जीवन- वृत्त
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नाम :- प्रोफेसर (डॉक्टर)मिथिलेश कुमार त्रिपाठी
माता का नाम :- स्व०धनदेई
पिता का नाम :- श्री रामबरन त्रिपाठी
विवाहित/अविवाहित:-विवाहित(विधुर)
जन्मतिथि :- 4 मार्च 1964 ई०
जन्म स्थान :- (उत्तर प्रदेश)
स्थायी पता :-
ग्राम :- दहेंव
पोस्ट :- बालवरगंज(सुजानगंज)
जिला :- जौनपुर
पिन कोड :- 222201 (उ प्र)
जन्म-जनपद :- जौनपुर
शिक्षा :-1
1- एम ए (हिन्दी) इलाहाबाद विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
2-पी-एच०डी(हिन्दी) शीर्षक:- मानस की आध्यात्मिक भूमिका
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
3-पीजीडीजेएमसी(पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा इन जर्नलिज्म ऐण्ड मास कम्युनिकेशन)उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
4-डीएचईएन(डिप्लोमा इन हेल्थ एजुकेशन ऐण्ड न्यूट्रेशन)उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय, इलाहाबाद
अभिरुचि :-
अध्ययन-अध्यापन,लेखन, जन-सेवा, साहित्यिक -सामाजिक-सांस्कृतिक-धार्मिक-आध्यात्मिक आदि मंचों पर व्याख्यान, जिज्ञासु बुद्धिजीवियों के लिए उनकी जिज्ञासा के समाधानार्थ दिशा- निर्देशन, तत्वचिन्तन- मनन,कृषि,बागवानी, आयुर्वेदिक एवं ज्योतिषशास्त्रीय ग्रन्थों का अनुसन्धानपरक अध्ययन,आर्ष ग्रन्थों में जीवन-सूत्रों की खोज, भारतीय साहित्य एवं संस्कृति से सम्बन्धित भ्रामक दुष्प्रचारों के तर्कसिद्ध एवं प्रमाणपुष्ट खण्डन में अभिरुचि आदि।
कार्यानुभव :-
प्रान्तीय, राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय संगोष्ठियों एवं कार्यशालाओं में शोधपत्र-वाचन एवं विशिष्ट अतिथि,मुख्य अतिथि, मुख्य वक्ता एवं विशिष्ट वक्ता के रूप में व्याख्यान, अध्यक्षीय उद्बोधन, ग्रन्थ-लेखन, अध्यापन, आकाशवाणी केन्द्रों पर काव्यपाठ एवं वार्ता ,पशु-सेवा आदि के साथ-साथ ग्रन्थ एवं पत्रिकाओं का सह सम्पादन/सम्पादन एवं पर्यावरण जागरूकता अभियान का संचालन।
कार्य-वृत्त :-
1-प्रोफेसर एवं अध्यक्ष हिन्दी विभाग स्नातकोत्तर महाविद्यालय पट्टी, प्रतापगढ़ (उ प्र)
सम्बद्ध
प्रोफेसर राजेन्द्र सिंह (रज्जू भय्या) विश्वविद्यालय,प्रयागराज (उ प्र)
2-प्रभारी पुस्तकालय अधीक्षक स्नातकोत्तर महाविद्यालय पट्टी,
प्रतापगढ़ (उ प्र)
3-परामर्शदाता हिन्दी स्नातक एवं स्नातकोत्तर कक्षा, उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय प्रयागराज
4-नोडल अधिकारी छात्रवृत्ति स्नातकोत्तर महाविद्यालय पट्टी, प्रतापगढ़ (उ प्र)
5-परीक्षा-प्रभारी स्नातकोत्तर महाविद्यालय पट्टी,प्रतापगढ़
6-सदस्य एवं संयोजक प्रवेश-समिति
7-कुलानुशासक बी ए भाग तीन
8-प्रधान सम्पादक महाविद्यालयीय वार्षिक पत्रिका "अवध प्रतिभा"
