हो तुम्हीं समझते,
अन्धकर में मत भरमाओ ।।

साथी! व्यर्थ भ्रमित हो इतने,
मेरी साधारण बातों पर ।
अपना लक्ष्य बहुत पहले ही,
बता चुका हूं एक-एक कर ।।

बता रहा फिर सुनो ध्यान से,
जन्म हुआ भूतल पर मेरा ।
नीच गुलामी मिटा देश की ,
दूर भगाने हेतु अँधेरा ।।

घोर विरोधी पराधीनता-
का स्वभाव बचपन से जिसका।
भला दासता में फँस जाना,
होगा सम्भव कैसे उसका ।।

मित्र! प्राप्त कर लेने पर भी,
आई०सी०एस० की उपाधि को|
नहीं मोल ले सकता है मैं,
नीच दासता यहाँ व्याधि को ।।

शपथ ग्रहण कैसे कर सकता?
बैरी की आज्ञा का भार।
पर-इंगित पर उत्पीड़न,
स्वजनों का नहीं मुझे स्वीकार ।।

त्याग-पत्र देकर जाऊँगा,
मातृभूमि की सेवा करने।
भारत माता को स्वतंत्र कर,
उत्पीडन स्वजनों का हरने ।।

करके वार्तालाप परस्पर,
दोनों साथी अति प्रसन्न मन।
दत्त-चित हो व्यस्त हो गये,
करने में गंभीर अध्ययन ।।

हुई तपस्या पूर्ण परीक्षा-में,
सुभाष से प्राप्त कर लिया।
श्रेणी प्रथम चतुर्थ स्थान से,
यशः कौमुदी व्याप्त कर दिया ।।

जब यह शुभ-संदेश पिता को-
मिला मुदित फूले न समायें।
बार-बार दुर्गा माता के,
चरणों में निज शीश झुकाये ।।

माँ तेरे आशीर्वाद ने,
रख ली मेरे मुख की लाली ।
आज नहीं कोई भी मातः!
दिखता मुझ सा गौरवशाली ।।

दिया सुनायी माँ ज्यों कहती,
“रे स्वार्थान्ध! मनुज अति कातर ।
आज्ञा पाल पुत्र अब तेरा,
कार्य करेेगा अपना सत्वर ।।

स्रष्टा ने जो कार्य भार दे,
भेजा है उसको धरती पर ।
उसे पूर्ण करने को है अब,
अति आतुर उसका अभ्यन्तर ।।

अतः उसे आशीर्वाद दे,
प्रेरित कर, सब स्वार्थ त्याग कर ।
जिससे युग-युग अमर हो रहे,
कीर्ति-पताका फहरे भू पर ।।

भौचक्के से पिता जानकी-
नाथ, मौन कुछ समझ न पाये।
सोचा, होन हार होगा ही,
कितना कोई टांग अड़ाये ॥

अब लंदन चल कर हम देखे,
कब घटती है? घटना कैसी?
जो कुछ भी होना होता है,
रहती विधि की रचना वैसी ।

शपथ के लिए हुए उपस्थित,
प्राप्त सफलता सब अधिकारी।
शपथ ले रहे एक-एक कर,
अब आयी सुभाष की बारी ॥

त्याग-पत्र दे कहा गर्व से,
"शर्त मुझे स्वीकार नहीं है।
यदि स्वतंत्र भूतल पर आया,
तो जीवन आधार वही है।।

त्याग-पत्र को देख अचम्भित,
सारे लोग अवाक रह गये।
एक दूसरे का मुँह तकते,
स्वप्र लोक में सभी खो गये ।।

जब भारत वासी पाये यह,
समाचार चौकानें वाला।
कुछ के हृदय हर्ष आपूरित;
कुछ ने पिया जहर का प्याला ॥

समाचार जब मिला पिता को, 
त्याग-पत्र का हुए हताश ।
बिजली मार गयी ज्यों तन में,
सद्यः नहीं हुआ विश्वास ॥

जब विश्वास हुआ व्याकुल हो,
गिरे धरा पर हुए निराश ।
"हाय! प्रभो! यह क्या कर डाला।
लगता है अब निकट विनाश ।

तार भेज फिर पूछा सुत से,
"क्यों ऐसा अनर्थ कर डाला।
जिसके लिए लोग मरते है,
पा कर उसे नष्ट कर डाला ।।

