पंचम सर्ग
भ्रकती तनी श्री चितरंजन की,
देख कुशासन का अन्याय ।
अतः विरोध-हेतु दृढ़ व्रत ले,
किया इकट्ठा जन समुदाय ।।
सम्बोधित कर जन समूह को,
रखा सम्मुख एक विचार ।
कौंसिल में प्रवेश कर करना है
दुःशासन का संहार ।
नेता जी ने पूर्ण समर्थन किया,
श्रवण कर यह प्रस्ताव।
पर कांग्रेस संगठन में थे,
बहुतों के विपरीत सुझाव ।।
गान्धी, नेहरू आदि ने कहा,
नहीं उचित है यह प्रस्ताव।
जिसके कारण काँग्रेस की,
हुआ एकता में बिखराव ।।
नरम-गरम दल दो खेमों में
बँटा कांग्रेसी समुदाय,
जिससे ऐम्य सूत्र में बंधने ।
का- अब कोई नहीं उपाय ॥
अपनी अपनी सूझ-बूझ से
दोनो ही दल थे गतिमान ।
जिससे अंग्रेजी शासन में,
मची खलबली, थे हैरान ॥
दमन- चक्र चल पड़ा कुशासन का,
उसका हौशला बुलंद ।
आह्वादित थे लीव स्वार्थ रत,
हिन्द-कलंक मान जय चंद।
जिनके संकेतों पर लुंठक,
निर्दोषों पर अत्याचार "
पकड़ मार थे, जेल भेजते,
मचा देश में हाहाकार ।।
भडक उठी थी क्रान्ति अधिक ही,
सत्ता की भी नींद हराम।
आठ पहर चौकन्ने रहते,
कब छिड़ जाय घोर संग्राम ।।
उसी समय नेता जी को भी,
बरवस भेजा कारागार।
इससे जन-मानस विक्षुब्ध था,
धधक उठा अन्तस-अंगार ।।
उधर सिंह पिंजड़े में बन्दी,
तड़प, मरज रहता लाचार ।
स्वास्थ्य दिनों-दिन बिगड़ रहा था।
उठते मन में विविध विचार ॥
मिली सूचना जब सत्ता को,
रोग ग्रस्त है सबल सुभाष ।
हर्ष-सिन्धु लहराया सम्मुख,
विजय संपदा ज्यों हो पास ॥
उदासीनता से शासन की,
कृश तन होता गया नितांत ।
ज्यों चंदन में घुन का धावा,
शुक्ल पक्ष में हो घन ध्वान्त ॥
कारागृह से नेता जी की -
मुक्ति के लिए बारम्बार
माँग की गयी तदपि न पिघती,
निर्मम अंग्रेजी सरकार ।।
विश्वसनीय चिकित्सक द्वारा.
जब शासन ने सुना निदान ।
निन्दा विप्लव के भय से अब,
बना मुक्ति के लिए विधान ॥
किया मुक्त तन क्षीण,
केसरी बाहर आया।
मुक्त पवन में श्वास,
लिया, अनुपम सुख पाया ।।
नव वसन्त को प्राप्त,
यथा मधुकर हर्षाया !
