अष्टम सर्ग
कुछ रात शेष थी, कुक्कुट ने दी प्रात सूचना
जगे चराचर कर्म निरत कर ईश अर्चना ।
नभचर उड़े समोद, गगन में पर फैलाये।
करते कलरव इतस्ततः मधुरस बरसाये ॥
प्राची में अरुणाम छटा थी अति सुखदाई।
देख दृश्य यह सचर-अचर में स्फूति समाधी।
सब में था उत्साह मुदित थी सकल दिशाएँ।
वातावरण सजीव सजग सब ने सुख पाये ॥
शीतल मन्द सुगन्ध वायु बहती मनभायी।
कण-कण में थी, स्नेहमयी सुषमा सरसायी।
" धीरे-धीरे जब दिनकर कुछ ऊपर आये।
उदयाचल के साथ सभी थल विभा विछाये ॥
मह- मह महकी पुष्प वाटिका सुरभि लुटाती ।
मनन-मनन जिसके भीतर भ्रमावलि गाती
रंग-बिरंगी विविध तितालियाँ नर्तन करतीं।
हाव-भाव रस-रंग रूप मानस में भरतीं ।॥
खिले जलज बहु रंग जीव सब थे प्रसन्न मन ।
करता कलरव गान विहरता मुदित विहग गन।
बिखरे मधुर सुवास, वायु मण्डल का कण-कण ।
था सुषमा संयुक्त सभी के थे पुलकित मन ॥
देख मोहक रूप प्रातः काल का।
दीप्त था मृदु रूप नेता भाल का।
देखते कुछ क्षण रहे मन में मगन ।
हटा फिर तो घ्यान, कह कर हा वतन
मधुमय दृश्य विलोक प्रात का,
श्री सुभाष के मन में आया।
भाग्योदय का प्रथम चिन्ह यह।
विश्व रूप की है यह माया ॥
धैर्य और विश्वास ने कहा,
अब है निश्चित विजय तुम्हारी)
अतः घोर संग्राम में जुटो,
है यह आवश्यकता भारी ।।
अब न मुझे चिन्ता करनी है,
और निराश नहीं होना है।
अब तक जो कुछ खोया हमने,
आगे और नहीं खोना है।।
हमको निज सर्वस्व मिटा कर,
आजादी को पा लेना है।
जितना भी अन्याय हुआ है,
उसका बदला ले लेना है ।।
बर्लिन सुभाष ने जा कर के,
निज सेना को संदेश दिया।
करतल ध्वनि के साथ सभी ने,
आदेश तुरंत स्वीकार किया ।।
सब ने की प्रार्थना इश से,
नेता सुभाष जी अमर रहे।
समय-समय पर शुभ कर, जो हो
हम सब लोगों के बीच कहें।
श्री सुभाष ने सम्बोधित कर,
महिलाकों में ओज भर दिया।
लक्ष्मी बाई मात्र अकेली
ने दुश्मन को मात कर दिया ।।
तुम्हे न झांसी सी की रानी सम,
एकाकी रण में जाना है।
अपितु वीर-ललनाओं के संग,
वैरी को सीख सिखाना है।
तेज तुम्हारा क्षीण न होगा,
शत्रु समक्ष नहीं आयेंगे।
मार काट खलिहान करोगी,
जो भी तुमसे टकरायेंगे ।।
साधन-हीन एक रानी ने,
भीषणु कुहराम मचाया था।
उसे मार खैकार कर दिया,
वैरी जो सम्मुख आया था ।
तुम तो धधक रही वह ज्वाला,
उसे बुझाने जो आयेगा।
तुख जला कर खाक करोगी,
नभ मण्डल में उड़ जायेगा ।।
अतः उठो देवियो समय है,
आज बहुत अनुकूल तुम्हारे ।
और रहे मडरा रिपुओं के
ऊपर अब विनाश घन कारे ॥
सुन सुभाष के उत्प्रेरक ओजस्वी भाषण ।
सब के मन में बढ़ा क्रान्ति के प्रति आकर्षण।
वीर नारियों की नस-नस में विद्युत धारा।
भारतीय वीरों ने रिपुओं को ललकारा ।।
नेता ने ललकार चुनौती शत्रु पक्ष को -
दी, भारत के वीर तुम्हारे वीर वक्ष को।
भेजेंगे यमलोक न होगा रक्षम कोई।
तुमने ही विषवेलि, स्वयं अपने हित बोयी।
पश्चाताप अपार, करोगे कुछ दिन बीतें ।
रोओगे ने सिर पीट, बुध्दि बल वैभव रीते।
समझ न आती बात तुम्हारी हे! मतवाले।
तुम ही ज्यों भगवान, हृदय के कुत्सित कालें ।॥
