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सुभाष चन्द्रिका

चतुर्थ सर्ग



ग्रीष्म काल की तपृ वाटिका, 
ज्यों वर्षा की प्राप्त फुहार। 
हरी-भरी लहलही हो उठी, 
बहती शीतल मंद बयार ॥


निद्रा टूटी हिन्द देश की, 
उदित हो गया ज्यों भास्वान ।
मिटी उदासी चमक उठे मुख, 
मिले भक्त को ज्यों भगवान ।।


मिली सूचना सब हर्षित थे, 
कारागृह की अवधि व्यतीत हुई 
आ गये प्रिय सुभाष घर, 
शुचि उर मानवता मीत ॥

सब से मिल स्वकक्ष में जाकर,
बैठे करने लगे विचार !
अवसर जो वहुमूल्य प्राप्त है, 
उसे न करना है बेकार ।।

इसी समय सेवक ने आकर, 
पत्र पत्रिकाओं का बंडल ।
दे सुभाष के कर कमलों में,
देखा चमक रहा मुख मण्डल ॥

समाचार-पत्रों से अवगत 
हुए उत्तरी वंग क्षेत्र में।
भीषण जल प्रावन आया है,
व्यथित अश्रू भर गये नेत्र में ॥

सुनते ही सुभाष आये हैं, 
कमल मुदित दौड़ती आयी।
ज्यों नाना से मिलने खातिर, 
ललक पहुँचती लक्ष्मी बाई ॥

अभिवादन स्वागत कर बोली, 
कमला मन का भाव प्रकट कर 
"कैसी यह विषाद की आई? 
आज दिख रही स्वर्णानन पर ।।

धीर पुरुष के मुख पर कैसी ? 
दिखती चिन्ता की रेखाएँ।
या स्वजनों की कठिन परीक्षा, 
लेने बैठे सत्य बतायें ।।

"नहीं परीक्षा कोई है यह, 
और नहीं कोई दुराव है।
समझ दुर्दशा बाढ़ पीड़ितो की, 
उर में अति विषय घाव है।।

सोच रहा हूँ दूर करूँ चल, 
उन दुखियों की घोर विपत्ति ।
क्यों कि मनुजता ही मानव की,
निखिल सृष्टि में शुचि सम्पत्ति ।।"

है जितना ही शीघ्र कार्य शुभ, 
उतना ही उत्तम होता है।
स्वार्थी अहंकार युव मानव, 
हो ऐसे अवसर खोता है ।।

कमला गयी स्वगेह श्रवण कर, 
बातें जान कल्याणी मन की।
खोयी थी कुछ क्षण चिन्तन में, 
सुधि न रह गयी थी तन-मन की ।।

इधर सुभाष चन्द्र ने सोचा, -
"एकाकी में क्या कर सकता? 
लाख प्रयत्न करूँ फिर भी क्या?
सब दुखियों के दुख हर सकता है।।

अतः किया का हान साहसी-
कर्मठ-भट-दक्ष जवानों का। 
कार्य परम प्रिय पर उपकारी, 
और न मोह जिन्हें प्राणों का।

जगा पूर्ण विश्वास हृदय में, 
हम दुखियों की व्यथा हरेंगे। 
जब तक प्राण रहेंगे तन में, 
तब तक जन उद्घार करेंगे ।।

अब चल पड़े सुकर्म मार्ग पर,
बिना विलम्व किये सोल्लास ।
कुछ ही दूर चले थे पहुँची, 
कमला भी टोली के पास ॥

चकित सुभाष चन्द्र ने पूछा, 
री कमले ! तू कैसे आयी ?
उस क्षण तुमने प्रकट न की थी, 
अपनी से इच्छा जन सुखदायी ॥,,

"हे! सुभाष दा । कर्म लोक में 
कहने से करना श्रेयस्कर ! 
अतः बिना कुछ कहे सुने ही, 
में चल पड़ी कर्म के पथ पर ।।

जिस प्रकार का देश, वेश भी,
 वैसा ही अपनाया जाता। 
शान्ति और सुख प्राप्त मनुज का 
तब जीवन साफल्य सुहाता ।

मानव की तो बात अलग है, 
जो अचराचर जीवन धारी। 
उनकी भी है सतत व्यस्तता, 
निज कर्मों में मंगलकारी ।।

मनुज योनि में जन्म ग्रहण कर 
हम क्यों करें उपेक्षा इसकी । 
प्रस्तुत रहना हमें चाहिए। 
व्यथा हरे, हर पायें जिसकी ॥

देव लोक में नहीं हमारा, 
वास कि बैठे, हम हो निष्क्रिय। 
धरती पर हम जन्म लिये हैं, 
अतः कर्म ही हमको है प्रिय ॥

साधुवाद दे कर कमला को, 
कहा सहचरों से चलने को ।
जीवन से निराश जीवों की, 
व्यथा कथा सारी हरने को ।

साथ युवाओं की सेना के, 
चली नारियों की भी टोली
जहाँ काल से जूझ रही थी.
निरालम्ब हो जनता भोली ।।

पहुँच लक्ष्य तक देखा सब ने, 
प्रकृति नदी का ताण्डव नर्तन 
जिसके कोप जाल में फंस कर, 
तड़प रहे थे सब जड़ चेतन ॥

कहीं मनुष्यों की चीत्कारें, 
कहीं मूक पशुओं का क्रंदन।
कहीं खेचरों का कोलाहल, 
हुआ क्षुब्ध देवों का नन्दन ।