अध्यक्ष शिक्षक संघ स्नातकोत्तर महाविद्यालय पट्टी,
प्रतापगढ़
9-संयोजक ‘शुल्क मुक्ति समिति’ स्नातकोत्तर महाविद्यालय पट्टी, प्रतापगढ़
10-संयोजक भाजपा प्रबुद्ध प्रकोष्ठ विधानसभा-क्षेत्र पट्टी, प्रतापगढ़
11-अध्यक्ष अखिल भारतीय साहित्य परिषद काशी प्रांत जनपद जौनपुर,
12-अध्यक्ष विश्व हिन्दी परिषद जनपद जौनपुर (उत्तर प्रदेश)के साथ-साथ अन्य अनेक साहित्यिक,सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं के अध्यक्ष, संयोजक ,सचिव, उपाध्यक्ष आदि पदों पर पदासीन,
प्रकाशित कृतियाॅं :-
1-”दूध:अमृत या विष” (स्वास्थ्य शिक्षापरक ग्रन्थ)प्रकाशन-वर्ष 2008
2-”अर्धांगिनी” महाकाव्य(पुरस्कृत) प्रथम संस्करण मई 2022, द्वितीय संस्करण मार्च 2024, नारी- जीवन पर आधारित सम्वेदनापूर्ण एवं शिक्षाप्रद ग्रन्थ
3-”महावीरोदय” (पुरस्कृत) द्वितीय संस्करण 2023,श्री हनुमान जी के जीवन पर आधारित वीर एवं रौद्र रसात्मक प्रबन्ध काव्य(नौ सर्गों में)
4-’’काव्य-कलश” प्रकाशन -वर्ष 2024,(अनुभूति, अध्ययन एवं श्रुत ज्ञान पर आधारित शिक्षाप्रद स्वरचित कविताओं का संग्रह )
5-”छन्दाञ्जलि”, प्रकाशन-वर्ष मई 2024(कल्पना यथार्थ एवं अनुभूत सत्य पर आधारित स्वरचित कविताओं का संग्रह)
6-”सीख सुहानी” मुक्तक काव्य,प्रकाशन-वर्ष 2025,(जीवन एवं जगत से संबंधित कटु-मधुर अनुभवों पर आधारित रसात्मक कविताऍं।
सम्पादन :-
1-कर्मयोगी(अभिनन्दन ग्रन्थ)सदस्य कृतित्व विभाग
2-दर्पण (अभिनन्दन ग्रन्थ) प्रधान सम्पादक
3-अवध-प्रतिभा (वार्षिक) प्रधान सम्पादक
4-सोशल हेराल्ड (चातुर्मासिक) जर्नल उप सम्पादक
5-अभिदेशक (त्रैमासिक) सह सम्पादक
6-शोध मार्तंड (अर्धवार्षिक) अन्तर्राष्ट्रीय जर्नल सदस्य सलाहकार समिति
7-विजय श्री (अभिनन्दन ग्रन्थ) सदस्य संम्पादक-मण्डल
8-भारतीय संस्कृति एवं मानवाधिकार (पुस्तक) सह सम्पादक
9-सृजन (अभिनन्दन ग्रन्थ) सदस्य सम्पादक मण्डल
10-मध्यकालीन काव्य दर्पण (पुस्तक) सह सम्पादक
11-मठ मयूखिनी (अर्द्ध वार्षिक पुस्तिका) सह समपादक
प्रकाशनाधीन/अप्रकाशित कृतियाॅं :-
1-मानस की आध्यात्मिक भूमिका (शोध प्रबन्ध)
2-शूर्पणखा (कथालोचन)
3-रावण (कथालोचन) अपूर्ण
4-मानस पंचामृत (शोध निबन्धात्मक ग्रन्थ)
5-मानस सप्तामृत(शोध निबन्धात्मक ग्रन्थ)
6-तुलसी मानस के राम (कथालोचन) अपूर्ण
7-निबन्ध निर्झर (विविध विषयों से सम्बन्धित शोध निबन्धों का संग्रह)
8-श्री रामचरितमानस का वैज्ञानिक अध्ययन (अपूर्ण)
9-श्री रामचरितमानस का आरोग्य शास्त्रीय अध्ययन(अपूर्ण )
10-तुलसी-मानस में नारी-जीवन (स्त्री विमर्स से सम्बन्धित ग्रन्थ(अपूर्ण)
11-पौराणिक कथा-प्रसंगों की शाश्वत प्रासांगिकता (अपूर्ण)
12-कवितायतन(मुक्तक काव्य)
13-कविताञ्जलि (मुक्तक काव्य)
14-जीवनानुभूति (मुक्तक काव्य)
15-पराम्बा(महाकाव्य)शीघ्र प्रकाश्य
16-काल-प्रवाह (मुक्तक काव्य)
