ओम् हनुमते नमः।।
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सुभाष चन्द्रिका
दशम सर्ग
रजनी के अवशेष अंश में,
चन्द्र डूबने वाला था।
राहु केतु मे घेर रखा था,
पड़ा दुष्ट से पाला था।
लक्ष्य प्राप्त कर मानो हिमकर,
था समाधि लेने वाला ।
प्राची दिशि में प्रातः का था,...
दृश्य सुधर दिखने वाला ।।
दुख-सुख का यह अद्भुत संगम,
जन-जन को उड़कहित कर
उठतीं कभी विषाम्त तरंगें,
उर उनके आंदोलित कर ।।
और कभी हर्षातिरेक से,
झूम रहे थे भारत जन ।
" चीर तिमिर को ज्यों अरुणेदय,
प्रभा विखेर रहा कण-कण ॥
पुनः दुख की भीषण ज्वाला,
खौला कर मानस का नीर।
नयन-मार्ग से बाहर करके,
कर देती भीं कुछ कम पीर ॥
लख अदृश्य के दृश्य द्विधामय,
विविध, प्रकृति के प्रांगण में।
कहीं निरसता, कही सरसता ।
रह-रह दिखती नाण-कण में ।
हिन्द केशरी ने उठ देखा,
नियति-परी का व्यापक रंग।
स्वयं खो गये अपने में वे,
हुआ मोह ज्यों जग से भंग ॥
विर्निमेष में रहे देखते,
उस अदृश्य के अद्भुत रंग ।
कही बिरह की विषम वेदना,
कही हर्ष से पुलकित अंग ॥
कहीं धरा पर गहवर छाया,
कहीं चमकती दाहक धूप ।
कहीं रंक की सूनी कुटिया,
कही विभव से बोझिल भूप ।।
विविध विचार उठ रहे थे यों,
नेता जी के भीतर अमज,
स्यात् लक्ष्य अब सिद्ध हो गया,
भारत माता के सिर ताज ॥
स्वजनों से मिल नेताजी अब,
कर बैंकाक हेतु प्रस्थान ।
लगे बनाने वहाँ पहुँकर,
आगे की योजना सुजान।।
इसी समय डाक्यबाबेल का,
आया अनचाहा प्रस्ताव ।
जिसको सुनने या गुनने का,
नेता जी का न था स्वभाव ।।
सद्यः मना किया सुभाष ने,
नहीं मानना है प्रस्ताव ।
अटल रहे काँग्रेसी नेता,
कहें, नहीं है इसकी चाव ।।
ये अंग्रेज विश्व-वेरी हैं,
इन्हें चाहिए अपना अर्थ।
भले फंसे हों अन्य पंक में,
ये हों परेशान क्यों व्यर्थ ।।
नेता जी के शब्द-शब्द थे,
वशीकरण मन-मोहक मंत्र ।
कहुआ सत्य बोलने में थे,
बचपन से ही परम स्वतंत्र ॥
अतः सभी भारत के नेता,
मान लिये इनके सुविचार ।
हुई विफल बाबेकी गोष्ठी,
बैठ रहे सिर धुन लाचार ।।
जो शंकाएं थीं सुभाष को,
उनसे मुक्त हुए संतुष्ट ।
किन्तु देश के द्रोही दुर्जन,
इससे हुए बहुत ही रुष्ट ॥
बनी योजना नेता जी की,
शीघ्र पहुंचने की जापान ।
पहुंच वहाँ मिल हिरे हितो, से,
शुरू करेंगे फिर अभियान ।।
नेता जी के साथ चले थे,
सद् सहचर हबीबु रहमान ।
ध्वनि कर उड़ा विमान गगन में,
शीघ्र पहुंचने को जापान ।।
साथ-साथ चल यम दूतों ने,
घर किया विमान गतिहीन 1
इस प्रकार भारत माता के
पुत्र हो गये संज्ञा-हीन ।।
किया गया सारी दुनियाँ में,
हृदय-विदारक यही प्रचार।
आग लगी विमान में सहसा
जल कर हुआ निमिष में क्षार ।।
जिसने सुना जहाँ पर व्याकुल,
मचा हिन्द में हाहाकार ।
रास्ता साफ हुआ बैरी का,
उमड़ा उर में हर्ष अपार ॥
सजल नयन कुछ लोग कह रहे,
भारत का फूटा सौभाग्य ।
नाव किनारे पहुँच डूबने-
वाली है, कैसा दुर्भाग्य ।।
जगह-जगह थे स्वजन चीखते,
रहा असह्य दुःख का भार
हाय! विद्याता ! क्यों कर डाला?