कृश तन फिर भी दिव्य-
तेज आनन पर छाया ।।
जन्म भूमि के दर्शनार्थ,
आकुलता छायी।
एक-एक पल का विलम्ब
था अति दुख दायी ॥
स्वजनों ने कर पूर्ण-
व्यवस्था का बतलायी।
सुनते ही संदेश,
हृदय कलिका मुस्क्यायी ॥
मातृ-भूमि के अंक,
पहुंच शैशव पुख पाये ।
जन परिजन को देख,
अम्बु अम्बक छलकाये ।।
उमड़ी भीड़ अधार,
श्रवण कर, नेता आए।
शीघ्र स्वस्थ हो जायें।
रोग-मुक्त हो लक्ष्य,
प्राप्ति के लिए चढ़ाई।
की, शासन ने सोध,
विपत्ति पुनः मंडरायी ।।
जहाँ कहीं भी क्रांति
पक्ष के, दिये दिखायी।
दे शारीरिक दण्ड
जेल की हवा खिलायी ।।
दमन चक्र को देख,
कुशासन का दुखदाई।
क्रान्ति- क्रान्ति सामान्य,
हिन्द-जनता चिल्लायी ।।
सुप्त जवानी ने फिरसे-
अब ली लंगड़ाई
वज प्राणों का मोह,
समर दीपिका जलाई ।।
नेता जी चुप-चाप, बैठने वाले का थे।
देश के लिए पूर्ण समर्पित निशि-दिन जब थे।
अतः हृदय में शूल, आंग्ल संत के अब थे।
क्यों कि प्रभावित उत्तेजक भाषण से सब थे ॥
उत्तेजक व्याख्यान नित्य देने के कारण।
प्रायः शासन जेल भेजता उन्हें अकारण।
लक्ष्य प्राप्ति के हेतु, रहा हो जिसका दृढ़ प्रण।
कारागृह उस व्यक्ति लिए था साधारण ।।
किन्तु रोग की मार, सहायक बन कर आयी।
जग-निन्दा भयभीत आंग्ल सत्ता धराई।
जिससे करनी बार-बार धी पड़ी रिहायी।
शासन था अब खिन्न विपत्ति शीश मंडरायी।।
लगा असत आरोप स्वगृह में ही एकाकी।
रहने का आदेश, दिया, थी अद्भुत झाँकी।
घर के चारों ओर सैनिकों का था पहरा
सन्नाटा थो घोर वायुमण्डल था बहरा ।।
घर के भी जो लोग, चाहते जा कर मिलना ।
था ससक्त प्रतिबन्ध, कहाँ का मिलता जुलना ।
रहने लगे उदास, सोच कर मन में आता।
कोई नहीं उपाय, मुक्ति का वाम विधाता ॥
माँ दुर्गा का ध्यान, एक दिन किया व्यथित मन ।
मातः दो वरदान, नरक से उबरे जीवन ।
है समाज ही प्राण, मीन का जैसे पानी।
उससे ही रह दूर, जिये कैसे वह प्राणी ॥
अब तो नहीं उपाय, दीखता मुझे मुक्ति का ।
मात्र सहारा एक, तुम्हारी दिव्य शक्ति का।
करो न अम्बे देर, निकालो इस कारा से।
जोड़ों माँ अतिशीघ्र, मुझे बढ़ती धारा से ।।
कुछ क्षण के पश्चात, उमड़ कर आँसू धारा।
चली सिन्धु के पास, मिलन का लिये सहारा।
मन्दिर हुआ प्रदीष्ट, ज्योति अद्भुत थी छायी।
शक्ति स्वयं साकार, रूप धारण कर आयी ।।
पुलकित हुए सुभाष, हृदय की कली खिल गयी
मानो मिला स्वराज्य, विश्व सम्पदा मिल गयी।
उमड़ पड़ा वात्सल्य, फेर कर हाथ शीश पर
हुई लुप्त वह मूर्ति, हृदय संतोष मोद भर ॥
हृदय भरा आह्लाद, मुदित मन मोर नाचता
यथा लक्ष्य प्रत्यक्ष, देश का भाग्य वांचता ।
"एक मास पर्यन्त, साधना लीन रहूँगा।
सुख-दुख एक समान, निरन्तर समुद्र सहूंगा ।।
और नहीं इस बीच, किसी से कभी मिलूंगा।
यही प्रतिज्ञा एक, मिलूंगा जब निकलूंगा।
यह घोषणा अपूर्व, लिखित बाहर टंगवाया।
खान पान का पूर्ण तरीका भी बतलाया ॥
जब खटकाता मृत्य, द्वार थाली के मर में।
खुलता तनिक कपाट, अंधेरा रहता घर में।