17-महामनस्वी (महाकाव्य) शीघ्र प्रकाश्य
18-आचार्य चाणक्य (महाकाव्य) अपूर्ण
19-भरत भद्र (महाकाव्य) अपूर्ण
20-अवधी अवध (स्वरचितअवधी कविताओं का संग्रह)
21-भगवान शंकर और समाज (कथालोचन) अपूर्ण
हिन्दी के विकास के लिए किये गये उल्लेखनीय कार्य :-
1-हिन्दी भाषा,साहित्य, साहित्यशास्त्र एवं अनेक अन्य विषयों से सम्बन्धित शताधिक शोध निबन्ध/लेख अनेक राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं-शोध पत्रिकाओं,शोध-ग्रन्थों में प्रकाशित।
2-विभिन्न संगोष्ठियों (राष्ट्रीय, अंतरृराष्ट्रीय एवं सभाओं तथा बैठकों में हिंदी-माहात्म्य विषयक व्याख्यान।
3-छात्र-छात्राओं को हिन्दी में संवाद एवं देवनागरी लिपि में लेखन के लिए प्रोत्साहन एवं प्रेरणा।
4-छात्र-छात्राओं को हिन्दी में कविता, कहानी,निबन्ध, एकांकी आदि विधाओं में लेखन के लिए प्रोत्साहन।
5-अंग्रेजी में व्याख्यान दे रहे विद्वानों से हिन्दी बोलने का आग्रह ।
6-अंग्रेजी माध्यम के व्याख्यान-मंचों पर हिन्दी में व्याख्यान।
लेखन-विधा :- कविता, कहानी ,निबन्ध, समीक्षा ,शोध निबंध, कथालोचन, संस्मरण ,यात्रावृत्त, एकांकी, नाटक, उपन्यास, आदि।
शिक्षा के क्षेत्र में योगदान :-
1-नियमित अध्यापन।
2-प्रेरणाप्रद एवं ज्ञानवर्धक शिक्षण के द्वारा शिक्षार्थियों के व्यक्तित्व को स्वर्ण पदक की प्राप्ति के योग्य बनाना।
3-विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त केन्द्राध्यक्ष के रूप में विभिन्न महाविद्यालयों में परीक्षा संपन्न कराना।
4-आन्तरिक एवं बाह्य परीक्षक के रूप में विभिन्न विश्वविद्यालयों में उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन एवं मौखिक परीक्षाओं को संपन्न करना/कराना।
5-विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त विषय विशेषज्ञ के रूप में साक्षात्कार द्वारा सहायक आचार्यों की चयन-प्रक्रिया में सहयोग
6-शोध-परियोजनाओं एवं लघु शोध प्रबन्धों का निर्देशन एवं मूल्यांकन।
7-स्नातक एवं स्नातकोत्तर हिन्दी के परीक्षा-प्रश्नपत्रों का निर्माण।
8-कवि-लेखकों के मौलिक ग्रन्थों का भूमिका-लेखन।
9-पुस्तक-समीक्षा-लेखन।
10-विश्वविद्यालय द्वारा गठित निरीक्षक- मंडल में सदस्य के रूप में महाविद्यालयों का निरीक्षण एवं सत्यापन।
राष्ट्रहित के कार्य :-
1-राष्ट्रभाषा हिन्दी एवं देवनागरी लिपि का प्रचार-प्रसार।
2-आदिवासियों की जीवन-दशा का अध्ययन।
3-लोक-जीवन एवं लोक संस्कृति का अध्ययन।
4-समाज-सेवा।
5-ग्रामवासियों को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करना।
6-रचनाओं द्वारा भारतीय राजनीति को दिशा-निर्देश एवं विश्व-जीवन को शान्ति-संदेश।
7-रचनात्मक कार्यों द्वारा व्यक्ति-जीवन से लेकर विश्व-जीवन तक की समस्याओं को उठाकर समाधान का मार्ग-दर्शन।
