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सुभाष चन्द्रिका

सप्तम सर्ग


ग्रीष्म दुपहरी में नभ से था, 
बरस रहा भीषण अंगार।
जीव जन्तु सब खोज रहे थे, 
शीतल छाया मंद बयार ।।

जीभ निकाले श्वान हांफते, 
दौड़ रहे थे वे बेहाल ।
ऊपर उदर किये बैठे थे, 
भूखे प्यास विकन विडाल ।।

कीट पतिंगे व्याकुल रहते, 
खग कुल के होते आहार।
बैठ किसी तरु की डाली पर, 
समय बिताते खग लाचार ॥

ताप-तप जल से बाहर आ, 
गेंडे खोज वृक्ष की छाँव।
हाँफ हाँफ कर दिवस बिताते, 
विहुल पाण ग्रीष्म के माह ॥

जल के लिए प्यास के मारे, 
व्याकुल मृग दौडे चहुँ ओर।
फिर निराश लौटते तुरंत ही,
हारे थके लगा कर जोर ।।

मृग मरीचिका की यह माया, 
इसमें नहीं किसी का दोष ।
आग उगलते सूरज को क्या?
होता है इससे संतोष ॥

इस शाखा से उस शाखा पर, 
उछल-कूद कपि थे बेहाल ।
प्यास मृत्यु को लेकर आयी, 
गला दबाये भीषण काल ॥

सरिताओं के हृदय क्षुब्ध थे 
देख भानु का अत्याचार । 
शक्ति क्षीण थी विवश सोचती, 
चलो करें हम मिल उपचार ॥

मानो भू की हरी शाटिका, 
हुई भानु कर से जल क्षार) 
जिससे चिंतित धरती रहती, 
व्याकुल नत सिर हो लाचार ।।

धीरे-धीरे भीषण गर्मी, 
अब कुछ शान्त लगी होने ।
चले जीव सब प्यास बुझाने, 
तथा उदासी निज खोने ॥

छिपी विवर में पिपीलिकाएँ; 
निकट देख रवि का अवसान।
आश्वासन सा देती मानो।
त्याग निराशा बढ़ो जवान ॥

एक पुरुष चिन्तित मुद्रा में, 
देख रहा था सब कुछ मौन।
कब तक रवि उगलेगा पावक,
इसे बताने वाला कौन ?

स्वयं बता कर लुप्त हो गया 
बरसाता पावक मार्तण्ड।
क्यूंकी जलाने जो चलता जग,
वही भोगता दण्ड प्रचण्ड ||

सोचा नेता जी ने मन में, 
लख रवि का पश्चिम प्रस्थान ।
हुए पूर्ण आश्वस्त भगेंगे, 
निश्चित भारत से शैतान ।।

वर्लिन में जब थे नेताजी,
रास बिहारी ने लिख पत्र ।
भेजा स्वयं टोकियो रह कर 
मुझसे मिले शीघ्र जन मित्र ।।

पढ़ा पत्र नेता सुभाष ने, 
जिसका लक्ष्य मात्र था एक, 
मिलें सुभाष टोकियो में आ 
जिससे हो वारताएं नेक ॥

उत्तर लिख भेजा सुभाष ने। 
करूंगा मैं अतिशीघ्र प्रयास ।
कुछ आवश्यक कार्य शेष हैं; 
कर के होगा फिर प्रस्थान ॥

करके सब कार्यों को पूरा, 
सेना को कर सजग समान।
चलने से पहले वर्लीन से, 
नेता वीर सुभास महान ॥

स्वसैनिकों को कर सम्बोधित, 
प्रकट किये निज मन के भाव । 
" वीर सैनिको मन में जो हो, 
उसमें रंच न करो दुराव ।।

मैंने जन्म लिया है केवल, 
करने हित भारत उद्घार ।
तब तक कर्म करूंगा अविचल, 
जब तक सिर से टले न भार"