ऐसा भीषण क्रूराचार ।।
हम असहाय कहाँ जाये अब,
और गहें हा। किसकी छाँह।
नहीं सूझता पथ कोई भी,
हमें दिखा कौन सुराह ।।
इतने बड़े हाथ किसके हैं?
जो अब गहे हमारी बाँह ।
और दिखाये हमको प्रभुवर,
चलने योग्य अकंटक राह"
एक सहारा रहा हमारा,
वह भी नहीं हमारे बीच ।
उजड़ गयी वाटिका हमारी,
जिसे सजाया निशिदिन सींन्च "
आ कर ढाढ़स कौन बंधाए?
नेता कौन सुभाष समान ।
बोझिल नैया कौन संभाले,
दिखता कोई नही महान।।
झुलसा उपवन राम सजायें?
या कि शत्रुओं की दुर्नीति।
छिना सहारा जिसका सहसा,
उसके लिए चतुर्दिक भीति ॥
अब कोई क्या कुछ कर सकता?
मानवता जब सिसक रही है।
दानवता दृढ़ जाल बिछा कर,
सब के सम्मुख विहंस रही है ।।
हाय! हमारे नेता प्यारे,
कहाँ गए तुम हमे छोड़ कर।
क्या अपराध हो गया हमसे,
चले गये सम्बन्ध तोड़ कर ।।
भारत माँ के प्यारे नन्दन !
एक बार फिर से आ जाओ।
अपनी दुखिया माता को फिर.
आश्वासन दे धीर बंधाओं।।
देखोगे दुर्दशा देश की,
तो निश्चित अश्रु बहाओगे ।
पूछो गे कारण क्या है? तो,
उत्तर उचित नहीं पाओगे ॥
तब तो सिर घुन बैठ रहोगे,
नहीं समझ में कुछ आयेगा।
"चिन्तन-रत रह सोचोगे तो,
भेद कदाचित. खुल पायेगा ।
सजल नयन तुम बार-बार फिर,
मन में पश्चाताप कारोगे।
स्वप्न अधूरा रहा हमारा,
आहें बारम्बार भरोगे ।।
हाय! विधाता इसी लिए क्या?
प्राणो का भी मोह त्याग कर।
जन. परिजन तब से विरक्त में,
दस्यु मंगाने में था तत्पर ॥
नहीं जानता था स्वतंत्र हो ।
भारत वासी कर मनमानी ।
किये कराये पर बच्चों सा,
अनायास फेरेंगे पानी ॥
जननी मुझे कोसती होगी,
क्यों कपि को भूषण पहनाया ।
देख रहे थे जयचन्दों को,
तदपि तुम्हारी समझ न आया ॥
विश्व विजयिनी महा शक्ति से,
धनुष बाण तुमने धरवाया।
पर अपने घर थे मनुजों से,
बेटे। तुमने पार न पाया।।
तुमने कभी न सोचा होगा।
धोखा देंगे अपने ही जन ।
यह भी सोचा होगा निश्चित,
भारत से भागेंगे दुर्जन ।।
जिस धरती पर जन्म लिये हैं,
हा। कृतप्न वे भारत वासी।
जिनसे पेषित हुए आज तक,
पुनः चाहते हो वह दासी ॥
देव-पुरुष । तुम यह मत सोचो,
यह मानव-मन का अपकर्ष
आशीर्वाद भेजते रहना।
भारत का हो अति उत्कर्ष ॥
मात्र तुम्हारी कृपा चाहिए
और नहीं कोई उपहार।
बुद्धि किसी की नहीं भ्रष्ट हो,
हो सब के ही उच्च विचार ॥
यह मत समझो सब कृतन हैं,
सभी यहां जयचन्द व मान।
पर बहु संख्यक आज भी यहाँ,
मंगल लक्ष्मी देवि समान ।।
मस्तक ऊंचा हुआ हिन्द का,
तेरे बलिदानों से,
गूँज रही हैं सकल दिशाएँ
तेरे जय गानो से ।।
देव! देख तेरी महिमा को,
और देख तेरा सद कार्य।
देश द्रोहियों को न सुहाया,
तेरा देख सुव्रत अनिवार्य
अतः सर्प बन आस्तीन के,
करके स्नेह-सुधा रस पान
गरल वमन भून मिटायी,