8-कार्यक्रमाधिकारी राष्ट्रीय सेवा योजना स्नातकोत्तर महाविद्यालय पट्टी, प्रतापगढ़ के रूप में सामान्य एवं विशेष शिविर लगाकर स्वच्छता अभियान चलाना, जागरूकता रैलियां निकालना, स्वयं के साथ-साथ शिविरार्थियों से भी श्रमदान कराना एवं उन्हें विभिन्न प्रकार के जीवनोपयोगी खेल खेलने के लिए प्रोत्साहित करना, महाविद्यालय में सारगर्भित व्याख्यान कराना,सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन करना आदि।
सम्मान/ पुरस्कार :-
1-शिक्षक दिवस सम्मान
2-उत्कृष्ट सेवा पुरस्कार 2019,
3-अंकुर नवोदित हस्ताक्षर सम्मान 2023 ,
4-महिला शक्ति काव्य रत्न सम्मान 2024,
5-कोशी साहित्य शौर्य सम्मान 2024(स्वर्ण सम्मान)
6-कन्हैया लाल स्मृति साहित्य सम्मान 2024,
7-विश्व हिन्दी दिवस सम्मान 2025,
8-राजर्षि साहित्य भूषण श्री सम्मान/उपाधि 2025,
9-SSIF महादेवी वर्मा काव्य शिरोमणि सम्मान 2025,
10-अंतर्राष्ट्रीय महिला समाजसेवी सम्मान 2025,
11-हिन्दी सेवी सम्मान 2025,
12-हिंदी भक्त सम्मान 2025,
13-गणतंत्र दिवस गौरव सम्मान 2025,
14-श्रेष्ठ शिक्षक सम्मान 2025,
15-विवेकानन्द साहित्य श्री सम्मान 2025
के साथ-साथ शताधिक राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कारों/ सम्मानों/उपाधियों से पुरस्कृत/ सम्मानित/विभूषित।
उपलब्धि :-
एक आदर्श शिक्षक, महाकवि, लेखक, समीक्षक, व्याख्याता, वक्ता, के साथ-साथ सम्मानित एवं श्रेष्ठ आदरणीय नागरिक की ख्याति।
अपना सपना :- विश्व-मंच पर भारतीय संस्कृति की प्रतिष्ठा एवं बाजारवाद के विरुद्ध "वसुधैव कुटुम्बकम्" का भाव- विकास।
विश्व-संदेश :- परमाणविक अस्त्रों से सज-धज कर बारूद के पहाड़ पर निश्चिन्त बैठी हुई दुनिया को सुरक्षित रखने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ प्रत्येक देश को भारत की सनातन संस्कृति में जीवित रहने की व्यवस्था सुनिश्चित करें।
अन्य संदेश :-
1-किसी भी प्रकार के स्वार्थ-लाभ के लिए योग्यता को विस्थापित करके अयोग्यता को जन-जीवन पर हठात न थोपने की व्यवस्था प्रत्येक स्तर पर सुनिश्चित की जानी चाहिए। मनुष्यता के हितार्थ योग्यता का सदैव सम्मान होना चाहिए।
2-संस्थापक "मणि मंदिर साहित्य साधना धाम दहेंव, बालवरगंज (सुजानगंज) जौनपुर पिन कोड 222201(उ प्र)
मोबाइल नंबर
9452 145606
6394 54 6785
साहित्य प्रेमियों, साहित्य के साधक और साहित्य का अध्ययन करने वाले सभी बंधुओं को यह ब्लॉग समर्पित है।🙏🙏
सुभाष चन्द्रिका
नवम सर्ग
अहो अद्भुत यह माया लोक,
दिखायी देता है अभिराम ।
इसी में जन्म-मरण का चक्रो जी
चल रहा निशिछंच-वासर अविराम ॥
सृष्टि में मात्र मनुज गतिमान,
किन्तु शिशु सा प्रायः नादान ।
किया करता त्रुटियों दिन-रात, ऊ
और खो देता निज प्रतिनिधि ऊसम्मान ।।
यही लगता कुछ ऐसे लोग, है
जिन्हे भौतिक सुख से वैराग।