बोलो वीरो ! जो कठिनाई, 
हो समक्ष अतिशय विकराल ।
दूर करूँगा यथा शक्ति मैं, 
मन, वाणी, क्रम से तत्काता ।।

यद्यपि है विश्वास मुझे यह, 
दृढ़ प्रतिज्ञ तुम हो मतिमान ।
कितने ही भीषण वैरी हों, 
कार करोगे तुम खलिहान ।।

लक्ष्य तुम्हारा एक यही हो, 
हे। भारत माता के लाल।
तुम न तनिक भी विचलित होगे, 
भले खड़ा हो सम्मुख काल ॥

जैसे भी भारत स्वतंत्र हो, 
कर लोगे तुम वैसा काम ।
तन, मन, धन सब कुछ देकर भी, 
लक्ष्य न चूकोगे अविराम ।।

वीर! लक्ष्य पूर्ण हों,
 इन्हीं कामनाओं के साथ।
विदा ले रहा हूँ मैं तुमसे ।
पुनः बढ़ाने हेतु स्वहाथ //

नयनों से हर्षअश्रू छलकते, 
अंग-अंग उल्लास अपार ।
 दे कर विदा स्व नेताजी को,
 नमन किया फिर बारम्बार ॥

हर हिटलर, से मिल कर के फिर, 
अन्य जनों से मिले सुभाष । 
अब जाना है मुझे टोकियो, 
कह चल पड़े मुदित सोल्लास ।

कर्नल हसन संग नेता ने 
किया टोकियो को प्रस्थान /
ध्वनि करता विमान नभ पथ से, 
चला वेग से पवन समान ॥

कुछ ही समय बिता कर पहुंचा, 
नगर टोकियो नभचर यान।
 उतर यान से चले लक्ष्य को, 
कर्नल हसन सुभाष महान ॥

आया देख सुभाष चन्द्र को, 
रास विहारी अन्य अनेक । 
हिन्द मूल के प्रतिनिधियों ने 
स्वागत किये विविध विधि नेक ।

माल्यार्पण कर नेता जी को 
करके विविध भाँति सत्कार ! 
आगत - स्वागत कर जनता ने 
किया मुदीत मन जय-जय कार ।।

रह करके कुछ समय टोकियो,
 में, नेता सुभाष बहु काम।
साहस धीरज मनो योग से,
 करते रहे सदा अविराम //

अंग्रेजी शासन में जितने -
थे, अधिकारी पद आसीन 
वे सब नेता जी के सम्मुख, 
बिखते थे अति दीन मलीन ।।

इसी लिए एकान्त जगह में,
 बैठ रचा करते थे जाल। 
जिसमें फँस भारत की सत्ता 
रहती थी निशि दिन बेहाल ।।

सम्बोधित कर के जन-जन को, 
श्री सुभाष ने अपने भाव 
प्रकट किये जिससे सब के ही
 बदले सारे पूर्व स्वभाव ॥

देखा जब नेता सुभाष ने, 
उनका कथन की सभी को मान्य/
और सभी तैयार निछावर – 
करने हित अपना धन-धान्य ॥

पुनः किया आरम्भ मुदित मन, 
निज प्रभावशाली वक्तव्य ।
 " मेरे हृदय धाम के बासी, 
अब है दूर नहीं गन्तव्य ॥

प्राप्त हुआ अवसर यदि चूके। 
तो होगी यह भारी भूल।
 अब तक का सब किया-कराया, 
मिल जायेगा निश्चित धूल //

पिछले महा युद्ध में हमको, 
दिया गया धोखा भरपूर
जिससे सारे कार्य हमारे,
हुए अचानक चकनाचूर ।।

ऐसा अवसर सौ वर्षों में, 
हमे मिलेगा क्या विश्वास ?
अतः पूर्ण स्वातंत्र्य प्राप्त हो,
अब करना है यही प्रयास ।।

हम अपना सर्वस्व होम कर, 
लेंगे निज मौलिक अधिकार।
और शत्रु को उत्तर देंगे, 
हथ इंट का पत्थर मार ॥