दुष्टों ने भारत की शान ।।
आज देव ! है स्वर्ग सुसोभित
तुझको पा कर हर्ष विभोर ।
और धरित्री नरक हो गयी।
छाया अंधकार घनघोर ॥
आपने घर में आग लगा कर,
अट्टहास करते भरपूर ।
बीट-कीट से अति प्रसन्न सह,
सौरभ से रह कोसों दूर ।।
अंग्रेजो से छिप कर आये,
जग में तुम हे! पुरुष महान ।
जग से छिप कर कहाँ गये तुम,
हम सब के नेता भगवान ॥
हम तुमको पा निर्भय होकर,
समझ रहे थे परम स्वतंत्र ।
कौन बतायेगा अब हमको,
स्वतंत्रता का पावन मन्त्र //
जहाँ कहीं भी है नेता तू,
" देव ! स्वर्ग तेरा अधिकार।
तेरे पद चिह्नों पर चल कर,
मनुज करे अपना उद्धार ॥
हे। देश भक्त !! हे चिर महान,
हे! देव दूत करुणा निधान।
हे! दुष्ट विनाशक सत्य प्राण,
हे ! वीर यशस्वी शक्तिमान ।।
सब कुछ दे कर हमें चल दिये,
हे ! त्यागी वैरागी वीर।
कौन मिलेगा इस धरती पर,
तुम सा पा सुर मनुज शरीर ॥
भारत वर्ष स्वतंत्र हो गया,
लक्ष्य तुम्हारा पूर्ण हुआ।
गोरे भूत भगे भारत से,
अहंकार सब चूर्ण हुआ ॥
किन्तु एक दुर्दात निशाचर,
भ्रष्टाचार मचा उत्पात ।
जन-जन के शोषण में तत्पर,
अवहास करता दिन रात ॥
देश भक्त हम सब के नेता,
एक बार फिर ले अवतार ।
भारत-भू से शीघ्र ध्वस्त कर दें,
अति भीषण भ्रष्टाचार ॥
विश्व शांति का अब भी देते-
रहना शुभ संदेश उदार ।
तुझे नहीं हम कुछ दे सकते,
श्रद्धा सुमन मात्र अधिकार ।
जहाँ कही भी देव पुरुष हो,
शान्ति मिले तुमको भरपूर ।
किसी तरह हम भारत वासी,
जी लेंगे रह तुमसे दूर ।।
इति
दशम सर्ग।
इति
सुभाष चन्द्रिका।।
सुभाष चन्द्रिका
अष्टम सर्ग
कुछ रात शेष थी, कुक्कुट ने दी प्रात सूचना
जगे चराचर कर्म निरत कर ईश अर्चना ।
नभचर उड़े समोद, गगन में पर फैलाये।
करते कलरव इतस्ततः मधुरस बरसाये ॥
प्राची में अरुणाम छटा थी अति सुखदाई।
देख दृश्य यह सचर-अचर में स्फूति समाधी।
सब में था उत्साह मुदित थी सकल दिशाएँ।
वातावरण सजीव सजग सब ने सुख पाये ॥
शीतल मन्द सुगन्ध वायु बहती मनभायी।
कण-कण में थी, स्नेहमयी सुषमा सरसायी।
" धीरे-धीरे जब दिनकर कुछ ऊपर आये।
उदयाचल के साथ सभी थल विभा विछाये ॥
मह- मह महकी पुष्प वाटिका सुरभि लुटाती ।
मनन-मनन जिसके भीतर भ्रमावलि गाती
रंग-बिरंगी विविध तितालियाँ नर्तन करतीं।
हाव-भाव रस-रंग रूप मानस में भरतीं ।॥
खिले जलज बहु रंग जीव सब थे प्रसन्न मन ।
करता कलरव गान विहरता मुदित विहग गन।
बिखरे मधुर सुवास, वायु मण्डल का कण-कण ।
था सुषमा संयुक्त सभी के थे पुलकित मन ॥
देख मोहक रूप प्रातः काल का।
दीप्त था मृदु रूप नेता भाल का।
देखते कुछ क्षण रहे मन में मगन ।
हटा फिर तो घ्यान, कह कर हा वतन
मधुमय दृश्य विलोक प्रात का,
श्री सुभाष के मन में आया।
