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सुभाष चन्द्रिका

षष्ट सर्ग

बीती रजनी तमन्चुर बोले, 
स्वप्न लोक से लौटे लोग।
हेम कलश ले उषा चल पड़ी,
वितरित करने, शुभ-सुख भोग।

सजी वाटिका रंग-विरंगी, 
अति कुल का करती आव्हान ।
मधु बरसातीः सुरभि लुटाती, 
करने हेतु जीव कल्याण ॥

खग- मृग जग कर विनती करते, 
हे परमेश्वर! जग के नाथ।
मानव-कुल से रक्षा करिये, 
बढ़ा दया का अपना हाथ ॥

शीतल, मंद, सुगन्ध वायु बह, 
नव स्फूर्ति भरती अविरल ।
जगे चराचर निद्रा त्यागे, 
देख प्रकृति का रूप विमल ।।

कर्म क्षेत्र में उतर पड़े अब, 
सब में बढ्ने का उत्साह ।
अपनी-अपनी राहों पर चल, 
वेग रहा ज्यों सरित-प्रवाह ॥ 

एक पुरुष ने चिन्तन रत रह, 
जाग बितायी सारी रात ।
ओर समझ कर बिस्तर छोड़ा, 
बीती रात हो गया प्रात ॥ 

बना योजना हर हिटलर से,
मिलने की फिर से तत्काल ।
जिससे भाग हिन्द देश से, 
सारे श्वेत भूत बैताल ॥

मिले सुभाष चन्द्र हिटलर से, 
उसने ललक मिलाया हाथ।
भूरि प्रशंसा कर के बोला, 
"हम हैं वीर तुम्हारे साथ ।। 

पर ही एक बात से चिंतित, 
जिससे हूँ अत्यधिक अधीर ।
वैरी के बन मित्र लड़ रहे, 
हमसे भारत के रणधीर ।।

समाधान अति कठिन, न दिखता -
इसका कोई सहज निदान ।
कैसे कहूँ हमारे सैनिक, 
देंगे निज वैरी को मान ।।

हृदय खोल कर अगर साथ दें, 
तो होगी यह बात विचित्र ।
फिर भी सब सुविधाएँ दूंगा, 
निः संदेह, न मिथ्या मित्र ।।

सुन हिटलर की तार्किक बातें, 
रह सुभाष कुछ क्षण गम्भीर। 
बोले, 'जर्मनेश, कोशिश से, 
होंगे वश में भारत-वीर ॥ १२

मैं संदेश भेज कर अपना, 
रोकूंगा उनको तत्काल । 
लड़े नहीं जर्मन सेना है 
मिल कांटे वैरी के जाल ।।

हिन्द सैनिकों के खेमें में। 
पहुँचा नेता का संदेश, 
हुए चकित सब सैनिक क्षण में, 
बदल गया सारा परिवेश ॥

क्या लिख भेजा नेता जी ने, 
सब में कौतूहल भरपूर । 
प्रिय नेता हैं जर्मन में ही, 
हम से नहीं रहे आते दूर ॥

जो लिख भेजा था सुभाष ने, 
पढ़ा गया वह शुभ संदेश। 
सब सुनने में दत्त-चित्त थे, 
ज्यों अधिकारी का आदेश ॥

सुनो ध्यान से भारत- पुत्रो ! 
पहुंच गया हूँ जर्मन देश। 
नम्र निवेदन मैं करता हूँ, 
तुम से वीरो। एक विशेष ॥

बन्धु ! तुम्हें जानना चहिए, 
तुम छेड़े हो जो संग्राम
वह ब्रिटेन जर्मन सम्बन्धित; 
उससे नहीं हमारा काय /

अतः चाहता हूँ मैं वीरो !
 बन्द करो यह भीषण जंग। 
सन्धि करो जर्मन सेना से, 
बन कर लड़ो उसी के भंग ॥