कर पग-पग अन्याय, बन रहे उत्तम प्राणी।
गंवा रहे दिन-रात, मनुज का पावन पानी।
बनो न श्रेष्ठ महान, नित्य दुष्कर्म निरत रह।
करो, न निज गुण गान,स्वयं को मानव कह कह ।।
यदि हो कर के श्रेष्ठ, तुम्हे जीना है जग में।
है पाना सम्मान, अगर तुमको पग-पग में।
तो न श्येन सा कर्म करो मानवता तज कर।
घृणा न कर उत्पन्न, स्व कलुषित मुँह दिखला कर ।।
मना उत्सव अब चारों ओर,
हृदय में सब के हर्ष अपार ।
हुई है ज्यों आजादी प्राप्त,
मिल गया हो जीवन आधार ।।
हृदय की आजादी के बाद,
हुआ ज्यों पिंजड़े से शुक मुक्त।
आह। कितनी सदियों के बाद,
हुई है भारत मां उन्मुक्त ॥
इन्हीं भावों के साथ सहर्ष ।
अमेरिका व इंग्लैंड विरुद्ध ।
घोषणा की सुभाष ने आज,
सजग हो आओ करने युद्ध ।।
घोषणा सुन सारा संसार,
चकित अब करने लगे विचार ।
अहा जग में है नेता एक,
करेगा भारत का उद्धार ॥
जिसने सुनी घोषणा युद्ध,
वही भारतवासी तैयार ।
हो गया सब कुछ अर्पण हेतु
अहो अनुपम यह उच्च विचार ॥
सैनिकों को करने तैयार
लगे नेता सुभाष तत्काल
हुआ आदेश तुरंत रधीर,
कूच कर दिये प्राप्त शुभ काल ।।
मिली जापानी सेना शीघ्र,
हिन्द सेना के साथ सहर्ष।
उभय सेनाओं के मिल वीर,
लगे करने भीषण संघर्ष ॥
संसाधन थे सैनिक जापान
दिखाते रण-कौशल अविराम ।
इधर पैदल भारत के वीर,
रहे करते भीषण सग्रांम //
आजाद हिन्द सैनिक सोल्लास ।
बढ़ चले रणक्षेत्र की ओर।
उधर भारत की सेना देख ।
क्रुद्ध अरि लगे मचाने शोर
इधर भारत के सैनिक खीज,
बुलाने लगे शत्रु को पास।
"बढ़ो आगे सफेद शैतान;
हो रहे हो क्यों अभी हताश ॥
उभय सेनाओं के ही बीच,
लगा होने भीषण संग्राम।
शत्रु दल था साधन सम्पन्न,
बिना साधन भारत ज्यों राम ।
बर्मा के प्रधान बामा ने,
करने का पूरा सहयोग ।
वचन दिया भारत सेना को,
था यह शुभ कारक संयोग ।।
सुन बामा की मधुमय बातें,
हिन्द सैनिकों में उत्साह ।
और अधिक बढ़ गया तुरंत ही,
सबमें बढ़ी विजय की चाह ॥
अस्त्र-शस्त्र की कमी नहीं थी,
अंग्रेजी सेना के पास।
जिसके कारण भारत सैनिक,
प्रायः दिखते अधिक उदास ॥
किन्तु स्वयं में शक्ति समेटे,
भारत के सैनिक प्रलयंकर।
खेद-खेद कर मार गिराते,
वैदेशिक रिपुकों को सत्वर ॥
उधर विदेशी सैनिक सारे,
कर प्रयोग वैज्ञानिक साधन ।
मार रहे थे हिन्द सैनिकों - को
अवसर पाकर शत्रु मुदित मन ।।
एक और धाय-धाँय थी,
होती गोली की बौछार ।
एक और लाठी डंडे से,
करते वार वीर लाचार ।।
कितने हिन्द सैनिकों के कर,
थी शोभा पाती करवाल ।
कुछ के कर में थी बन्दूकें,
ज्यों वैरी के काल कराल ।।
कुछ सेनानी वीर निहत्थे,
मल्ल युद्ध में पूर्ण प्रवीण ।
उठा फेंकते थे रिपुलों को,
जो हो जाते प्राण-विहीन ।।
धीरे-धीरे लगे पिछड़ने,
शत्रु पक्ष के वीर अशक्त
पीछा करते थे खदेड़ते।
भारत माँ के सच्चे भक्त ॥
बढ़ा मनोबल हिन्द सैन्य का,
था उनमें अपूर्व उल्लास ।
शत्रु पक्ष में दैन्य भाव था,
निज जीवन से हुए निराश ।।
थी आजाद सेना हिन्द सेना शुचि,
ज्यों सुर-सरि का निर्मल नीर।
जाति धर्म का भेद नहीं था,
सब भारत माँ के सुत बिर ॥
सब का एक लक्ष्य था केवल,