भाग्योदय का प्रथम चिन्ह यह।
विश्व रूप की है यह माया ॥
धैर्य और विश्वास ने कहा,
अब है निश्चित विजय तुम्हारी)
अतः घोर संग्राम में जुटो,
है यह आवश्यकता भारी ।।
अब न मुझे चिन्ता करनी है,
और निराश नहीं होना है।
अब तक जो कुछ खोया हमने,
आगे और नहीं खोना है।।
हमको निज सर्वस्व मिटा कर,
आजादी को पा लेना है।
जितना भी अन्याय हुआ है,
उसका बदला ले लेना है ।।
बर्लिन सुभाष ने जा कर के,
निज सेना को संदेश दिया।
करतल ध्वनि के साथ सभी ने,
आदेश तुरंत स्वीकार किया ।।
सब ने की प्रार्थना इश से,
नेता सुभाष जी अमर रहे।
समय-समय पर शुभ कर, जो हो
हम सब लोगों के बीच कहें।
श्री सुभाष ने सम्बोधित कर,
महिलाकों में ओज भर दिया।
लक्ष्मी बाई मात्र अकेली
ने दुश्मन को मात कर दिया ।।
तुम्हे न झांसी सी की रानी सम,
एकाकी रण में जाना है।
अपितु वीर-ललनाओं के संग,
वैरी को सीख सिखाना है।
तेज तुम्हारा क्षीण न होगा,
शत्रु समक्ष नहीं आयेंगे।
मार काट खलिहान करोगी,
जो भी तुमसे टकरायेंगे ।।
साधन-हीन एक रानी ने,
भीषणु कुहराम मचाया था।
उसे मार खैकार कर दिया,
वैरी जो सम्मुख आया था ।
तुम तो धधक रही वह ज्वाला,
उसे बुझाने जो आयेगा।
तुख जला कर खाक करोगी,
नभ मण्डल में उड़ जायेगा ।।
अतः उठो देवियो समय है,
आज बहुत अनुकूल तुम्हारे ।
और रहे मडरा रिपुओं के
ऊपर अब विनाश घन कारे ॥
सुन सुभाष के उत्प्रेरक ओजस्वी भाषण ।
सब के मन में बढ़ा क्रान्ति के प्रति आकर्षण।
वीर नारियों की नस-नस में विद्युत धारा।
भारतीय वीरों ने रिपुओं को ललकारा ।।
नेता ने ललकार चुनौती शत्रु पक्ष को -
दी, भारत के वीर तुम्हारे वीर वक्ष को।
भेजेंगे यमलोक न होगा रक्षम कोई।
तुमने ही विषवेलि, स्वयं अपने हित बोयी।
पश्चाताप अपार, करोगे कुछ दिन बीतें ।
रोओगे ने सिर पीट, बुध्दि बल वैभव रीते।
समझ न आती बात तुम्हारी हे! मतवाले।
तुम ही ज्यों भगवान, हृदय के कुत्सित कालें ।॥
कर पग-पग अन्याय, बन रहे उत्तम प्राणी।
गंवा रहे दिन-रात, मनुज का पावन पानी।
बनो न श्रेष्ठ महान, नित्य दुष्कर्म निरत रह।
करो, न निज गुण गान,स्वयं को मानव कह कह ।।
यदि हो कर के श्रेष्ठ, तुम्हे जीना है जग में।
है पाना सम्मान, अगर तुमको पग-पग में।
तो न श्येन सा कर्म करो मानवता तज कर।
घृणा न कर उत्पन्न, स्व कलुषित मुँह दिखला कर ।।
मना उत्सव अब चारों ओर,
हृदय में सब के हर्ष अपार ।
हुई है ज्यों आजादी प्राप्त,
मिल गया हो जीवन आधार ।।
हृदय की आजादी के बाद,
हुआ ज्यों पिंजड़े से शुक मुक्त।
आह। कितनी सदियों के बाद,
हुई है भारत मां उन्मुक्त ॥
इन्हीं भावों के साथ सहर्ष ।
अमेरिका व इंग्लैंड विरुद्ध ।
घोषणा की सुभाष ने आज,
सजग हो आओ करने युद्ध ।।
