चतुर्थ सर्ग ग्रीष्म काल की तपृ वाटिका, ज्यों वर्षा की प्राप्त फुहार। हरी-भरी लहलही हो उठी, बहती शीतल मंद बयार ॥ निद्रा टूटी हिन्द देश की, उदित हो गया ज्यों भास्वान । मिटी उदासी चमक उठे मुख, मिले भक्त को ज्यों भगवान ।। मिली सूचना सब हर्षित थे, कारागृह की अवधि व्यतीत हुई आ गये प्रिय सुभाष घर, शुचि उर मानवता मीत ॥ सब से मिल स्वकक्ष में जाकर, बैठे करने लगे विचार ! अवसर जो वहुमूल्य प्राप्त है, उसे न करना है बेकार ।। इसी समय सेवक ने आकर, पत्र पत्रिकाओं का बंडल । दे सुभाष के कर कमलों में, देखा चमक रहा मुख मण्डल ॥ समाचार-पत्रों से अवगत हुए उत्तरी वंग क्षेत्र में। भीषण जल प्रावन आया है, व्यथित अश्रू भर गये नेत्र में ॥ सुनते ही सुभाष आये हैं, कमल मुदित दौड़ती आयी। ज्यों नाना से मिलने खातिर, ललक पहुँचती लक्ष्मी बाई ॥ अभिवादन स्वागत कर बोली, कमला मन का भाव प्रकट कर "कैसी यह विषाद की आई? आज दिख रही स्वर्णानन पर ।। धीर पुरुष के मुख पर कैसी ? दिखती चिन्ता की रेखाएँ। या स्वजनों की कठिन परीक्षा, ल...
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