मनुज वे नहीं अपितु है देव,
स्ववैभव का भी करते त्याग ॥
उन्हीं देवी पुरुषों में एक,
मधुर व्यवहार यशस्वी वीर।
बाह्य तन वज्र हृदय नवनीत,
मुदित मुद्रा प्रायः गम्भीर
लिया जिसने विपत्ति को मोल,
छेड़ कर अंग्रेजों से जंग।
हो रहे जन्म भूमि उनमुक्त,
मिटा दे वैरी के सब रंग ।।
कौन वह मानवता की मूर्ति,
मनोयोगों का जो सम्राट।
शत्रुओं था जो का काल कराल ।
जगत से न्यारी जिसकी बार ॥
वही है नेता वीर सुभाष,
हिन्द-पतझर का जो मधुमास ।
तपन में शीतल मन्द फुहार,
तुमुल तम में जो दिव्य प्रकाश ॥
शीत लहरी में भानु समान ।
धरित्री घर फैला कर-पाश।
हरण कर लेता ठिठुरन शीघ्र,
अहो अनुपम यह दिव्य प्रकाश ॥
जहाँ पर दिखता दुख अवसाद,
वहाँ अर्जुन हित ज्यों घनश्याम ।
दिया करते गीता- उपदेश;
गीध, कपि, ऋक्ष-हेतु ज्यों राम ।
किसी नगरी के राज कुमार,
त्याग सुख - सुविधाएं ज्यों बुद्ध।
अकिंचन घूमें यथा फकीर,
दनुजता से करने को युद्ध ॥
सघन तरू घट की छाया मौन,
सभी ऋतुओं में एक समान।
सर्व जीवों के प्रति समभाव,
दिया करती समुचित अवदान ॥
सदा कर्म-रत नेता जी थे,
अपना समय न व्यर्थ बिताते ।
जब भी मिला सुअवसर उनको,
नहीं हाथ से उसे गंवाते ।।
समय देख अनुकूल उन्होंने
सिंगापुर में 'प्रेस, खरीद कर।
किया प्रकाशित पत्राकर्षक,
नाम शुभग 'आजाद हिन्द, धर ॥
उसी पत्रिका के माध्यम से,
अपने मन के विविध विचार।
प्रति दिन व्यक्त किया करते थे,
नेता जी सुवृद्धि आगार ॥
अन्य व्यवस्थाएं सब की सब,
करते रहते वीर सुभाष /
इधर हिन्द की सेना बढती,
विजय प्राप्त करती सोल्लास ॥
विजय एक के बाद दूसरी,
और तीसरी सहित हुलास ।
करते रहे वीर सेनानी,
भारत माँ के, शत्रु विनाश ॥
ताँता लगा विजय का अब तो,
जन-जन में हषोभि गहन ।
उनकी गाथा घ्रणित छोड़ दें,
जो थे देश-द्रोह मगन ।।
बहुत बड़े क्षेत्रों पर अबतक,
हुआ हमारा था अधिकार
जगह-जगह उत्सव मना रहे,
भारत-वासी विगत विकार।।
ज्यों स्वतंत्रता प्राप्त हो गयी,
थे आह्लादित भारत वासी।
मुख मण्डल से तेज प्रस्फुटित,
लुप्त हो गयी पूर्व उदासी ॥
जन-जन में थी शक्ति अलौकिका
रग-रग में उल्लास घना था।
अगर उमड़ता प्रलय सिन्धु तो,
कुम्भज भारत वर्ष बना था ।।
हाय किसी देश द्रोही ने,
सब रहस्य उद्घाटित करके,
किया विखण्डित न्याय देश का,
निज घर में आग लगा कार के ।।
उलट गयीं अब सभी नीतियाँ,
हिन्द-चमू अति लाचारी में।
कितने पीठ दिखा कर भागे,
मृतक हुए कुछ बमबारी में ।।
फिर भी वीर सुभाष चन्द्र अब,
सिंह गर्जना कर के बोले।
सुप्त निराश हिन्द सेना के,
नेत्र स्ववाणी से फिर खोले ।।
भारत वासी वीरो! सुन लो,
हमको धैर्य नहीं खोना है।
उगे बीज या नहीं खेत में,
नया बीज फिर से बोना है।।
सम्भव नहीं एक ही दल जो,
विजयी होता रहे निरन्तर ।
और न संभव पक्ष दूसरा,
रहे भागता मुँह की खा कर ॥
सिंह-नाद कर उठो जवानो !