उत्तर दिया सुभाष चन्द्र ने,
" पितृ देव आज्ञा का पालन ।
करके विवश मानने को हूँ।
आत्मा का प्रदत्त अनुशासन ॥

बचपन से ही स्वतंत्रता का,
जागा भाव प्रवकतम जिसमें ।
दास बनाने वालों के प्रति,
कैसे निष्ठा होगी उसमें ।॥

त्याग घिनौने पथ को फिर से,
स्वच्छ मार्ग पर मैं आया हूँ।
नरक-द्वार तक पहुँच भाग्य से,
लौट स्वर्ग सुख को पाया हूँ

तत्पश्चात स्वभ्राता द्वारा,
प्रेषित-पत्र सुभाष को मिला।
उपालम्भ झंझामय था पर,
व्रत-गिरि फिर भी नहीं हिला ।।

शरच्चन्द्र ने लिखा पत्र में,
यह, तूने विष बीज बो दिया।
जिससे हार्दिक कलेश पिता को,
माँ ममता ने धैर्य खो दिया ॥

तूने जैसा कर डाला है, 
वैसा करना नहीं चाहिए।
माता-पिता कहें जो कुछ भी,
तुझको करना वही चाहिए ॥

पर तूने अपनी करनी से,
जन-परिजन को खिन्न कर दिया।
और सुविकसित फुलवारी को,
निज कर से उच्छिन्नन कर दिया ॥

था सुभाष का, भाई को भी,
अपना वहीं एक ही उत्तर ।
आत्मा का आदेश मानना,
हम सब का कर्तव्य निरंतर ।।

क्यों कि सृष्टि संचालन होता,
उसी शक्ति के संकेतों पर। 
और धरा के साथ नहीं कुछ, 
केवल उसकी माया दुस्तर ।।

अतः किया जो कुछ भी मैने,
उसकी ही आज्ञा का पालन।
याद दिलाती रहती जो ज्यों,
मेरे कर्तव्यों को हर क्षण ॥

मनुज, मनुज का दास हो रहे,
कितनी लज्जा की ये बातें।
नीच समझ मानव, मानव पर, 
करता नित्य श्येन सी घातें ॥

एक बद्ध पशु क्षुधा मिटाने-
हित,स्वामी की वाट निहारे।
स्वाभी हो मद-मत्त नाग सा,
ऐंठा फन फैला फुफकारे ॥

यह दुर्दशा मनुज की निशि-दिन,
स्वयं मनुष्यों के ही द्वारा। 
मैं तैयार नहीं सहने को,
अतः त्याग का लिया सहारा ।।

अब मैं पूर्ण स्वतंत्र हो गया,
लेकिन जब तक देश न होगा।
तब तक चैन नहीं है जब तक,
पूरा लक्ष्य विशेष न होगा ।।

नहीं हृदय में हर्ष,
विषाद नहीं कोई है।
पानी है वह वस्तु.
युगों से जो है खोयी ।।

चिन्ता है बस एक,
सुहाती जिन्हें दासता ।
कैसे जगे विवेक,
बात कुछ समझ न आती।


                      इति द्वितीय सर्ग

सुभाष चन्द्रिका (महाकाव्य)

सुभाष चंद्रिका
           प्रथम सर्ग 

शर्वरी थी अति भयानी,
व्योग ज्यो॔ अंजन बरसता।
 छा गयी निस्तब्धता थी,
लुप्त भूतल की सरसता”

घोर सन्नाटा चतुर्दिक,
सनसनाता तिमिर तक्षक।
विष भयंकर वमन करता-
बढ़ रहा ज्यों रात्रि-रक्षक “

तमस का साम्राज्य मानो,
हर दिशा थी मुँह छुपाये।
 कर पसारे भी न सूझे,
 कौन किसको पथ दिखाये।।

छिप रहे तारे व्यथित उर,
तिमिर घन आतंक से डर।
कौमुदी अपनी समेटे,
छिप गया निर्मल निशाकर "

कभी रह-रह स्यार उल्लू
के भयंकर शब्द होते।
सुन सजग मानव भयातुर,
विवश साहस धैर्य खोते ॥

कभी झींगुर झिल्लियों के,
परुष स्वर देते सुनायी।
साथ ही रीवें इन्हीं के,
ध्वान्त को देते बधाई ।।
निशिचरों का बोल-बाला,
मनुज-कुल आँसू बहाता ।
स्वप्र के संसार में भी,
तिमिर सागर में नहाता ॥