सुन संदेश सुभाष चन्द्र के, 
फाड़क उठे वीरों के अंग।
सब के मानस में अब ठठने
लगी, हर्ष की तुंग तरंग ।।

हिन्द सैनिकों के मन में था, 
नेता जी के प्रति अनुराग ।
उमड़ा वे थे पूर्ण समर्पित, 
ज्यों सब उठे नींद से जाग ।।52

झण्डा ऊंचा कर के आगे,
 बढ़ने लगे हिन्द के वीर।
जर्मन-सेना हुई सशंकित, 
शायद यह दुर्नीति गंभीर ।।

फिर भी सावधान हो कर के, 
लगे प्रतीक्षा करने शान्त ।
भारत सैनिक रूके निकट जा, 
मिटा विपक्षी-शंका-ध्वान्त ।।

एक दूत ने जर्मन सेना -
में जा दिया संधि प्रस्ताव ।
हृदय-कली खिल उठी अचानक,
सब में जागे मैत्री भाव ॥

समाचार जब सुखद सुना यह, 
हर्षित हिटलर ने साभार ।
मिल कर गले सुभाष से कहा, 
आप नहीं नर हैं अवतार ।।

भेंट रूप में जो कुछ भी दूँ,
 वह सर्वथा रहेगा न्यून।
 हृदय हर्ष से गद्गद मेरा, 
अर्पित मेरे भाव प्रसून ।।

यथा शक्ति हे मित्र ! आप का,
 मैं करके निशि-दिन सहयोग। 
लक्ष्य सिद्धि हित पल करूँगा, 
तज कर जीवन का सुख भोग 1

नेता जी के लिए कराया, 
हर हिटलर ने नवनिर्माण ।
एक रेडियो स्टेशन का जो, 
कृतज्ञता का पुष्ट प्रमाण ॥

मात्र आप के लिए मित्र यह, 
करें प्रसारित हार्दिक भाव। 
निश्चित ही प्रत्येक व्यक्ति पर, 
होगा इसका पूर्ण प्रभाव ।।,

" आप कर रहे हैं जो कुछ भी,
 मेरे हित हे मनुज महान। 
किस प्रकार मैं उसच्ण हो सकूँ?
 इसका दिखता नहीं निदान ॥

दिया आपने प्रश्रय मुझको, 
जिससे मिला सशम्ताधार। 
यहाँ निहत्या में था आया, 
दिया आप ने शस्त्रागार ॥

फिर भी आप दे रहे मुझको, 
क्यों इतना महत्व सम्मान ।
यह महानता मात्र आप की, 
जो लघु थी कह रहे महान ",,

एक दूसरे को अपने से, 
मान रहे थे श्रेष्ठ महान।
एक अन्य को पूर्ण समर्पित,
 दोनो ही व्यक्तित्व समान 1

पा सहयोग पूर्ण हिटलर का, 
अब इटली को कर प्रस्थान ।
मिल मुसोलिनी से सुभाषने, 
कार्य किया अपना आसान ।।

अब सुभाष जी कई शक्तियों-
का पाकर, सहयोग अपार ।
आशान्वित हो गये लक्ष्य का,
 प्राप्त हुआ ज्यों दृढ़ आधार ।।

सभी योजनाको का बर्लिन 
गया बनाया केन्द्र सहर्ष । 
शत्रु पराजित जैसे भी हों,
 करता है वैसा संघर्ष ॥ 

कर आजाद हिन्द सेना, का 
दृढ़ संगठन और विस्तार 1।
बढ़ा मनोवल वीर सैनिको-
का, ज्यों प्राप्त लक्ष्य का द्वार ॥

अभिवादन पद वीर सैनिकों का, 
स्वदेश का था 'जय हिन्द, ।
 गूंज उठी वाणी सुभाष की। 
ज्यों कमलों से गूंज मिलिन्द ॥

