सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हिन्दी की कुछ पत्रिकाएं

उदन्त मार्तंड- साप्ताहिक30 मई 1826कलकत्ताजुगल किशोर
2बंगदूत- साप्ताहिक1829कलकत्ताराजा राम मोहन राय
3प्रजामित्र- साप्ताहिक1834कलकत्ता
4बनारस अख़बार-साप्ताहिक1845बनारसराजा शिव प्रसाद सिंह
5मार्तंड- साप्ताहिक1846कलकत्तामो. नसीरुद्दीन
6सुधाकर- साप्ताहिक1850काशीबाबु तारा मोहन मित्र
7बुद्ध‌‍ि प्रकाश1852आगरामुंशी सदासुखलाल
8प्रजा हितैषी1855आगराराजा लक्ष्मण सिंह
9कवि वचन सुधा- मासिक1868काशीभारतेंदु
10हरिश्चन्द्र मैगजीन- मासिक1873बनारसभारतेंदु
11बाल बोधनी- मासिक1874बनारसभारतेंदु
12काशी पत्रिका- साप्ताहिकअलीगढ़बलदेव प्रसाद
13भारत बंधु- साप्ताहिकअलीगढ़तोता राम
14भारत मित्रकलकत्तारूद्र दत्त
15हिंदी प्रदीप- मासिक1877प्रयागबाल कृष्ण भट्ट
16आनंद कादम्बिनी- मासिक1881मिर्जापुरबदरी नारायण चौधरी
17भारतेंदु1884वृंदावनपं. राधा चरण गोस्वामी
18देवनागरी प्रचारकमेरठ
19प्रयाग समाचारलखनऊदेवकी नंदन त्रिपाठी
20ब्राह्मण- मासिक1883कानपुरप्रताप नारायण मिश्र
21हिन्दूस्तान- दैनिकइंग्लैंडराजा रामपाल सिंह
22इंदु- मासिकलाहौर
23नागरी नीरद- साप्ताहिकमिर्जापुरबदरी नारायण चौधरी
24नागरी प्रचारिणी पत्रिका- त्रैमासिक1896काशीवेणी प्रसाद
25उपन्यास- मासिक1898काशीगोपाल राम गहमरी
26सरस्वती- मासिक1900काशी, बाद में इलाहाबादचिंतामणि घोष/ श्याम सुंदर दास (1902)/ महावीर प्रसाद द्विवेदी (1903)
27सुदर्शन- मासिक1900काशीदेवकीनंदन/माधव
28समालोचक- मासिक1902जयपुरगुलेरी
29अभ्युदय- साप्ताहिकप्रयागमदन मोहन मालवीय
30इंदु- मासिक1909काशीप्रकाश कुमार उपाध्याय
31मर्यादा- मासिक1909प्रयागकृष्ण कान्त मालवीय/संपूर्णानंद/ प्रेमचंद
32प्रताप- साप्ताहिक1913कानपुरगणेश शंकर विद्यार्थी
33चाँदमहादेवी वर्मा
34प्रभा1913खंडवा, बाद में कानपुरकालू राम, बाद में कानपुर में बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’/माखनलाल चतुर्वेदी
35माधुरी1922लखनऊदुलारे लाल भार्गव/ रूप नारायण पांडेय/ कृष्ण बिहारी मिश्र/ प्रेमचंद(1928-31)
36सुधा- मासिक1929लखनऊदुलारेलाल भार्गव
37कल्याण1925गीता प्रेस- गोरखपुर-
38विशाल भारत- मासिक1928कलकत्ताबनारसीदास चतुर्वेदी
39हंस(1)-1930 ( 2) 1984 "(१)-बनारस (२)-दिल्ली(1)- प्रेमचंद (2)- राजेन्द्र यादव
40आदर्श + मौजीकलकत्ताशिव पूजन सहाय
41साहित्य सन्देश- मासिक1937आगराबाबू गुलाब राय
42मतवाला- साप्ताहिक1923कलकत्तामहादेव प्रसाद सेठ/ शिव पूजन सहाय/ निराला
43जागरण- साप्ताहिक132बनारसशिव पूजन सहाय/ प्रेमचंद(1932)
44भारत- अर्धसप्ताहिकइलाहाबादनंद दुलारे वाजपेयी
45नवजीवन- साप्ताहिक  1921अहमदाबादगाँधी
46देश- साप्ताहिक1920पटनाराजेन्द्र प्रसाद
47कर्मवीर- साप्ताहिक1924जबलपुरमाखनलाल चतुर्वेदी
48कहानी, नई कहानियाँ, उपन्यासभैरव प्रसाद गुप्त
49सैनिकआगराकृष्ण दत्त पालीवाल
50प्रतीक- दृमासिक1947इलाहाबादअज्ञेय
51रूपाभ- मासिक1938पन्त/ नरेंद्र शर्मा
52कल्पना- दृमासिक1949हैदराबादआर्येन्द्र शर्मा
53धर्मयुग- साप्ताहिक1950बम्बईधर्मवीर भारती
54आलोचना- त्रैमासिक1951दिल्लीशिवदान सिंह चौहान/ धर्मवीर भारती/रघुवंश/ साही/ नंददुलारे वाजपेयी/ नामवर सिंह
55नये पत्ते-1953इलाहाबादलक्ष्मी कान्त वर्मा/ रामस्वरूप चतुर्वेदी
56नयी कविता- अर्द्धवार्षिक1954इलाहाबादजगदीश गुप्त, रामस्वरुप चतुर्वेदी
57ज्ञानोदय- मासिक1955कलकत्ताकन्हैया लाल मिश्र
58निकष- साप्ताहिक1956इलाहाबादधर्मवीर भारती/ लक्ष्मीकांत वर्मा
59कृति1958दिल्लीनरेश मेहता
60समालोचक- मासिक 1958आगरारामविलास शर्मा
61पहल- त्रैमासिक1960जयपुरज्ञानरंजन
62क ख ग- त्रैमासिक1963इलाहाबादरघुवंश, लक्ष्मीकांत वर्मा, रामस्वरूप चतुर्वेदी
63दिनमान-साप्ताहिक1965दिल्लीरघुवीर सहाय
641-पूर्वाग्रह- मासिक 2-समास1974भोपालअशोक वाजपेयी
65वर्तमान साहित्य1984इलाहाबादविभूति नारायण राय
66कथादेश1997दिल्लीहरि नारायण
67नया खूनमध्य प्रदेशमुक्तिबोध