सिद्धि-दात्री! सिद्धि दो माँ !
मैं अकिञ्चन शरण आया।
परम पावन चरण-रज दो,
और अपनी मृदुल छाया"

चाहता मति मन्द मैं-
सामर्थ्य से भी अधिक पाना।
ज्यों उडुप से मूढ़ चाहे,
सिन्धु के उस पार जाना ॥

किन्तु मातः ! वर तुम्हारा,
डूबते का हो सहारा।
पार कर सकता सहज ही,
सिन्धु तो क्या गगन सारा "

ध्यान दो इस मूढ़ मति पर,
माॅ तुम्हारा ही सहारा।
अब उपेक्षा त्याग मातः।
शरण आया सुत तुम्हारा ।।

यदि नही मां ध्यान दो गी,
हठ करे गा सुत तुम्हारा-
और ले कर ही रहे गा,
शुचि चरण का मृदु सहारा”

आह भरती माँ धरित्री,
करवटें रह-रह बदलती।
समय दुर्दिन का बिताती,
खिन्न व्याकुल ग्लानि-गलती ॥

दीप्ति से खद्योत उल्का, 
तिमिर क्षण भर के लिए हर।
हृदय में संचार आशा -
का किया करते समय पर ॥

एक दिन भारत जननि ने,
क्षुब्ध हो मन में विचारा।
विवश संतानें हमारी,
व्यर्थ अब इनका सहारा ॥

अब करुं आह्वान विधि का।
दुःख से उद्धार कर दें।
भेज कोई शक्ति अपनी,
शक्ति का भण्डार भर दें।

किया आवाहन व्यथित उर,
प्राप्त कर संकेत मधुमय।
 हो गयी संलग्न अपने-
यत्न में उत्साह अतिशय।।

वीर प्रसवा वंग भू की,
सुप्त माॅ ने स्वप्न देखा
निविड़ तम को भेदती ज्यों,
आ रही हो चंद्र लेखा”

दृश्य बदला धेनु रूपा,
प्रकट भारत माॅ  खड़ी थी।
दान करने हेतु मानो
क्षीर का, सम्मुख अड़ी थी।

“लो शुभे! यह सुधा अपने-
भव्य का अमरत्व पोषण
और वत्से! अब करो उस-
कल्प तरु का बीज रोपण

जगी जननी ने चकित
सोचा आहा! यह स्वप कैसा। 
अभी तक तो कभी मैने- 
नहीं देखा दृश्य ऐसा”

कौन थी ममतामयी वह,
नींद से जिसने जागया।
 दीखती दुखिया, तदपि माॅ;
 दे गयी उपहार माया।।

हो ना हो भारत जननि ही,
धेनू का धर रूप आयी।
दे गयी संदेश मधुमय,
दासता की ज्यों बिदाई ।।

काल का था चक्र चलता
साथ ही गौरांग शासन’
पिस रहे दो पाट भीतर,
क्षुब्ध हिन्दुस्तान के जन।

घोर अत्याचार चारों-
ओर हाहाकर भीषण।
राह की पहचान खोयी,
तोष पर साकार क्षण-क्षण”

विहग-पशु के साथ जैसा,
मनुज का सहकार होता ।
ऑग्ल शासक का हमारे
साथ वह व्यवहार होता।।

पी रहे गोवत्स को ज्यों,
खींच मानव बाॅध देता।
छीन दुग्धाहार उसका,
स्वार्थ अपना साध लेता।।

विवश ललचाये दृगों से,
देखता लाचार रहता।
बोलना अपराध भीषण,
अतः मुॅह से कुछ न कहता।।

ठीक वैसे ही लुटेरे ,
जो बने शासक यहाॅ पर।
बन्धनों में डाल हमको,
लूटते वैभव निरन्तर”

देखते खींचती हुई यों,
थालियों को सामने से।
जल भरे दृग विवश रहते
मूक द्रष्टा हम बने से”

खौलता था रक्त फिर भी,
दासता की मार भारी।
मौन करती बोल चुप-चुप,
क्रूरता की रीती न्यारी।।

आंग्ल शासन घन घटा में,
दम्भ चपला चमचामती।
क्रूर वज्राघात से थी,
हिन्द में ऊधम मचाती।।

उत्पात झंझानिल मचल,
था रात-दिन झक झोरता
यों हिन्द की महिमामयी,
हर वस्तु तोड़ मरोड़ता।।