घोषणा सुन सारा संसार,
चकित अब करने लगे विचार ।
अहा जग में है नेता एक,
करेगा भारत का उद्धार ॥
जिसने सुनी घोषणा युद्ध,
वही भारतवासी तैयार ।
हो गया सब कुछ अर्पण हेतु
अहो अनुपम यह उच्च विचार ॥
सैनिकों को करने तैयार
लगे नेता सुभाष तत्काल
हुआ आदेश तुरंत रधीर,
कूच कर दिये प्राप्त शुभ काल ।।
मिली जापानी सेना शीघ्र,
हिन्द सेना के साथ सहर्ष।
उभय सेनाओं के मिल वीर,
लगे करने भीषण संघर्ष ॥
संसाधन थे सैनिक जापान
दिखाते रण-कौशल अविराम ।
इधर पैदल भारत के वीर,
रहे करते भीषण सग्रांम //
आजाद हिन्द सैनिक सोल्लास ।
बढ़ चले रणक्षेत्र की ओर।
उधर भारत की सेना देख ।
क्रुद्ध अरि लगे मचाने शोर
इधर भारत के सैनिक खीज,
बुलाने लगे शत्रु को पास।
"बढ़ो आगे सफेद शैतान;
हो रहे हो क्यों अभी हताश ॥
उभय सेनाओं के ही बीच,
लगा होने भीषण संग्राम।
शत्रु दल था साधन सम्पन्न,
बिना साधन भारत ज्यों राम ।
बर्मा के प्रधान बामा ने,
करने का पूरा सहयोग ।
वचन दिया भारत सेना को,
था यह शुभ कारक संयोग ।।
सुन बामा की मधुमय बातें,
हिन्द सैनिकों में उत्साह ।
और अधिक बढ़ गया तुरंत ही,
सबमें बढ़ी विजय की चाह ॥
अस्त्र-शस्त्र की कमी नहीं थी,
अंग्रेजी सेना के पास।
जिसके कारण भारत सैनिक,
प्रायः दिखते अधिक उदास ॥
किन्तु स्वयं में शक्ति समेटे,
भारत के सैनिक प्रलयंकर।
खेद-खेद कर मार गिराते,
वैदेशिक रिपुकों को सत्वर ॥
उधर विदेशी सैनिक सारे,
कर प्रयोग वैज्ञानिक साधन ।
मार रहे थे हिन्द सैनिकों - को
अवसर पाकर शत्रु मुदित मन ।।
एक और धाय-धाँय थी,
होती गोली की बौछार ।
एक और लाठी डंडे से,
करते वार वीर लाचार ।।
कितने हिन्द सैनिकों के कर,
थी शोभा पाती करवाल ।
कुछ के कर में थी बन्दूकें,
ज्यों वैरी के काल कराल ।।
कुछ सेनानी वीर निहत्थे,
मल्ल युद्ध में पूर्ण प्रवीण ।
उठा फेंकते थे रिपुलों को,
जो हो जाते प्राण-विहीन ।।
धीरे-धीरे लगे पिछड़ने,
शत्रु पक्ष के वीर अशक्त
पीछा करते थे खदेड़ते।
भारत माँ के सच्चे भक्त ॥
बढ़ा मनोबल हिन्द सैन्य का,
था उनमें अपूर्व उल्लास ।
शत्रु पक्ष में दैन्य भाव था,
निज जीवन से हुए निराश ।।
थी आजाद सेना हिन्द सेना शुचि,
ज्यों सुर-सरि का निर्मल नीर।
जाति धर्म का भेद नहीं था,
सब भारत माँ के सुत बिर ॥
सब का एक लक्ष्य था केवल,
भारत माता हो उन्मुक्त।
और रहें उनकी संताने,
सारी सुख सुविधा संयुक्त ॥
नही किसी में भेदभाव था,
और किसी में नहीं दुराव ।
एक साथ था खान-पान सब,
तथा सभी में था सम भाव ।।
वर्ण नाम का पता नहीं था,
सब का मात्र एक था कर्म।
भारत माता कब स्वतंत्र हो,
सबका एक यही था धर्म ।।
इसी लिए सब एक साथ मिल,
लगे तोड़ने में अरि-व्यूह।
कभी नहीं पीछे हटते थे।