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

हिन्दी साहित्य की कुछ मिलती जुलती नामों वाली रचनाएं

हिन्दी साहित्य की कुछ मिलती-जुलती नामों वाली रचनाएँ।।।। कफ़न (कहानी) प्रेमचंद   तिरंगे कफ़न (कहानी) अमृत राय कफ़न खोर (उपन्यास) बटरोही अपराजिता (काव्य)~रामेश्वर शुक्ल अंचल।। अपराजिता (उपन्यास)~चतुरसेन शास्त्री।। नीली झील (कहानी)~कमलेश्वर।। नीली झील (एकांकी)~धर्मवीर भारती अर्धनारीश्वर (उपन्यास)~विष्णु प्रभाकर अर्धनारीश्वर (निबंध)~दिनकर एक पति के नोट्स (उपन्यास)~महेंद्र भल्ला एक पत्नी के नोट्स (उपन्यास)~ममता कालिया एक कस्बे के नोट्स(उपन्यास)~नीलेशरघुवंशी त्रिशंकु (कथा संग्रह)~मन्नू भंडारी त्रिशंकु (नाटक)~ब्रजमोहनसिंह त्रिशंकु (निबंध)~अज्ञेय अनित्य (उपन्यास)~मृदुला गर्ग अनित्य (कहानी)~ बदी उज्जमा पंच परमेश्वर (कहानी)~प्रेमचंद पंच परमेश्वर (कहानी)~रांगेय राघव झूठा सच (उपन्यास)~यशपाल झूठ सच (निबंध)~सिया राम शरण गुप्त काली आँधी (उपन्यास)~कमलेश्वर पीली आँधी (उपन्यास)~प्रभाखेतान द्रौपदी (प्रबंध काव्य)~नरेंद्र शर्मा द्रौपदी (उपन्यास)~प्रतिभा राय द्रौपदी (नाटक)~सुरेंद्रवर्मा बाँधो न नाव इस ठाँव (उपन्यास)~उपेन्द्र नाथ अश्क बाँधो न नाव इस ठाँव (काव्य)~निराला सं...