अन्याय शोषण का नया,
नित जाल बुनते निर्दयी।
जिसमें फॅसाते अस्मिता,
इस देश की महिमामयी।।

बोल सकते थे नहीं दो-
शब्द भी भारत निवासी।
देश में छायी हुई थी,
व्यथा निष्क्रियता उदासी।।

भावनाएं प्रकट करता,
भी, महा अपराध जैसा।
दण्ड सहते सोचते निज,
गृह प्रवेश निषेध कैसा।।

मीत भारत के लिए था,
नहीं कोई शरण दाता।
स्वयं में थी शाक्ति लेकिन,
विमुख था इस क्षण विधता।।

राष्टा के कुछ भक्त ऐसे,
जो हृदय से स्वाभिमानी।
वीर मंगल और नाना,
आदि लक्ष्मी महारानी”

शक्तियों ने कूद रण में, 
देश का अनमोल पानी।
बच सके, इस हेतु कर दी,
मिट अमर अपनी कहानी।।

चल इन्हीं के चरण चिन्हों-
पर, सहस्त्रों हिन्द वासी।
श्वेत पशुओं से भयंकर,
युद्ध कर पा गये फाॅसी।।

हो रहा संग्राम रह रह,
विवश भारत माॅ विलखती।
देख अपनी ही पराजय,
देश द्रोही भी वीहंसती।।

‘आ गया वह समय मधुमय,
देश का सौभाग्य जागा।
स्वप्न कटु जो दीखता था,
सो गया ज्यों चुप अभागा।।

एक दिव्यालोक चल कर 
स्वर्ग से भूलोक आया।
पूर्व का कण-कण प्रफुल्लित,
ज्यों पलटने लगी काया।।

लगे होने शुभ शकुन, हर-
व्यक्ति में उत्साह छाया।
गया दुर्दिन का समय अब
ज्यों मधुर मधुमास आया।।

सन अठारह सौतथा-
सत्तानबे की जनवरी थी।
और तिथि तेइस की
मंगलमयी अद्भुत घडी थी।

आ गया विश्वेश मानो,
भूमि पर साकार हो कर।
जहाॅ भारत माॅ बिलखती,
अस्मिता सम्पूर्ण खो कर”

रूप धारण कर मनुज का,
ज्यों कभी था ईश आया।
और उद्धत राक्षसो का,
कर दिया जड़ से सफाया”

रात बीती प्रात मधुमय,
दिशा प्राची जगमगायी।
माॅ प्रभा की कुक्षि से,
बाहर अलौकिक ज्योति आयी”

लगे मंगल गीत होने,
विविध विधि बजती बधाई।
छा गया आह्वाद दिशि-दिशि,
मुदित भारत भू सुहायी।।

कहीं गायन और वादन,
मुदित करते लोग नर्तन।
किसलयांकित वीटप वीरुध,
बिना ऋतु उत्फुल्ल उपवन।।

अंगनाएँ मधुर स्वर में,
मुदित सोहर राग गातीं।
ज्यों कटे बन्धन सभी निज
तन्त्र में उत्सव मानतीं”

लक्षणों को देख कर के,
और सुषमामयी काया।
नाम सौम्य सुभाष रखकर,
माॅ-जनक की स्नेह छाया।।

प्रखर प्रतिभा देख शिशु की,
की गयी शिक्षा व्यवस्था।
ज्ञान सदा ग्रहण करता,
रही यद्यपि कम व्यवस्था।।

सुना बाल सुभाष ने जब,
देश है परतंत्र भारत।
और जनता पशु सदृश है।
बन्धनों में खिन्न भारत।।

है यहाॅ शासन विदेशी,
प्रजा शासित देश जिसका।
याचना के हेतु आया,
आज है वर्चस्व उसका।।

अध्ययन के साथ ही थी,
टीस उठती आह भरते।
हे प्रभो!  घर में किसी के,
अन्य कैसे वास करते।।

दस्यु! दो समय आने,
जान लोगे हम कौन है?
हे विधता वाम जब तक,
नीच तब तक हम मौन हैं।।

राक्षसों! सुन लो प्रतिज्ञा,
कर रहा मैं आज वैसे।
दानवों के नाश का था,
राम ने प्रण किया जैसे कभ।।

कभी देता था सुनाई,
भारत माॅ का करुण क्रंदन।
कभी हाहाकर के स्वर,
दग्ध करते हृदय नन्दन।।