बढ़ते रहे हिन्द के सैनिक,
होता रहा घोर संग्राम /
विजय एक के बाद दूसरी,
करते बढ़ते थे अविराम ॥
टिडडिम पर अधिकार प्राप्त कर,
आगे बढ़ते रहे जवान ।
इसी बीच, पर कुछ सेनानी,
भाग गये कायर नादान ।।
इसकी चिन्ता किये बिना ही,
भारत के सैनिक बलवान ।
ढा कर घोर विपत्ति शत्रु का,
मिटा रहे थे नाम निशान ॥
विजय कोहिमा पर पाकर जब,
आगे बढ़े हिन्द के शेर।
विषम परिस्थिति थी फिर भी वे,
मार कर रहे थे अरि ढेर ।।
इसी समय जापानी लोगो -
का, लख कर अशिष्ट व्यवहार।
क्षुब्ध हुए भारत के सैनिक,
हुआ हृदय में कष्ट अपार ॥
फिर भी निज कर्तव्य ध्यान से,
रंच न होने पाया ओझल ।
लक्ष्य-सिधित हित रहे जूझते,
आत्मा का पाकर के सम्बल ॥
भौतिक सुख-सुविधाएं तज कर
मोह स्वप्राणों का भी त्याग।
जंग-ज्वाल में कूद रहे थे,
भारत के सैनिक बेदाग ॥
भारतीय महिलाओं का लख,
रण-कौशल वैरी थे दंग।
शत्रु सैनिकों का सहसा अब
उतर चला था मुँह का रंग ॥
भारत-सैनिक महिलाओं का,
था द्रष्टव्य घोर संग्राम।
मर कट उभय दलों के सैनिक,
पहुँच रहे थे यम को धाम ।।
इधर-उधर से दोनो दल का,
होता रहा वार पर वार।
कुछ ही क्षण में बचे सिपाही,
वैरी के भागे लाचार ॥
इस प्रकार परतंत्र भूमि पर,
विजय प्राप्त कर, कर अधिकार।
हिन्द, नारियों ने दिखलाया,
दुनिया को स्वशक्ति भण्डार ॥
देखा जग ने चकित हिन्द की-
ललओं का शौर्य अपार ।
पानी के हित कैसा मरना,
कैसा जीना नहीं विचार ॥
कर्नल शाहनवाज डिवीजन,
को भेजा तुरंत इम्फाल।
सिंह नाद कर झपटी सेना,
शत्रु के लिए व्याल कराल ॥
घमासान था युद्ध हो रहा,
जल-मर गिरते रहे जवान।
उनके शव पर से ही चलते,
बढ़ कर लेते रहे निशान ॥
किये बिना परवाह किसी की,
रहे जूझते वीर जवान ।
उभय पक्ष के वीरों के शव -
से, ज्यों थी रण भू समसान ॥
अद्भुत रण-कौशल दिखता था,
हिन्द सैनिकों अविराम ।
अस्त्र-शस्त्र से लैस विपक्षी,
होते रहे तदपि नाकाम ।।
इस प्रकार भारत के सैनिक,
करते हुए घोर संघर्ष।
और विजय पर विजय प्राप्त कर,
आगे बढ़ते रहे सहर्ष ।।
संघर्षों की बलिवेदी पर,
होते हुए शहीद जवान।
कब्जा कर अनेक क्षेत्रों पर
फहरा परचम राष्ट्र निशान।।
स्वतंत्रता की ललक तीव्र थी,
आगे बढ़ते रहे सुधीर ।
अब तो दिल्ली दूर नहीं है,
दिल्ली चलो वीर गम्भीर ॥
इसी समय आजाद हिन्द सेना के ऊपर,
मंडराया दुर्भाग्य हटे पीछे निर्भय पर-
इस घटना से दुःख हुआ जो भी सुन पाया
सब के भीतर क्षोभ और नैरास्य समाया
पर सुभाष को दुःख नहीं, ये आशावादी,
मित्रो! दृढ़ विश्वास, प्राप्त होगी आजादी।
त्यागे मन का क्षोभ तजो चिन्ताएँ सारी,
वीर! उठो सवेग करो रण की तैयारी ॥
इति
अष्टम सर्ग
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