लख प्रभाव नेता सुभाष का…
 और संगठन-शक्ति कपार ।
अति प्रसन्न मन हर हिटलर ने,
 किया उचित आदर सत्कार ।।

खान-पान आवास व्यवस्था, 
कर हिटलर ने अति प्रसन्न मन । 
ऐसी ममता स्नेह प्राप्त कर,
 हिन्द सैनिकों के पुलकित मन ।।

जर्मन-भारत के सैनिक मिल, 
करने लगे वार पर वार ।
भरी सेना में मची खलबली,
भागे पीठ दिखा लाचार ।।

सन-सन चलने लगी गोलियाँ,
 जगह-जगह कट-कट तलवार' 
बैरी सैनिक ढेर हुए बहु,
 कुछ पक्षी भी खाये मार ॥

भूरि प्रशंसा कर हिटलरने, 
धन्यवाद दे वारंवार ।
भर उत्साह, युगल सेना में,
प्रकट किया बहु विध सहकार ॥

किया प्रसारित नेता जी ने, 
बर्लिन से अपना संदेश।
हिन्द मूल के जितने भी थे, 
जग में उनके लिए विशेष //

भारत-वीरो सुनो ध्यान से,
 होंगे हम अति शीघ्र स्वतंत्र ।
यह सदात्मा की पुकार है, 
चलो मान कर इसको मन्त्र।।

भारत-भूमि हमारी माता,
 इस पर अपना ही अधिकार ।
पर-धन जीवी टिक न सकेंगे, 
यदि हो माता के प्रति प्यार।।

अपने भाग्य विधाता हम ही,
 ये यायावर विकट पिशाच। 
इन्हें भगाओं भारत भू से, 
अब न पढ़ाये तीन व पाँच ।।

जब तक जीवित एक व्यक्ति भी, 
भारत की धरती पर शेष । 
तब तक है अधिकार हमारा 
भारत अपनि, पर सविशेष ॥

मेरा दृढ़ विश्वास यही है,
 हम है पूर्ण स्वतन्त्र समर्थ। 
जीभ खींच लेंगे उनकी हम, 
जो हमको समझें असमर्थ ॥

इस झंडे के नीचे रह जो, 
बोया गया बीज संग्राम।
है वह आज पल्लवित पुष्पित)
करें अगर हम उसका नाम ॥

प्राणों का भी मोह त्याग कर
 हम कर के भीषण संघर्ष ।
प्राण रहें या जायें मगर है,
लक्ष्य एक वैरी अपकर्ष ॥

दृढ़ व्रत हो हम रण क्षेत्र में, 
उतरेंगे यह बना विधान ।
एक-एक वैरी का जब तक, 
मिटा न देंगे नाम निशान ॥

तब तक चैन नहीं जीवन में, 
नहीं शान्ति या सुख स्वीकार ।
भूख-प्यास को भी सह कर के,
 कर देंगे वैरी का संहार।।

बिना प्रतिज्ञा पूर्ण हुए है, 
कहाँ चैन हमको सुख-शान्ति । 
यह संसार भले कुछ सोचे, 
तब तक बंद न होगी क्रान्ति ॥,

नेता जी के शब्द-शब्द में, 
थी अद्भुत आकर्षण शक्ति। 
अतः भारतीयों के उर में, 
जगी विलक्षण श्रद्धा भक्ति ॥

बलि वेदी पर चढ़ जाने को,
 भारतीय सब थे तैयार ।
 इच्छा मात्र एक थी सबमे, 
मातृभूमि का ही उद्घार”

जितने भारतीय थे जग में,
 सब में भर अपूर्व उत्साह । 
उनके रग-रग में उमंग ज्यों, 
वर्षा ऋतु में नदी प्रवाह ।।

क्रान्ति वहि प्रज्ज्वलित कर, भारत प्राण सुभाष।
लक्ष्य प्राप्ति हित चल पड़े, अंग-अंग उल्लास ।।


इति
 षष्ठ सर्ग

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