सोचते थे यही मन में,
वन्दिनी है भारत माता।
मुक्ति कैसे हो सकेगी?
समझ में कुछ नहीं आता।।

त्याग चिन्ताएँ सभी अब,
लग गये थे अध्ययन में।
पर हृदय का घाव ऐसा,
व्यथा उर ऑसू नयन में।।

चौके बाल सुभाष अचानक,
जैसे कोई बोल रहा।
दुख को दुर कर रहा मूझसे,
गुहय भेद को खोल रहा।

धर्म एक अध्ययन तुम्हारा,
शुभ मुहूर्त जब आयेगा।
करो प्रतिक्षा अभी कुछ समय,
कार्य सिद्ध हो जायेगा।।


                                  इति
                 प्रथम सर्ग।

हिन्दी साहित्य से महत्वपूर्ण प्रश्न

(1) ” पद्मावत् ” कथा के लेखक हैं = मलिक मुहम्मद जायसी
(2) ” युगवाणी ” के लेखक के = सुमित्रानंदन पंत

(3) ” सूरसागर ” के रचयिता है = सूरदास
(4) ” सतसई ” के रचनाकार है = बिहारी

(5) ” प्रियप्रवास ” के लेखक हैं = अयोध्या सिंह उपाध्याय
(6) ” यशोधरा ” पुस्तक के रचनाकार है = मैथिलीशरण गुप्त

(7) ” भारत भारती ” के लेखक कौन है = मैथिलीशरण गुप्त
(8) ” कामायनी ” की रचना किसने की = जयशंकर प्रसाद ने

(9) ” जय पराजय ” के लेखक के = उपेन्द्रनाथ अश्क
(10) ” चंद्रकांता संतति ” किसकी कृति है = देवकीनन्दन खत्री के

(11) ” गोदान ” एवं ” गबन ” प्रसिद्ध पुस्तक के लेखक कौन है = मुन्शी प्रेमचंद
(12) ” गोरा ” प्रसिद्ध उपन्यास है = रविन्द्र नाथ टैगोर की

(13) ” मृगनयनी ” के लेखक कौन है = वृन्दावनलाल वर्मा
(14) ” भारत दुर्दशा ” के रचनाकार है = भारतेन्दु हरिश्चंद्र

(15) ” मैला आंचल ” किसकी कृति है = फणीश्वरनाथ रेणु के
(16) ” गणदेवता ” किसकी रचना है = ताराशंकर बंधोपाध्याय के

(17) ” चरित्रहीन ” किसकी रचना है = शरदचन्द्र चटर्जी के
(18) मुगल शहजादी में से किसने प्रसिद्ध पुस्तक ” हुमायूँनामा ” लिखा = गुलबदन बेगम ने

(19) ” चरक संहिता ” संबंधित = चिकित्सा से
(20) ” मिताक्षरा ” का संबंध किससे है = हिन्दू विधि से

(21) ” लीलावती ” पुस्तक संबंधित = गणित से
(22) संस्कृत ग्रंथ ” अष्टाध्यायी ” का संबंध है = व्याकरण से

(23) कबीरदास के उपदेशों का सबसे महत्वपूर्ण संकलन है = बीजक
(24) वाल्मीकि द्वारा ” रामायण ग्रंथ की रचना हुई = संस्कृत में

(25) ” महाभारत ” महाकाव्य का मौलिक नाम है = जयसंहिता
(26) ” बाबरनामा ” मूल रूप से लिखा गया है = तुर्की में

(27) ” अर्थशास्त्र ” किस विषय पर लिखी गई पुस्तकें = राजनीति
(28) कबीर के दोहों के संग्रह का क्या नाम है = बीजक

(29) कालिदास कृत ” मालविकाग्निमित्रम् ” क्या है = नाटक
(30) ” राज्मनामा ” किस ग्रंथ का फारसी अनुवाद है = महाभारत

(31) ” मिलिन्दपन्हो ” है एक = पाली ग्रंथ
(32) कालिदास रचित ” अभिज्ञानशाकुन्तलम् ” का अंग्रेजी में अनुवाद सर्वप्रथम किसने किया = विलियम जोन्स ने

(33) किसकी तुलना मैकियावेली से की जा सकती है = वात्स्यायन का कामसूत्र से
(34) किस मुगल शासक ने अपनी आत्मकथा लिखी है = बाबर ने

(35) उपनिषदों का फारसी भाषा में अनुवाद किसके प्रयास से हुआ = दारा शिकोह

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