भारत माता हो उन्मुक्त।
और रहें उनकी संताने,
सारी सुख सुविधा संयुक्त ॥
नही किसी में भेदभाव था,
और किसी में नहीं दुराव ।
एक साथ था खान-पान सब,
तथा सभी में था सम भाव ।।
वर्ण नाम का पता नहीं था,
सब का मात्र एक था कर्म।
भारत माता कब स्वतंत्र हो,
सबका एक यही था धर्म ।।
इसी लिए सब एक साथ मिल,
लगे तोड़ने में अरि-व्यूह।
कभी नहीं पीछे हटते थे।
बढ़ते रहे हिन्द के सैनिक,
होता रहा घोर संग्राम /
विजय एक के बाद दूसरी,
करते बढ़ते थे अविराम ॥
टिडडिम पर अधिकार प्राप्त कर,
आगे बढ़ते रहे जवान ।
इसी बीच, पर कुछ सेनानी,
भाग गये कायर नादान ।।
इसकी चिन्ता किये बिना ही,
भारत के सैनिक बलवान ।
ढा कर घोर विपत्ति शत्रु का,
मिटा रहे थे नाम निशान ॥
विजय कोहिमा पर पाकर जब,
आगे बढ़े हिन्द के शेर।
विषम परिस्थिति थी फिर भी वे,
मार कर रहे थे अरि ढेर ।।
इसी समय जापानी लोगो -
का, लख कर अशिष्ट व्यवहार।
क्षुब्ध हुए भारत के सैनिक,
हुआ हृदय में कष्ट अपार ॥
फिर भी निज कर्तव्य ध्यान से,
रंच न होने पाया ओझल ।
लक्ष्य-सिधित हित रहे जूझते,
आत्मा का पाकर के सम्बल ॥
भौतिक सुख-सुविधाएं तज कर
मोह स्वप्राणों का भी त्याग।
जंग-ज्वाल में कूद रहे थे,
भारत के सैनिक बेदाग ॥
भारतीय महिलाओं का लख,
रण-कौशल वैरी थे दंग।
शत्रु सैनिकों का सहसा अब
उतर चला था मुँह का रंग ॥
भारत-सैनिक महिलाओं का,
था द्रष्टव्य घोर संग्राम।
मर कट उभय दलों के सैनिक,
पहुँच रहे थे यम को धाम ।।
इधर-उधर से दोनो दल का,
होता रहा वार पर वार।
कुछ ही क्षण में बचे सिपाही,
वैरी के भागे लाचार ॥
इस प्रकार परतंत्र भूमि पर,
विजय प्राप्त कर, कर अधिकार।
हिन्द, नारियों ने दिखलाया,
दुनिया को स्वशक्ति भण्डार ॥
देखा जग ने चकित हिन्द की-
ललओं का शौर्य अपार ।
पानी के हित कैसा मरना,
कैसा जीना नहीं विचार ॥
कर्नल शाहनवाज डिवीजन,
को भेजा तुरंत इम्फाल।
सिंह नाद कर झपटी सेना,
शत्रु के लिए व्याल कराल ॥
घमासान था युद्ध हो रहा,
जल-मर गिरते रहे जवान।
उनके शव पर से ही चलते,
बढ़ कर लेते रहे निशान ॥
किये बिना परवाह किसी की,
रहे जूझते वीर जवान ।
उभय पक्ष के वीरों के शव -
से, ज्यों थी रण भू समसान ॥
अद्भुत रण-कौशल दिखता था,
हिन्द सैनिकों अविराम ।
अस्त्र-शस्त्र से लैस विपक्षी,
होते रहे तदपि नाकाम ।।
इस प्रकार भारत के सैनिक,
करते हुए घोर संघर्ष।
और विजय पर विजय प्राप्त कर,
आगे बढ़ते रहे सहर्ष ।।
संघर्षों की बलिवेदी पर,
होते हुए शहीद जवान।
कब्जा कर अनेक क्षेत्रों पर
फहरा परचम राष्ट्र निशान।।
स्वतंत्रता की ललक तीव्र थी,
आगे बढ़ते रहे सुधीर ।
अब तो दिल्ली दूर नहीं है,
दिल्ली चलो वीर गम्भीर ॥
इसी समय आजाद हिन्द सेना के ऊपर,
मंडराया दुर्भाग्य हटे पीछे निर्भय पर-
इस घटना से दुःख हुआ जो भी सुन पाया
सब के भीतर क्षोभ और नैरास्य समाया
पर सुभाष को दुःख नहीं, ये आशावादी,
मित्रो! दृढ़ विश्वास, प्राप्त होगी आजादी।
त्यागे मन का क्षोभ तजो चिन्ताएँ सारी,
वीर! उठो सवेग करो रण की तैयारी ॥
इति
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