तृतीय सर्ग हुआ प्रात नभ में छाये थे, प्राची में निर्जल घन काले । व्याप्त अँधेरा घोर सूर्य को- भी ढक रक्खे थे मतवाले ।। इसी बीच देखा दिलीप ने, जो कुछ था चौकाने वाला। जिसने है व्रत लिया देश का- दुःख समूल मिटाने वाला ।। वही सुभाष उदास आज क्यों? अवनत ज्यों सरसिज मुरझाया । लगता पश्चाताप उसे है; त्याग-पत्र जो दे कर आया ।। चकित दिलीप राय ने पूछा, “क्यों आनन पर घोर उदासी? कैसे पवि में जंग लग गयी, अथवा मोह ग्रस्त सन्यासी ।। ले कर,जो उद्देश्य सखे, सम्मानित पद को मैंने त्यागा। उससे विरत यहाँ बैठा हूँ। समय जा रहा व्यर्थ अभागा ॥ पितृदेव हैं रुष्ट कदाचित, अब न करे आर्थिक सहयोग। अतः सहन करना पड़ सकता, है, स्वदेश का विषम वियोग ॥ इसी लिए घनघोर अंधेरा, है आँखों के सम्मुख छाया। यह जीवन की पहली चिन्ता जिससे हृदय-कमल कुम्हलाया।,, बस, इतनी ही बात के लिए, पर्वत में भी ऐसा कम्पन । सब को अभय बनाने वाले का उद्वेलित है कैसे मन ।। तुम को कितना द्रव्य चाहिए, देवोपाम चरणों में मेरा / है सर्वस्व समर्पित प्रिय वर ! व्यर्थ तुम्हे चिन्ता ने घेरा 1 पूर्ण शान्ति अब मुझ...
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