अहंकार के भार दब गयी, 
थीं असुरों की कटु ललकारें।
मानो आज सुसुष्ट हो गयीं, 
अब तक की सब मधुर बहारें ॥

हाहाकार मचा था भीषण, 
चारों ओर उदासी छायी।
मानो सृष्टि विनाश के लिए, 
महाकाल की हुई चड़ाई ॥

कहीं करुण क्रन्दन करती माँ,
जिसका पुत्र वरुण को प्यारा।
कोई अबला बिलख रही थी,
जिसका लुटा सुहाग सहारा ॥

जिन वृद्धों की घर की लकड़ी, 
बीच भंवर में गोता खा कर ।
सदा-सदा के लिए खो गयी, 
जीवन का अस्तित्व मिटा कर।।

उनकी आँखों काजल पावन,
उस जल पावन से था भारी “
जिसके सम्मुख आने वाले, 
पल भर रुक न सके नर-नारी ।।

जिन बच्चों की माताएं या, 
पिता काट ममता की डोरे।
जल प्रावन में लीन हो गये,
उनके दुख का और न छोर ।।

कभी बिलखते दूर-दूर तक, 
आशा-भरी दृष्टि दौड़ाते 
कभी दौड़ते किसी दिशा में,
समझ खड़े माँ-बाप दिखाते ॥

कितने प्राणी प्राण-हीन-
डूबते और रह-रह उतराते । 
प्रलय-सिन्धु में गोता खाते, 
दारु सदृश प्रायः दिखलाते ॥38

हृदय विदारक दृश्य देख कर, 
साहस का भी साहस छूटा। 
पर नेता जी की सेवा में, 
नया स्रोत साहस का फूटा ।।

जय माँ दुर्गे बोल सुरक्षा -
हेतु, बढ़े उत्साह घना था।
आज काल विकराल व्याल से, 
वीरों का संग्राम ठना था ।। -

कूद पड़े जब-ओध प्रबल था, 
धारा द्वारा खींचे जाते । 
किन्तु तैर विपरीत दिशा में, 
असहायों के प्राण बचाते ॥

इधर सुभाष और कमला में, 
मानो होड़ लगी थी भारी।
जिनकी अद्भुत कर्मठता को -
देख पस्त बाधाएँ सारी ॥

बड़ी नाव की शीघ्र व्यवस्था । 
कर के नेता जी अविराम । 
मुक्त कर रहे थे लोगों को, 
समय विभीषण को ज्यों राम ॥

प्रावन-रावण के चंगुल से 
छीन सुरक्षित यता पहुंचाते ।
खान-पान आवास व्यवस्था, 
निज सहायकों से करवाते ॥

संकट-ग्रस्तों की सेवा में, 
खान-पान विश्राम भूल सा गया, 
तदपि करुणा सागर का।
मुखमण्डल था खिला फूल सा।।

देवी अष्टभुजी सी कमला, 
प्रवण महा असुर से लड़ती।
नाव भँवर में चक्कर खाती, 
फिर भी नहीं काल से डरती ॥

वीर प्रसविनी कटक-भमि का, 
मस्तक ऊंचा करने वाले। 
नेता जी की कर्मठता से, 
औरों ने कर्तव्य सँभाले ।

पुलिस अधीक्षक की तनया थी, 
कमला सबला हो कर बायी।
सुमन सेज से उठ कर जैसे, 
चण्डी रुपा लक्ष्मी बाई ।।

निष्क्रिय सत्ता हुई सशंकित, 
देख हिन्द की जगी शक्ति को।
सुख सुविधा की बात अलग थी, 
प्रिय प्राणों से भी बिरक्ति को ॥

सोचा उसने अब भारत के, 
जन-जन में वह शक्ति जगी है।
जिसके सम्मुख टिक न सकी वह, 
काल रात्रि भयभीत भगी है।

यदि इतना अदम्य साहस है,
भारतीय जनता के भीतर।
तो कैसे कोई भी शासन, 
कर सकता है इनके ऊपर ॥

सम्भव है अति शीघ्र बज उठे, 
हिन्द सैनिकों की रण भेरी।
सत्ता का रवि डूब न जाये, 
छा जाये फिर घनी अँधेरी ॥

इधर बाढ़ से त्रस्त जनों का, 
कर के यथा शक्ति उद्घार ।
हुए व्यस्त रुज-ग्रस्त जनों की, 
करने में सेवा उपचार ।।

नेता जी के सभी सहायक, 
पा करके सेवा का अवसर ।
आह्लादित थे क्यों कि न जग में, 
कोई तप सेवा से बढ़ कर ।।

प्रायः सभी रोगियों को कर, 
रोग मुक्त कर दूर व्यथाएँ।
सम्यक सेवा सुश्रूषा कर, 
यथा शक्ति दे कर सुविधाएँ ॥

सभी सुरक्षा कर्मी करने 
लगे वापसी की तैयारी।
 समाचार सुन प्राप्त सुरक्षा, 
व्यथित हुए सारे नर-नारी ॥

श्रद्धा सुमन चढ़ा बरसा आँसू की धारा। 
नेता जी की जय ध्वनि से गूंजा नभ सारा ।। 
चली जवानो की टोली पा मधुर विदाई। 
था सब में उत्साह हृदय में खुशी समाई।

इति 
चतुर्थ सर्ग।

यूपी टीजीटी पीजीटी हिन्दी साहित्य

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