अरि-दल में कुहराम मचा दो।
उनके सब होसले पस्त कर,
स्वर्ण महल में आग लगा दो ॥
सोते प्रहरी सजग हो उठे,
सुन सुभाष की प्रेरक वाणी।
सत्य अहिंसा महा मंत्र पर,
रिपु समक्ष बन हिंसक प्राणी ॥
शठे शाठ्यम से समाचरेत के,
नीति-पंथ पर चल दिखला दो ।।
श्वेत कुक्कुरों को स्वदेश से,
मार-काट बाहर निकाल दो ।।
विदुला ने अपने सूत को जो,
रण क्षेत्र से भग आया था।
माता के सम्मुख आ कर के,
अति लज्जित शीश झुकाया था ।।
माँ विदुला ने कातर सुत को,
मार अमोघ वाक बाणों से।
कहा का पुरुष क्यों तुमको है?
इतना मोह तुच्छ प्राणों से ॥
यदि मैं सुनती प्राण गंवाये,
रण क्षेत्र में तुमने लड़ कर।
तब में फूली नहीं समाती,
तुम सा वीर सुपुत्र प्राप्त कर ।।
गाँके प्रेरक शब्द-शब्द में,
शक्ति पयोनिधि लहराता था।
जिसमें गोता रखा विदुला सुत,
विविध रल पा उतराता था ।।
और बिना कुछ कहे- सुने ही,
समर-हेतु तैयार हो गया।
माँ - चरणों की धूल ग्रहण कर,
युद्ध स्थल के लिए चल दिया ।।
इस गाथा को हृयंगम कर,
वीरो! त्वरित प्रयाण करो।
रण-गंगा में नहा नहा कर,
भारत माँ का त्राण करो ॥
सुन उत्साह वर्तिनी वाणी,
नेता जी के मुख से निकली।
सिंह नाद कर उठे वीर सब,
यथा खिल गयी हृदय की कली ॥
जिनको आज्ञा मिली जहाँ की,
किये तुरंत प्रस्थान मुदित मन ।
तन में विद्युत समायी,
रग-रग में था ओज विलक्षण ॥
अपने-अपने लक्ष्य को पहुँच,
भारत माता के सेनानी।
झपटे श्येन समान शत्रु पर,
रखने को भारत का पानी ।।
हर मोर्चे पर हिन्द पहरुए,
विजय पताकाएं फहराते ।
घुसते बढ़ते चले जा रहे,
अरि सेना को मार भगाते ॥
लड़ते अंग्रेजी सैनिक थे,
कुछ को मार गिराते भू पर।
किन्तु पछड़ते मुंह की खाते,
भाग रहे थे प्राण बचा कर।।
धीर-धीरे भारत-सैनिक,
विजय प्राप्त कर बड़े क्षेत्र पर।
दिखा दिये निज दिव्य शक्ति को,
जगह-जगह परचम फहरा कर।
अराकान के आवाहन पर,
सदय सुभाष चन्द्र ने आकर ।
सम्बोधित कर कहा मोद से,
स्व सैनिकों में अति उमंग भर ।।
दूर बहुत ही दूर यहाँ से,
सरि, तन, गिरि-झरनों के पार।
शस्य श्यामला मातृ भूमि है,
मोहक सुषमा दिव्य अपार ॥
वही हमारा जन्म हुआ है,
करे वहीं फिर से प्रस्थान ।
भारत हमें पुकार रहा है,
चलो त्वरित हे वीर जवान।।
दिल्ली और देश के वासी,
माताएं सब रहीं पुकार।
उठो समय मत व्यर्थ गंवाओ,
उगे तुरंत भारक हथियार 11
अरि सेना को चीर बनायेगे,
हम अपना मार्ग प्रशस्त ।
जब सेना हुंकार भरेगी,
बेरी भागेंगे हो त्रस्त ॥