मिला सुअवसर हमको जो है,
 उसे नहीं अब खायेंगे। 
भारत माँ की मुक्ति के लिए, 
अब रह सजग रहन सोएंगे ।।

अंग्रेजी शासन का जब तक, 
रबि न अस्त हो जायेगा।
तब तक युद्ध हमारा उससे, 
सहज नहीं रुक पायेगा ॥

विजय हमारी होगी निश्चित, 
है इसमें संदेह नहीं।
अतः हमे बढ़ते रहना है, 
हो अपना संकल्प यही ॥

जापानी अधिकारी गण से, 
पा सहयोगी आश्वासन, 
नेता जी अब अति प्रसन्न थे,
खिले हृदय के भाव सुमन ।।

फिर सुभाष ने नभवाणी से, 
किया प्रसारित निज भाषण
"देश वासियो? उठो शत्रु को।
मार भगाने का कर प्रण

मैं यह जान रहा हूँ सम्यक, 
स्वार्थी कुछ भारत-वासी । 
अंग्रेजों थे वशी भूत हो, 
चढ़ा रहे हमको फाँसी ॥

नही भी मिलें देश-द्रोही, 
उन्हे निकालो भारत से।
कर दो ऐसी दशा खलों की,
दर-दर घूमें भारत से ॥

देश वासियो ! यही कहूंगा, 
तुम मुझ पर विश्वास करो।
मृत्यु साथ सब ले कर आये, 
अतः राष्ट्र के लिए मरो ॥

अंग्रेजी शासन प्रचण्ड है,
 जिसके सम्मुख सब निर्बल । 
अतः मुझे पग-पग दंडित कर
 दिख लाते हैं अपना बल ॥

मुझको प्रायः अपराधी कह,
हवा खिलायी कारा की।
जैसे पिजड़े में बन्दी शुक-
की दुर्गति, बिन चारा की ।।

वार ग्यारह बंदी करके, 
की मेरी दुर्गात भारी।
जिसके कारण मुझको ग्रसती -
थी, अति भीषण बीमारी ॥

पर मुझको पद्म च्यूत करने में,
 उसे सफलता मिली नहीं।
जिस प्रकार भी विजय प्राप्त हो,
 मात्र लक्ष्य हो एक यही ॥

छलिया वनचर शक्ति समन्वित, 
आंग्ल-शासकों की माया। 
हमे भ्रष्ट करने में असफल, 
यद्यपि नाना व्यूह रचाया ।।

भीतर के हैं या बाहर के,
 जितने भारतीय भाई,
 मिल कर सब ने संघ बनाया,
 हम सब को जो सुखदाई ॥

मैने बार-बार बतलाया, 
जब शुभ अवसर आता है।
तब भारत माँ के भक्तों का, 
जुडता उससे नाता है ।।

भारत वासी अब स्वतंत्र हो, 
शीघ्र मधुर फल पायेंगे। 
खोल जेल के दरवाजे फिर, 
स्वजनों को बाहर लायेंगे ।।

विजय प्राप्ति की प्रसन्नता में, 
उत्सव समय मनायेंगे।
और स्वमाथे के कलंक को, 
वे अति शीघ्र मिटायेंगे।।

हम स्वतंत्र हो कर युग-युग तक,
 कर भारत माँ की पूजा
 यो कृतार्थ हम हो जायेंगे, 
जय भारत मां स्वर गूंजा ॥

चौंक सभी ने मुड़ कर देखा,
 दिखे नेक भारत बासी ।
सब जय कार कर रहे आते।
जय सुभाष जय उर वासी "

आगत - स्वागत कर नेता जी,
 रास विहारी से मिल कर। 
कह सिंगापुर में मिलने को,
 वर्लिन जाने को तत्पर "

चले टोकियो से वर्लीन को,
 फिर नेता जी सहित हुलास । 
अंग-अंग में ओज भरा था। 
रोम-रोम में था उल्लास ॥



इति
 सप्तम सर्ग

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