सठोत्तरी कविता

 सन् साठ के बाद भारतीय जनता में निराशा की भावना बढ़ने लगी थी । समाज एवं राजनीति में चारों और हाहाकार मचा हुआ था । आम आदमी गरीबी, महंगाई आदि अनेक कारणों से शोषण की चक्की में पिसा जा रहा था । जिसके कारण जनमानस विचलित हो गया था । राजनीति के मूल्य विघटन ने भाई-भतीजावाद एवं कुर्सीवाद को प्रोत्साहन दिया । देश एवं आम आदमी के प्रगति करने की जगह राजनेता, सत्ताधारी अपनी तिजोरियाँ भरने लगे। सन् १९४७ में स्वतंत्रता के समय भारत-पाक बटवारा, शरणार्थियों की समस्या, सन् १९६२ में चीन से युद्ध, १९६५ और १९७१ में पाकिस्तान से हुए युद्धों के कारण भारत की आर्थिक स्थिति और दयनीय बनती गई । इन तीनों युद्धों ने भारत को एक महत्त्वपूर्ण सबक सिखलाया और हमारी अनेक कमजोरियों हमें अवगत कराया । वही दूसरी ओर राजनीतिक भ्रष्टाचार, सामाजिक कुरीतियाँ, पाखण्ड अंधश्रद्धा, उँच-नीच आदि के कारण देश में अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी । चुनाव जीतने के समस्त नारे कुर्सी हथियाने के बाद खोखले साबीत हुए । इन परिस्थितियों ने युवा पीढ़ी में कुंठा, निराशा, विद्रोह और आक्रोश को भर दिया । जिसके साक्षात्कार हमें साठोत्तरी काव्य में ह...

निराला का मानवतावाद

आज मानवतावाद ज्वलंत विषय है। इस विषय पर बड़े-बड़े सेमिनार होते हैं, चर्चाएं होती हैं एवं गोष्ठियां आयोजित की जाती हैं। इन सबके द्वारा इस बात को परखने का प्रयास किया जाता है कि मानवदावाद आखिर है क्या? इसे समाज में कैसे स्थापित किया जाए? जबकि हिन्दी साहित्य की मूल चेतना ही मानवतावादी है। इसमें मानवजीवन के प्रत्येक मूल्यों को बारीकी से जांचा-परखा गया है। मानवतावाद के प्रति सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला का अपना एक अलग दृष्टिकोण रहा। वे जब मानव की बात करते थे तो सबसे पहले दुखी-पीड़ित मानवता के प्रति उनकी संवेदनाएं मुखर होती थीं। ‘निराला’ का मानवतावाद सदा प्रासंगिक है। भारतीय दर्शन, संस्कृति एवं साहित्य में मानवतावादी तत्व सनातनकाल से विद्यमान रहे हैं। साहित्य में मानवीय चेतना लेखनी की प्राणवाहक का काम करती है। जिसे सुख का आनंद और दुख की पीड़ा सतहीतौर पर हो वह अपने अनगढ़ विचार उद्घाटित तो कर सकता है किन्तु साहित्य सृजन नहीं कर सकता है। हिन्दी साहित्य की मूलचेतना ही मानवतावादी है। इसमें मानव जीवन के प्रत्येक मूल्यों को बारीकी से जांचा-परखा गया है। आधुनिकयुग के साहित्यकारों में महाप्राण कहे जाने वाले...