दिल्ली का पथ स्वतंत्रता पथ,
वीरों। मेरा दृढ़ विश्वास ।
दिल्ली चलो विलंब हो रहा,
चल कर करो शत्रु का नाश ॥
सिंगापुर में सागर-तट पर,
भारत के सैनिक बलिदानी।
उनके स्मारक बनवा कर के,
लिख कर उनकी अमर कहानी ।।
श्रद्धा सुमन चढ़ा चरणों पर,
नयन-नीर से तर्पण कर के।
मौन कुछ समय दीप जलाये
ध्यान सुवर्ति स्नेह उर भरके ॥
हा। दुर्भाग्य पुनः भारत का,
आकर के सिर पर मंडराया।
एक देश द्रोही अधिकारी-
ने, अपना घर स्वयं जलाया।
सारा भेद उजागर करके,
महा क्रान्ति की रीढ़, तोड़ दी।
वेगवती धारा की गति यों,
उस कायर ने सहज मोड़ दी ॥
आग लगायी थी जो उसने,
धू-धू करती विकट रूप घर
बढ़ती रही अनवरत आगे,
दृश्य दिखाती थी प्रलयंकर ॥
जिसके कारण हिन्द चमू पर,
आयी विपदा अति भयकारी।
होने लगी अचानक उन पर,
नभ-पथ से भीषण बमबारी ॥
लगे कमांडर स्थान बदलने,
अपने-अपने मन अनुकूल ।
यह दुर्दिन का विकट समय था
हुई प्रकृति भी अति प्रतिकूल ॥
उधर चीन, अमेरिका ने भी,
अँग्रेजों से मिल कर युद्ध।
छेड़ कर दिये शत्रु संसाधन ।
हिन्द-सैन्य का पथ अवरुद्ध ॥
इधर जापानी सैनिक वीर,
शत्रुओं से हो कर भयभीत ।
छोड कर हिन्द देश का साथ,
किसी के भी न रह समे मीत ॥
बर्मा की रक्षा-हेतु सजग,
भारत के सैनिक हृदय खोल ।
बढ़ते ही जाते थे आगे ।
भारत मां की जय-विजय बोल ।।
जापान न साथ दे रहा था
इसलिए समस्या थी दुरंत ।
लगता था अभी नहीं होगा,
इन विपदाओं का शीघ्र अंत ।।
इसी समय नेता आ पहुंचे।
सभी हो गये भाव-विभार।
ज्यों घन-घटा निहार विपिन में,
नाच उठे हो हर्षित मोर ॥
इसी बीच अरि अँग्रेजों ने,
पिनविन पर अधिकार कर लिया।
लड़ते-लड़ते आगे बढ़ कर
हिन्द-चमू को पस्त कर दिया //
फिर सुभाष से शाह नवाज ने,
मिल कर किया विचार विमर्श ।
चाहे जो हो फिर करना है,
रिपु से हमे घोर संघर्ष ॥
कुछ ही समय बीतने पर फिर,
कर्नल सहगल ने बतलाया ।
वैरी भाग रहे मोर्च से,
अवसर पुनः हाथ में आया ।।
लड़ते हुए हताश विपक्षी,
पोछे हटते गये निरंतरर
अपने सैनिक भी आहत थे
पर प्रसन्न थे विजय प्राप्त कर ॥
शक्ति समन्वित अरि सेना अब
कर के विकट व्यूह की रचना,
घेर लिया भारत-सेना को,
जिससे कठिन निकल कर बचना ।।
घोर युद्ध से उभय पक्ष के,
हुए हताहत बहु सेनानी।
किसी तरह पर भारत-सैनिक,
बचा सके अपना शुचि पानी ।।
थी सब में घोर निराशा,
छायी थी अधिक उदासी ।
संयत सुभाष यों बोले,
हे वर्मा हिन्द निवासी ॥
हैं एक बार हम हारे,
