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क्रौंचवध(प्रथम से तृतीय सर्ग तक) क्रमशः

क्रौच-वध प्रथम-सर्ग था भीषण वन प्रान्त,तुमुल तम शासन करता। हिंस्त्र जन्तु-खघोर,सभी में मै था भरता। कहीं-कहीं थे मार्ग,बने अटवी के भीतर। भूले-भटके लोग, भयातुल चलते जिस पर ॥१॥ ...

पुष्टिमार्ग

पुष्टिमार्ग: पोषणं तदनुग्रह' इस सिद्धांत वाक्य के अनुसार भगवान के अनुग्रह को ‘पुष्टि’ कहते हैं और आनन्द कन्द श्रीकृष्णचन्द्र के उस अनुग्रह को प्राप्त कराने का मार्ग ‘पुष्टिमार्ग’ कहलाता है। श्री महाप्रभु जी ने अपनी 'सिद्धान्त मुक्तावली' में बतलाया है कि भगवान के अनुग्रह को प्राप्त करने के लिए उनकी सेवा करनी चाहिए। अपने चित्त को भगवान से जोड़ना ही सेवा है। इसीलिए पुष्टिमार्ग में- मंगला, श्रृंगार ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, सन्ध्या आरती एवं शयन, इस अष्टयाम की सेवा को भगवद् अनुग्रह का मुख्य साधन माना जाता है। पुष्टिमार्ग में भक्ति साधन भी है और साध्य भी। ‘पुष्टि प्रवाह’ में भक्ति के स्वरूप का तात्त्विक दृष्टि से निरूपण करते हुए महाप्रभु जी कहते हैं, ‘प्रभु से जब  भक्त का राग धीरे-धीरे परिपक्व होकर अनुराग में परिणत हो जाता है, तब भक्त को न तो कोई आकांक्षा रहती और न ही किसी भी प्रकार की छटपटाहट। इस स्थिति में वह आनन्द के सागर में डुबकियां लगाने लगता है। अपेक्षित परिणाम हासिल नहीं होने पर विचलित नहीं होता। [2] 'कठोपनिषद' में कहा गया है कि परमात्मा जिस पर अनुग्रह करत...

दिव्यालोक

दिव्यालोक (प्रबन्ध काव्य) रामवरन त्रिपाठी      ग्रा0-दहेव पो0-बालवरगंज जिला-जौनपुर मरीचि माली सुर के प्रसाद से अतीव आलोकित मार्ग हो गया। अपूर्व आभा जिन...