खिसका देता शीघ्र, अशन थाली को भीतर।
हो जाता फिर बन्द द्वार नीरव बन्दी घर ॥
धीरे-धीरे एक, मास, की बीती बेला।
होते आधी रात, उन्होंने नाटक खेला।
घर का पिछला द्वार, खोल उपवन में आकर।
देखा चारों ओर, सजग आँखें दौड़ा कर ।।
था दुष्कर दीवार, लांघ कर बाहर जाना।
और सुरक्षित लक्ष्य, सिद्धि के पथ को पाना।
सहसा आया ध्यान, आम्र-तरू ऊपर चढ़ कर ।
हो सकता हूँ पार, वहाँ से कूद भूमि पर ।।
था अपूर्व उत्साह, लपक कर चढ़े वृक्ष पर।
उत्तर गये अति शीघ्र, भित्ति पर मुदित कूद कर
अब न रहा कुछ शेष, छलांग एक थी बाकी।
नीरवता थी देख, रही अद्भुत यह झाँकी ।।
इधर-उधर अवलोक, कूद भूतल पर आये।
चले मौलवी राज, मार्ग से वेश बनाये।"
हुई धम्म भावाज, श्रवण कर चिहुँके प्रहरी।
दिखा एक माजार, मिट्टी तब शंका गहरी
मार्ग रहा सुनसान, मौन थीं सभी दिशाएँ।
सक्रिय केवल एक, पथिक लेकर आशाएँ।
ठमका सम्मुख देख, आ रहे गस्ती बाले ।
रुका निकट आ यान, कहा, ओ कुत्ते काले।।
नई जानता डैम, यहाँ पर आना-जाना ।
शख्त मना है चोर, लूटने चला खजाना।,
या अल्लाह। पठान मुझे डेरे पर जाना।
अब न कभी इस राह हमारा होगा आना ।।,
"भाग यहाँ से जल्द, नई गलती दुहराना।
छोड़ रहा हम आज, तुझे फिर कभी न आना),
कह कर उड़ा द्विचक यान सुभाष मुस्काये।
झोंक आँख में धूल, लक्ष्य हित परग बढ़ाये ।।।।
अति प्रसन्न थे आज, कुयोग समाप्त हो गया।
बढ़ने लगे सवेग, लक्ष्य ज्यों प्राप्त हो गया।
पहुँच गये कुछ दूर, नहीं थी चिंता कोई।
प्राप्त, हुई ज्यों वस्तु, युगों से जो थी खोई।।
इधर निशि बीती हुआ प्रभात,
मृत्या आया ले कर जलपान ।
खुला देखा कारा का द्वार
चकित चिल्लाया हो हैरान ।।
दौड़कर एक सिपाही मौन,
आ गया कारागृह के पास।
धड़कते हृदय चकित चहुँ ओर,
देख बोला हो अधिक उदास "
निकल कर कारा से चुप चाप।
न जाने कहाँ भग गया चोर।
निरीक्षण कक्ष वाटिका आदि
का किया, गया कहाँ किस ओर
प्रहरियों की आखों में धूल,
झोंक कर निकल गया दुर्दान्त ।
कहाँ जायेगा छिप कर नीच।
नहीं हम बैठेंगे रह शान्त /
फोन कर चारों ओर प्रचार।
जेल से निकल गया चुप-चाप ।
भगा अज्ञात दिशा की ओर ।
बढ़ा शासन के उर संताप ।।
नहीं जाने पाये वह चोर,
झोक सब थी आँखों में धूल ।
निकल भागा मायावी नीच,
पकड़ लें करें न इसमें भूल ॥
इधर चौकन्ना भारत वीर,
लगा बढ़ने ज्यों झंझावात ।
रेल, बस बग्घी पैदल धीर,
रहा चलता सलक्ष्य दिन-रात ॥
पहुंच पेशावर सीमा पार किया,
पहुँचा काबुल सोल्लस ।
प्राप्त कर भगत राम का प्यार।
बढ़ी मन आशा अधिक हुलाए।
उत्तम चन्द्र भगत का पाकर,
नेता जी हार्दिक सहयोग /
थे प्रसन्न ज्यों सिद्ध हुआ हो,
महा तपस्वी का तप योग ।।
जर्मन इटली के शास्ताओं-
से मिल कर स्व लक्ष्य की ओर।
बढ़ने लगे सिद्धि ज्यों सन्मुख,
मिटी निराशा बाधा घोर ।।
किये बिना विश्राम, निशिदिन चिन्तन-मग्न रह।
आगे का संग्राम, निर्णायक हो फिर तरह ॥
इति
पंचम सर्ग।
टिप्पणियाँ