फिर विजय-पताका फहरी।
अब लक्ष्य-समीप खडे हम,
आशा है निश्चित गहरी ।।
आशा ही जीवन पथ है,
उस पर चल धीर यशस्वी।
पा लेते प्राप्य सुनिश्चित,
ज्यों तप-रत मोक्ष तपस्वी
कारण न दीखता कोई,
कि स्वसाहस छोड़ पराये।
आजाद हिन्द अब होगा,
आशा की ज्योति जगायें ।।
विश्वास दिलाता हूँ मैं,
तुमको हे। वीर जवानों ।
आजादी अब कर गत है।
मेरी ये बातें मानो ॥
आजाद हिन्द सेना को,
फिर नेता जी ने तत्क्षण ।
समझाया वीरो ! तुमसे,
भयभीत दीखता अरि गण ॥
इस लिए निराशा त्यागे,
आशा के दीप जलाओ।
जो वैरी सम्मुख आयें,
उनका अस्तित्व मिटाओ ।।।
मैं हार मानने वाला,
हूँ कभी नहीं जीवन में।
पथ में अनेक वाथाएँ,
आयी पर व्यथा न मन में ।।
परचम पवित्र भारत का,
सम्मान व मर्यादाएँ।
मैं सौप तुम्हारे कर में,
वीरों की परंपराएं ॥
मुझ सा आशावादी बन,
करना विश्वास निरंतर ।
हे तुमुल तिमिर ऊषा की,
सूचना पूर्व अति सुरखकर ॥
भारत स्वतंत्र होगा ही,
इसमें दो राय नहीं है।
नैया तट पर पहुंची है,
हमको विश्वास यही है।।।
उड़ते पक्षी के पीछे,
कितने है श्येन निर्दयी।
कब चंगुल में कस भार्गे,
है दुर्घटना नहीं नयी ।।
यदि हुआ तो कभी आकर
पुनः तुम सब से मिलूंगा।
देख श्रम फल को तुम्हारे
मैं पुष्प समान खिलूँगा।।
यदि होगा तो फिर आ कर,
तुम सब से पुनः मिलूंगा
अवलोक तुम्हारे श्रम-फल,
मैं पुष्प समान खिलूंगा ।।
अब दो विदा विलम्ब हो
रहा मुझे दूर है जाना।
कौन जानता प्रभु की माया,
फिर कब होगा आना ॥
ले कर विदा चले स्वजनो से,
नेता घीर सुभाष ।
मानो सिधि खड़ी हो सम्मुख,
रग-रग में उल्लास ॥
इति
नवम सर्ग
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यूपी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य
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हिन्दी साहित्य की कुछ मिलती-जुलती नामों वाली रचनाएँ।।।। कफ़न (कहानी) प्रेमचंद तिरंगे कफ़न (कहानी) अमृत राय कफ़न खोर (उपन्यास) बटरोही अपर...
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सन् साठ के बाद भारतीय जनता में निराशा की भावना बढ़ने लगी थी । समाज एवं राजनीति में चारों और हाहाकार मचा हुआ था । आम आदमी गरीबी, महंगाई आदि ...
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Samas(Compound)(समास) समास(Compound) की परिभाषा- अनेक शब्दों को संक्षिप्त करके नए शब्द बनाने की प्रक्रिया समास कहलाती है। दूसरे अर्थ ...